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SBI: रुपये को ऐतिहासिक गिरावट से उबारने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करे आरबीआई, रिपोर्ट में सुझाव

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Mon, 30 Mar 2026 10:03 PM IST
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सार

डॉलर के मुकाबले 95 के पार पहुंचे रुपये को संभालने के लिए एसबीआई रिसर्च ने आरबीआई को विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल की सलाह दी है। ओएमसी के लिए स्पेशल विंडो, एफपीआई निकासी और एनडीएफ प्रीमियम में उछाल के पूरे आर्थिक गणित को समझने के लिए हमारी विस्तृत रिपोर्ट अभी पढ़ें।

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SBI - फोटो : Adobestock
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विस्तार

पश्चिम एशिया में जारी संकट और ईरान युद्ध के कारण भारतीय रुपये में आई भारी गिरावट के बीच, भारतीय स्टेट बैंक की एक रिसर्च रिपोर्ट ने रिजर्व बैंक को अहम सुझाव दिया है। सोमवार को इंट्रा-डे कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के स्तर को पार कर गया था, हालांकि अंत में यह 94.78 पर बंद हुआ। वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में एसबीआई का मानना है कि रुपये को सट्टेबाजों से बचाने के लिए RBI को अपने 700 अरब डॉलर से अधिक के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार का तत्काल उपयोग करना चाहिए।
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विदेशी मुद्रा भंडार का रणनीतिक उपयोग

एसबीआई के आर्थिक अनुसंधान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास 10 महीने से अधिक के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जो एक बेहद आरामदायक स्थिति है। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन भंडारों को केवल 'बुरे वक्त' के लिए बचाकर रखने का कोई ठोस कारण नहीं है। अगर बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को समर्थन देना वांछनीय है, तो ऐसा करने का यह बिल्कुल सही समय है।
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तेल कंपनियों  के लिए विशेष 'विंडो' का सुझाव

रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए एसबीआई ने तेल विपणन कंपनियों के लिए एक विशेष 'विंडो' बनाने का महत्वपूर्ण सुझाव दिया है।
  • तेल कंपनियों की दैनिक डॉलर मांग लगभग 250-300 मिलियन डॉलर है, जो सालाना 75-80 अरब डॉलर बैठती है।
  • इस मांग को मुख्य बाजार के दैनिक कामकाज से अलग करने पर वास्तविक विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति की बेहतर स्थिति का पता चल सकेगा।
  • इससे विनियामक द्वारा उठाए गए कदमों की प्रभावशीलता को सटीक रूप से मापने में मदद मिलेगी।

तरलता संकट और एनडीएफ प्रीमियम में उछाल

रिपोर्ट में आरबीआई के हालिया कदम का भी विश्लेषण किया गया है। 27 मार्च 2026 के परिपत्र के माध्यम से, आरबीआई ने 10 अप्रैल तक बैंकों के लिए नेट ओपन पोजीशन (NOP-INR) को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया है। हालांकि यह कदम उपयोगी है, लेकिन इससे ऑनशोर और ऑफशोर  बाजारों के बीच एक बड़ा अंतर पैदा होने की संभावना है। भारतीय बैंक आमतौर पर ऑनशोर में 'लॉन्ग' और ऑफशोर में 'शॉर्ट' होते हैं, जबकि विदेशी बैंक इसके विपरीत रुख अपनाते हैं। 

जैसे ही बैंक अपनी पोजीशन को समेटने का प्रयास करेंगे, बाजार में तरलता की कमी उत्पन्न हो सकती है, जिससे ऑफशोर प्रीमियम तेजी से बढ़ रहा है। इसी कारण, सोमवार को एक वर्ष का एनडीएफ (नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड) प्रीमियम 3.43 प्रतिशत से उछलकर 4.19 प्रतिशत हो गया, और एनडीएफ/ऑफशोर दरें 98.41 रुपये के स्तर पर पहुंच गईं।

एफपीआई और एफडीआई निकासी का दबाव

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मोर्चे पर, मौजूदा हालात में मुनाफावसूली या फंड रिलोकेशन के कारण ये खिलाड़ी अपना पैसा निकाल रहे हैं, जिससे बैंकों पर वास्तविक मांग का दबाव बढ़ रहा है। इसलिए एसबीआई ने सिफारिश की है कि 100 मिलियन डॉलर की सीमा को पूरे बैंक स्तर के बजाय केवल 'ट्रेडिंग बुक' पर लागू किया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक परिचालन चुनौतियों से बचा जा सके।

अब आगे क्या?

मौजूदा भू-राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी फंडों की निकासी के बीच, एसबीआई की यह रिपोर्ट आरबीआई के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश पेश करती है। रुपये की गिरावट थामने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का सक्रिय उपयोग और नेट ओपन पोजीशन के नियमों में उचित बदलाव ही आने वाले दिनों में बाजार की स्थिरता और भारतीय मुद्रा की मजबूती तय करेंगे।

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