बिहार: जेपी की आखिरी उड़ान... अपने गांव के लगाए दो चक्कर, हाथ हिलाकर दी विदाई और फिर कभी नहीं लौटे लोकनायक
पुण्यतिथि विशेष में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 1978 में सिताबदियारा की आखिरी यात्रा का भावुक किस्सा सामने आता है। गांव से विदा होते समय जेपी ने हेलीकॉप्टर से अपने गांव के दो चक्कर लगाए, लोगों का अभिवादन स्वीकार किया और फिर कभी सिताबदियारा नहीं लौटे। ग्रामीण आज भी उनकी उस आखिरी मुलाकात और विदाई को याद करते हैं।
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आसमान में हेलीकॉप्टर के दो चक्कर, नीचे उमड़ा पूरा गांव, हर तरफ गूंजता ‘लोकनायक जिंदाबाद’ का नारा और अपनों को निहारती जयप्रकाश नारायण की आंखें। 7 सितंबर 1978 का वह दिन सिताबदियारा के लोगों के लिए आज भी एक जीवंत स्मृति है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण उस दिन अपने गांव की धरती पर आखिरी बार पहुंचे थे। तीन दिन गांव में रहने के बाद जब उन्होंने विदाई ली, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी अपने गांव से अंतिम मुलाकात होगी। हेलीकॉप्टर आसमान में ओझल हो गया और इसके बाद जेपी कभी सिताबदियारा नहीं लौट सके। करीब एक साल बाद उनके निधन की खबर गांव पहुंची तो पूरा सिताबदियारा शोक में डूब गया।
गांव की गलियों में आज भी जिंदा है आखिरी मुलाकात का किस्सा
सिताबदियारा के बुजुर्ग जैनेंद्र कुमार सिंह और श्रीराम यादव बताते हैं कि जेपी 7 सितंबर को अपने घर पहुंचे थे। वह तीन दिनों तक गांव में रहे। उनके आने की खबर मिलते ही बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने के लिए पहुंचने लगे। किसी के लिए जेपी देश के महान नेता थे तो किसी के लिए वह गांव के अपने जेपी थे। दलजीत टोला निवासी आनंद बिहारी सिंह को भी उनसे हुई एक मुलाकात आज तक याद है।
उन्होंने बताया कि शाम के समय जेपी आंगन में बैठे थे। घर के पिछले दरवाजे से गांव की कई महिलाएं उन्हें देखने पहुंचीं। कुछ महिलाएं उनके पैर छूने लगीं तो जेपी ने भोजपुरी में कहा, ‘आपलोगन के हमार पैर ना छुए के चाही।’ इसी दौरान एक बुजुर्ग महिला ने सहजता से कहा, ‘राउर इ नातिन पतोह लगिहें।’ इस पर जेपी मुस्कराए और बोले, ‘अच्छा, ठीक वा।’ इसके बाद महिलाएं काफी देर तक उनका आशीर्वाद लेती रहीं।
‘चंद्रशेखर, तनी हमार गांव दिखा द...’
गांव में तीन दिन बिताने के बाद जेपी की विदाई का समय आया। उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी उनके साथ थे। विदा होने से पहले जेपी ने उनसे कहा, ‘चंद्रशेखर, तनी हमार गांव दिखा द।’ इसके बाद दोनों हेलीकॉप्टर से रवाना हुए। हेलीकॉप्टर ने सिताबदियारा के ऊपर दो चक्कर लगाए। नीचे बड़ी संख्या में ग्रामीण खड़े थे। लोग हाथ हिलाकर अपने लोकनायक को विदाई दे रहे थे और पूरा गांव नारों से गूंज रहा था। हेलीकॉप्टर जब नीचे आया तो जेपी कुछ देर खड़े होकर अपने गांव को निहारते रहे। लोगों की आंखें नम थीं। इसके बाद हेलीकॉप्टर ने फिर उड़ान भरी और यही जेपी की सिताबदियारा के ऊपर आखिरी उड़ान साबित हुई। इसके बाद वह दोबारा अपने गांव नहीं आ सके।
8 अक्टूबर 1979 को निधन की खबर पहुंची तो रो पड़ा था गांव
8 अक्टूबर 1979 को जेपी के निधन की खबर जब सिताबदियारा पहुंची तो पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। लोग उनके घर की ओर पहुंचने लगे। कई ग्रामीण उसी समय पटना के लिए रवाना हो गए, ताकि अपने लोकनायक को अंतिम विदाई दे सकें। जिस गांव ने जेपी को जन्म लेते देखा था, उसी गांव ने करीब एक साल पहले उनकी आखिरी विदाई भी देखी थी। उस समय किसी को नहीं पता था कि हेलीकॉप्टर से अपने गांव को निहारते हुए जेपी की वह यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन जाएगी।
पुण्यतिथि पर फिर ताजा होंगी जेपी की यादें
जेपी नारायण स्मारक प्रतिष्ठान के व्यवस्थापक अशोक सिंह के अनुसार, पुण्यतिथि पर स्कूली बच्चे और ग्रामीण लोकनायक की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि देंगे। लोकनायक की आवाज भले ही खामोश हो गई, लेकिन बिहार के सारण और उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की सीमा के बीच बसे सिताबदियारा की मिट्टी में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। सारण के रिविलगंज प्रखंड और थाना क्षेत्र के लाला टोला स्थित इस गांव में लोग उन्हें आज भी अपने परिवार के किसी सदस्य की तरह याद करते हैं। खासकर वह आखिरी दृश्य, जब जेपी हेलीकॉप्टर से अपने गांव के ऊपर चक्कर लगाकर उसे निहारते हुए विदा हुए थे।
11 अक्टूबर को हुआ था जन्म, 8 अक्टूबर को निधन
लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सारण जिले के रिविलगंज प्रखंड मुख्यालय के दक्षिण दियारा क्षेत्र स्थित सिताबदियारा के लाला टोला में हुआ था। बचपन में गांव में प्लेग जैसी बीमारी फैलने और सरयू नदी के कटाव के कारण उनका परिवार उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की सीमा में जाकर बस गया। यह क्षेत्र आज जयप्रकाश नगर के नाम से जाना जाता है।
जेपी का निधन 8 अक्टूबर 1979 को पटना में हुआ था। उनके निधन के दशकों बाद भी उनकी राजनीतिक विचारधारा और सामाजिक चिंतन लोगों को प्रेरित करते हैं। हालांकि, उनके नाम और विचारों को लेकर राजनीति करने वाले लोग आज अलग-अलग मुकाम पर पहुंच चुके हैं, लेकिन उनके पैतृक गांव के विकास को लेकर अब भी सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, सिताबदियारा को जितना विकसित होना चाहिए था, वह अब तक उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।