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चेक बाउंस: न डरें, न हल्के में लें; जानिए जेल का डर कितना सच और धारा 138 में क्या है सजा और कब होती है सख्ती?

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला। Published by: Shubham Kumar Updated Mon, 02 Mar 2026 05:49 AM IST
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सार

चेक बाउंस का मामला कितना गंभीर हो सकता है, इसका सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण मशहूर अभिनेता राजपाल यादव हैं। कानूनी दांवपेंच और कैजुअल रवैया कैसे किसी को जेल की दहलीज तक ले जा सकता है, यह राजपाल यादव के केस से साफ झलकता है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

चेक बाउंस होना नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत एक अर्ध-आपराधिक अपराध है। यानी मामला तो पैसों के लेनदेन का है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में इसलिए रखा गया है ताकि लोग चेक देने में अनुशासन बरतें। चेक बाउंस होने पर जेल जाना बहुत दुर्लभ है। अदालतों का प्राथमिक उद्देश्य आपको जेल भेजना नहीं, बल्कि जिसका पैसा है उसे उसका हक दिलाना है। अगर आप आदतन डिफॉल्टर हैं, जानबूझकर भुगतान से बच रहे हैं या स्टॉप पेमेंट जैसे हथकंडे अपना रहे हैं तो कोर्ट सख्त हो सकता है।

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वैसे तो दो साल तक की जेल और चेक की राशि से दोगुना जुर्माना हो सकता है, लेकिन ज्यादातर मामले आपसी समझौते पर खत्म हो जाते हैं। चेक बाउंस होने के बाद जब आपको कानूनी नोटिस मिलता है, तो वहां से 15 दिनों की समय सीमा शुरू होती है।

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  • चूक न करें : कई लोग इसे सिर्फ डराने का तरीका मानते हैं और चुप बैठ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आपकी सबसे बड़ी गलती है।
  • व्हाट्सएप भी है गवाह : व्हाट्सएप पर की गई बातें भी कोर्ट में आपके खिलाफ सबूत बन सकती हैं। अगर इन 15 दिनों में पेमेंट हो गया, तो केस फाइल ही नहीं होगा।


CIBIL पर पड़ेगा असर
चेक बाउंस का सबसे पहला असर आपकी क्रेडिट रेटिंग पर पड़ता है। अगर बाउंस हुआ चेक किसी लोन की EMI का है, तो आपका सिबिल स्कोर तुरंत गिर जाएगा। भविष्य में लोन मिलना पहाड़ चढ़ने जैसा मुश्किल होगा। बैंक हर बाउंस पर 500 से 1,000 रुपये तक की पेनल्टी लगाते हैं और बार-बार ऐसा होने पर आपकी चेक बुक सुविधा भी छीनी जा सकती है।

ये तीन बातें बांध लें गांठ

  • यह गलतफहमी पालना छोड़ दें कि 'सिक्योरिटी' के नाम पर दिया गया चेक कानूनी नहीं है। अगर आपकी देनदारी बनती है, तो सिक्योरिटी चेक भी बाउंस होने पर केस चल सकता है।
  • तारीख आने पर पोस्ट-डेटेड चेक की कानूनी हैसियत सामान्य चेक जैसी ही हो जाती है।
  • नोटिस मिलते ही सामने वाले से संवाद करें। लिखित समझौता हमेशा कोर्ट-कचहरी के चक्करों से सस्ता और बेहतर होता है।


डिस्क्लेमर: अपना पैसा में छपे विचार, राय और निवेश संबंधी सुझाव अलग-अलग विशेषज्ञों, ब्रोकर फर्मों या रिसर्च संस्थानों के हैं। इनसे अखबार या उसके प्रबंधन की सहमति जरूरी नहीं है। कृपया किसी भी तरह का निवेश फैसला लेने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी अखबार या उसके प्रबंधन की नहीं होगी।

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