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Net Zero: स्पष्ट जलवायु नीति व्यापक आर्थिक बदलाव के लिए क्यों जरूरी? नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने बताई ये वजह

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Tue, 10 Feb 2026 05:31 PM IST
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सार

नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने कहा कि बदलते वैश्विक हालात में नेट-जीरो को केवल उत्सर्जन कटौती नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और तकनीकी बदलाव के रूप में देखना चाहिए। आइए विस्तार से जानते हैं। 

Why is a clear climate policy essential for broader economic transformation? NITI Aayog Vice Chairman explains
नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी - फोटो : ANI
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विस्तार

नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने मंगलवार को कहा कि जलवायु पर होने वाली बहस में अब प्रतिस्पर्धा, लागत वहन करने की क्षमता और आर्थिक सुरक्षा जैसे पहलू प्रमुख हो गए हैं। उनका कहना था कि 2021 में ग्लासगो में आयोजित COP26 में नेट-जीरो उत्सर्जन को लेकर जो प्रतिबद्धता जताई गई थी, उसके बाद से वैश्विक हालात में बड़ा बदलाव आ चुका है। नेट जीरो का मतलब है कि किसी देश, कंपनी या अर्थव्यवस्था से जितनी ग्रीनहाउस गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) निकलती हैं, उतनी ही गैसें कम या संतुलित भी कर दी जाएं।

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2026 तक आते-आते बहुत कुछ बदल गया है

विकसित भारत व नेट-जीरो पर परिवहन, उद्योग और बिजली क्षेत्रों की सेक्टोरल रिपोर्ट्स के विमोचन कार्यक्रम में बेरी ने कहा कि 2026 तक आते-आते बहुत कुछ बदल गया है। नेट-जीरो को केवल उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन के मार्गदर्शन के तौर पर देखना चाहिए।

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डच अर्थशास्त्री टिनबर्गेन के सिद्धांतों का किया जिक्र

उन्होंने भारत की जलवायु और ऊर्जा नीति में अधिक स्पष्टता की जरूरत पर जोर देते हुए टिनबर्गेन असाइनमेंट रूल का उल्लेख किया। बेरी ने याद दिलाया कि नोबेल पुरस्कार विजेता डच अर्थशास्त्री जान टिनबर्गेन के सिद्धांत के अनुसार, अगर सरकार के पास स्वतंत्र नीति लक्ष्य हैं, तो उन्हें हासिल करने के लिए स्वतंत्र नीति उपकरणों की आवश्यकता होती है।

भारत को अपनी नीति स्पष्ट करने की जरूरत 

ऊर्जा संक्रमण के संदर्भ में इस सिद्धांत को लागू करते हुए बेरी ने कहा कि भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी राह केवल उत्सर्जन कटौती पर केंद्रित है या विकास-आधारित व्यापक संक्रमण पर। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य सिर्फ उत्सर्जन घटाना नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण है, तो यह साफ होना चाहिए कि हम किस लक्ष्य को साध रहे हैं।


अपने पूर्व कार्यकाल का हवाला देते हुए, जब वे मैकिन्से में थे, बेरी ने बताया कि कोपेनहेगन जलवायु वार्ता से पहले तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के लिए किए गए अध्ययन में 'लो-कॉस्ट एबेटमेंट कर्व' की अवधारणा पर काम हुआ था।

जलवायु नीति का मुख्य मकसद कार्बन उत्सर्जन घटाना है

बेरी ने कहा कि अगर जलवायु नीति का मुख्य मकसद कार्बन उत्सर्जन घटाना है, तो सबसे सस्ते और असरदार उपायों को पहले अपनाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, इसके लिए किसी एक खास तकनीक पर अटकने के बजाय खुला और लचीला नजरिया रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ग्रीन हाइड्रोजन या कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) जैसे मिशनों पर ठोस सबूतों के बिना ज्यादा भरोसा करना सही नहीं है, क्योंकि जरूरी नहीं कि ये उपाय कम लागत में प्रदूषण घटाने वाले सबसे बेहतर विकल्प हों।

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