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BS4 And BS6: बीएस4 और बीएस6 में क्या है अंतर, कैसे तय होता है स्टैंडर्ड, जानें पूरी डिटेल

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: समीर गोयल Updated Fri, 04 Nov 2022 05:09 PM IST
सार

दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में नवंबर महीने में हवा की स्थिति बेहद खराब है। सरकार की ओर से बीएस 4 वाहनों पर रोक लगाई गई है जबकि बीएस6 इंजन वाले वाहनों पर कोई रोक नहीं है। क्या है बीएस4 और बीएस6 तकनीक में फर्क, आइए जानते हैं।

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What is the difference between BS4 and BS6, how the standard is decided, know full details
For Reference Only - फोटो : सोशल मीडिया

दिल्ली एनसीआर में हवा की स्थिति काफी ज्यादा खराब है। बुधवार को दिल्ली के परिवहन मंत्री गोपाल राय ने अहम घोषणा की। जिसके मुताबिक दिल्ली की सीमा में डीजल से चलने वाले ट्रकों और बीएस4 वाहनों की एंट्री को बंद कर दिया गया है। लेकिन इलेक्ट्रिक, सीएनजी वाहनों को एंट्री दी जाएगी।

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बीएस 4 और बीएस 6 में यह है अंतर

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बीएस6 के मुकाबले बीएस4 इंजन वाले वाहन ज्यादा प्रदूषण करते हैं। बीएस6 के मुकाबले बीएस4 वाहनों से निकलने वाले सल्फर की मात्रा पांच गुना तक ज्यादा हो सकती है। इसके अलावा बीएस4 वाले वाहनों से ज्यादा प्रदूषण होता है। जिनके कारण आंख में जलन, फेफड़ों में इनफेक्शन, सिर में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं।

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क्या होता है बीएस नॉर्म

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बीएस का मतलब भारत स्टेज है। इसका उपयोग वाहनों में प्रदूषण नापने के लिए किया जाता है। देश में चलने वाले हर वाहन के लिए बीएस मानक जरूरी है। बीएस के साथ जो नंबर होता है, उसके जरिए ये पता लगाया जाता है कि वाहन कितना प्रदूषण करता है।

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ज्यादा नंबर वाला बीएस है बेहतर

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मौजूदा समय में देश में बीएस6 नॉर्म्स लागू हैं। इसे एक अप्रैल 2020 को लागू किया गया था। इससे पहले एक अप्रैल 2017 से बीएस4 नॉर्म्स लागू किए गए थे। जबकि 2010 के बाद के वाहनों को बीएस3 की कैटेगरी में रखा गया था। साल 2000 से 2010 के बीच बीएस2 और 2000 से पहले के वाहनों को बीएस1 कैटेगरी के वाहनों में रखा गया था। इसका सीधा मतलब है कि बीएस के साथ जितने नंबर बढ़ते जाते हैं, उतना ही कम प्रदूषण वाहनों से होता है।

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कौन तय करता है स्टैंडर्ड

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बीएस एमिशन नॉर्म्स को भारत सरकार तय करती है। ये इंटरनल कंबशन इंजन इक्विपमेंट से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तय किए जाते हैं। अलग-अलग समय पर इनमें बदलाव किया जाता है। जो वन, पर्यावरण और जलवायु मंत्रालय के अधीन आते हैं।

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