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बिहार का अनोखा मंदिर: महासप्तमी पर बहती है दूध की नदी, कोसी में समाती है भक्तों की आस्था
Sun, 18 Oct 2026 10:33 AM IST
कोसी ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहरसा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहरसा
Published by: कोसी ब्यूरो
Updated Sun, 18 Oct 2026 10:33 AM IST
सार
बिहार के सहरसा स्थित बाबा कारू खिरहर धाम में शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी पर लाखों श्रद्धालुओं ने दुग्धाभिषेक किया। मान्यता के अनुसार, पशुपालक गाय-भैंस के बच्चे को जन्म देने के बाद पहला दूध बाबा को अर्पित करते हैं। इस बार बड़ी मात्रा में चढ़ाए गए दूध से खीर का महाप्रसाद तैयार किया गया।
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चढ़ावे के दूध नदी में प्रवाहित होते हुए
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी के मौके पर बिहार के सहरसा जिले में आस्था का एक ऐसा विहंगम दृश्य देखने को मिला, जिसकी मिसाल देश में कहीं और देखने को नहीं मिलती। महिषी प्रखंड के महपुरा गांव में कोसी नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध संत बाबा कारू खिरहर धाम में लाखों श्रद्धालुओं ने दुग्धाभिषेक किया। श्रद्धालुओं ने इतना दूध अर्पित किया कि मंदिर परिसर से दूध की एक अविरल धारा बह निकली और सीधे पीछे बह रही कोसी नदी के जल में समाहित हो गई। नदी के पानी में दूध की यह धारा मिलने का दृश्य इंटरनेट मीडिया पर दिनभर चर्चा का विषय बना रहा।
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17वीं सदी का इतिहास: कुलदेवी की कृपा से जन्मे थे गौ-रक्षक कारू खिरहर
ऐतिहासिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, 17वीं शताब्दी में महपुरा के एक यादव परिवार में कुलदेवी मां दुर्गा की अनुकंपा से बालक कारू का जन्म हुआ था। लोकगाथाओं में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का वंशज माना जाता है। बचपन से ही वेदों के ज्ञाता और युद्धकला में पारंगत रहे कारू खिरहर का जीवन गौ-सेवा और देवाधिदेव महादेव की भक्ति में बीता। उन्होंने कोसी दियारा के दुर्गम जंगलों में हिंसक जानवरों और महामारियों से स्थानीय लोगों व उनके पशुधन की रक्षा की थी। तभी से मान्यता है कि किसी पशुपालक की गाय या भैंस बछड़े को जन्म देती है, तो उसका पहला दूध बाबा कारू के दरबार में ही चढ़ाया जाता है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि बाबा की भभूत (राख) लगाने से मनुष्य और पशु, दोनों के असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं।
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झांप, लाठी और खड़ाऊं चढ़ाने की परंपरा, गूंजती रहीं भगैत गाथाएं
महासप्तमी की सुबह से ही मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर भक्तों का तांता लग गया। बिहार के कोसी, मिथिलांचल और सीमांचल के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भी लाखों श्रद्धालु पहुंचे। स्थानीय ग्रामीण नंदन कुमार ने बताया कि श्रद्धालु केवल दूध ही नहीं, बल्कि बाबा को प्रसन्न करने के लिए लाठी और खड़ाऊं, पीतल का झांप, दही, चूड़ा, अरवा चावल, फल और मिष्ठान अर्पित करते हैं। वहीं, मेला परिसर में भक्ति संगीत एवं भगैत गायन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
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सैकड़ों क्विंटल दूध से बनी खीर, महाप्रसाद के लिए उमड़ी भीड़
महासप्तमी पर चढ़े दूध से मंदिर के विशाल देगों और कड़ाहों में महाप्रसाद की खीर पकाई गई। घंटों तक दूध को औटाकर तैयार की गई इस पवित्र खीर को पाने के लिए श्रद्धालुओं में होड़ मची रही। मान्यता है कि बाबा के इस महाप्रसाद को ग्रहण करने से परिवार में सुख-शांति रहती है और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
दान राशि के विवाद और गोलीबारी के बाद प्रशासन ने संभाली व्यवस्था
गौरतलब है कि कुछ समय पहले बाबा कारू स्थान मंदिर की दान राशि और न्यास समिति के वर्चस्व को लेकर खूनी संघर्ष हुआ था। निवर्तमान न्यासधारी निरंजन कुमार और दूसरे पक्ष के बीच विवाद में कई राउंड ताबड़तोड़ फायरिंग हुई थी, जिसमें ग्रामीण घायल हुए थे और गुस्साए लोगों ने एक गाड़ी को आग के हवाले कर दिया था। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपित न्यासधारी निरंजन कुमार समेत अन्य को अवैध हथियारों और कारतूस के साथ गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।
इस हिंसक घटना के बाद जिला प्रशासन ने मंदिर की व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। इस बार महासप्तमी के विशाल मेले को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए सदर अनुमंडल पदाधिकारी और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने पहले ही बैठक कर सुरक्षा का खाका तैयार किया था। पूरे मंदिर परिसर, गर्भगृह और कोसी नदी के घाटों पर भारी संख्या में दंडाधिकारियों, पुलिस बल, सीसीटीवी निगरानी और गोताखोरों की तैनाती की गई, जिससे लाखों श्रद्धालुओं ने बिना किसी भय के पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की।