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West Asia Crisis: युद्ध ठंडा, फिर क्यों उबाल मार रहा कच्चा तेल? चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा
अमर उजाला बोनस
Published by: अमन तिवारी
Updated Fri, 01 May 2026 12:30 PM IST
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सार
ईरान युद्ध बढ़ने की आशंका के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इसका मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति में भारी कमी है।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobestock
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विस्तार
जब युद्ध अपने सबसे तेज दौर में था, तब कच्चे तेल ने इतनी बड़ी छलांग नहीं लगाई थी। लेकिन अब, जब बातचीत की कोशिशें दिख रही हैं और युद्ध की रफ्तार कुछ धीमी लग रही है, उसी समय ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। यह विरोधाभास नहीं है। तेल बाजार युद्ध की आवाज नहीं, सप्लाई की सांस सुनता है।
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गुरुवार को ब्रेंट क्रूड 125 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। जून में डिलीवरी मिलने वाला कच्चा तेल (ब्रेंट) 6.2 फीसदी उछलकर 125.36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा। जुलाई डिलीवरी वाला ब्रेंट भी 3.1 फीसदी चढ़ा। याद दिलाते चलें कि युद्ध शुरू होने से पहले फरवरी के अंत में ब्रेंट करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। यानी कुछ ही हफ्तों में बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। दिन के दौरान ब्रेंट 126.41 डॉलर तक गया, हालांकि बाद में फिसलकर 115.98 डॉलर के आसपास आ गया।
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असल वजह है होर्मुज स्ट्रेट। यह दुनिया के तेल व्यापार की सबसे संवेदनशील समुद्री नसों में से एक है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक संकट से पहले होर्मुज से रोज 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल, NGL और रिफाइंड उत्पाद निकलते थे। अप्रैल की शुरुआत में यह घटकर सिर्फ 3.8 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया। वैकल्पिक रास्तों से निर्यात जरूर बढ़कर 7.2 मिलियन बैरल प्रति दिन हुआ, लेकिन कुल निर्यात नुकसान अभी भी 13 मिलियन बैरल प्रति दिन से ज्यादा है।
केडिया कमोडिटी के प्रमुख अजय केडिया इसी आंकड़े का संदर्भ देते हुए कहते हैं यही वह आंकड़ा है जिसने बाजार को बेचैन किया हुआ है। युद्ध रुक भी जाए, तो जहाज तुरंत नहीं चलेंगे। बीमा, रूट, बंदरगाह, लोडिंग और रिफाइनरी सप्लाई चेन को सामान्य होने में समय लगेगा। यही बात कच्चे तेल के बाजार को परेशान कर रही है। रॉयटर्स के एक हालिया पोल में विश्लेषकों ने कहा है कि शांति की बातचीत आगे बढ़ने पर भी मध्य-पूर्व से निर्यात धीरे-धीरे ही बहाल होगा। इसी वजह से 2026 के लिए ब्रेंट का औसत अनुमान बढ़ाकर 86.38 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है।
तेल में इस तेजी की दूसरी बड़ी वजह ढूंढने के लिए जब हमने अर्थवृक्ष फाइनेंनशियल सर्विसेस के फाउंडर रविंद्र राव से बात की तो उन्होंने बताया कि सप्लाई प्रभावित होने की वजह से क्रूड की कीमतों में मजबूती देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि ट्रंप ने साफ कहा है कि जब तक ईरान परमाणु समझौता नहीं करता, तक ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी जारी रहेगी, जिससे तेल की सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। राव कहते हैं कि जब बाजार को पता है कि तेल अभी नहीं मिल रहा, तो जो कॉन्ट्रैक्ट आज डिलीवरी का है वो सबसे ज्यादा महंगा हो जाता है। रिफाइनरी और ट्रेडर्स को अभी तेल चाहिए तो वो किसी भी कीमत पर खरीदने को तैयार हो जाते हैं वे जून या जुलाई का इंतजार नहीं कर सकते। साथ ही संयुक्त अरब अमीरात ने अचानक OPEC छोड़ दिया, जिससे बाजार में और अनिश्चितता बढ़ गई और आपूर्ति की स्थिति और कमजोर हो गई।
IEA के आंकड़े बताते हैं मार्च में वैश्विक तेल भंडार 85 मिलियन बैरल घटा है। मध्य-पूर्व खाड़ी के बाहर स्टॉक में 205 मिलियन बैरल की बड़ी गिरावट आई। समुद्र में चल रहा तेल भी घटा है। IEA के मुताबिक ऑयल ऑन वाटर 107 मिलियन बैरल कम हुआ, क्योंकि होर्मुज के लगभग बंद होने से ट्रांजिट में मौजूद तेल 181 मिलियन बैरल घट गया।
अमेरिका के आंकड़े भी यही कहानी बताते हैं। अमेरिका के ऊर्जा विभाग (EIA) के आंकड़े बताते हैं कि 24 अप्रैल वाले सप्ताह में अमेरिकी क्रूड स्टॉक 6.2 मिलियन बैरल घटकर 459.5 मिलियन बैरल रह गया। दूसरी ओर अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक भी अमेरिका में स्टॉक 1.7 मिलिटन बैरल घट गया है। अमेरिका का क्रूड एक्सपोर्ट रिकॉर्ड 6.44 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंचा, क्योंकि यूरोप और एशिया मध्य-पूर्व की कमी पूरी करने के लिए अमेरिकी तेल खरीद रहे हैं। गैसोलीन स्टॉक 6.1 मिलियन बैरल और डिस्टिलेट स्टॉक 4.5 मिलियन बैरल घटे।
यानी बाजार में केवल डर नहीं है, असली बैरल भी कम हैं। पहले निवेशक मान रहे थे कि युद्ध का असर सीमित रहेगा। अब उन्हें लग रहा है कि होर्मुज, शिपिंग और रिफाइनरी सप्लाई में बाधा लंबी चल सकती है। EIA ने अप्रैल के अनुमान में 2026 के लिए ब्रेंट का औसत भाव 96 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। एजेंसी का अनुमान है कि ब्रेंट दूसरी तिमाही में 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पीक कर सकता है और सप्लाई की अनिश्चितता के कारण कीमतों में रिस्क प्रीमियम बना रहेगा।
भारत के लिए यह चिंता और बड़ी है। भारत की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 88 फीसदी से अधिक है। इसलिए कच्चे तेल का उछाल भारत के लिए सिर्फ बाजार की खबर नहीं है। यह आयात बिल, रुपए, पेट्रोल-डीजल की कीमत, माल ढुलाई और महंगाई से जुड़ा जोखिम है। युद्ध की आवाज भले धीमी पड़ती दिखे, लेकिन तेल बाजार को अभी रास्ता खुलता नहीं दिख रहा। और जब रास्ता बंद हो, स्टॉक घट रहे हों और खरीदार वैकल्पिक तेल के लिए भाग रहे हों, तब कच्चा तेल बातचीत की खबर पर नहीं, सप्लाई की सच्चाई पर चलता है।
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