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भारत सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार: विदेशी ब्रांड उठा रहे पीएलआई जैसी योजनाओं का ज्यादा लाभ, स्वदेशी कंपनियां पीछे
अजीत सिंह, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 16 Jan 2026 04:50 AM IST
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सार
भारत दुनिया का बड़ा उपभोक्ता बाजार और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फैक्टरी बन चुका है। लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद पीएलआई जैसी योजनाओं का सबसे ज्यादा फायदा विदेशी ब्रांड उठा रहे हैं। सवाल यह है कि अगर स्वदेशी कंपनियां पीछे रहीं, तो भारत का विनिर्माण भविष्य किसके हाथ में होगा?
पीएलआई योजना (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
मोदी सरकार ने भारत को सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ दुनिया की दूसरी बड़ी फैक्टरी भी बना दिया है। स्वदेशी जैसे लक्ष्य को पाने में मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) समेत अन्य योजनाओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, इनका ज्यादा फायदा विदेशी ब्रांड उठा रहे हैं। स्वदेशी कंपनियां दौड़ में पीछे हो रही हैं।
सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि भारत उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्टहोम अप्लायंसेज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। यह बाजार उपभोक्ता के साथ विक्रेता के रूप में भी स्थापित हो चुका है। 2014-15 में मोबाइल का घरेलू उत्पादन महज 18,000 करोड़ रुपये का था, जो 2024-25 में 28 गुना बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ी भूमिका पीएलआई की रही है।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस योजना का सबसे ज्यादा लाभ विदेशी ब्रांडों को मिला है। स्वदेशी कंपनियां इन योजनाओं का उतना बेहतर तरीके से लाभ नहीं उठा पातीं। यह सब बौद्धिक संपदा और ब्रांडों के तहत हो रहा है, जिनका मालिकाना हक भारत के पास नहीं है। इसका मतलब है कि ये भविष्य सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेहतर लागत मिलने पर अन्य देशों की ओर अपनी विनिर्माण क्षमता मोड़ सकती हैं। भारत को दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनाने का एकमात्र तरीका भारतीय ब्रांड को मजबूत करना है, जो न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें।
ये भी पढ़ें: IPO बाजार में सख्ती: सेबी प्रमुख ने कठोर खुलासे और स्वतंत्र ऑडिट पर दिया जोर, निवेश बैंकरों को दी कड़ी चेतावनी
ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन का दबदबा
आईटेल इंडिया के सीईओ अरिजीत तलपात्रा ने कहा, आज कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में ताइवान, दक्षिण कोरिया एवं चीन के ब्रांड सरकारी नीतियों का सबसे ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में भारतीय विनिर्माता अपने ही बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते।
तो बढ़ेंगी कंपनियां
सरकारी खरीदारी में प्राथमिकता मिलने से भारतीय कंपनियां नई क्षमता हासिल कर सकती हैं और कोरियाई-चीनी प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला कर सकती हैं। दक्षिण कोरिया और चीन घरेलू कंपनियों से ही खरीद पर जोर देते हैं।
घरेलू कंपनियों को मिले मौके
कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के सरकारी टेंडरों में अक्सर सैमसंग, एसर, आसुस भाग लेती हैं और सफल होती हैं। ये कंपनियां भारत में उत्पाद असेंबल करती हैं, लेकिन असली मूल्यवर्धन, डिजाइन और कोर आईपी विदेश में ही रहता है। ऐसे टेंडर में भारतीय निर्माताओं को स्थानीय क्षमताओं के बावजूद नुकसान झेलना पड़ता है।
ये भी पढ़ें: बुलियन मार्केट में तेजी बरकरार: चांदी ₹2.89 लाख और सोना ₹1.47 लाख के रिकॉर्ड स्तर पर, औद्योगिक मांग से रफ्तार
मांग...घरेलू कंपनियों को मिले प्राथमिकता
भारतीय कंपनियों ने उम्मीद जताई है कि जिन उत्पादों में गुणवत्ता मानक पूरे हों, वहां भारतीय स्वामित्व वाले निर्माताओं को प्राथमिकता दी जाए। सरकारी टेंडरों का मूल्यांकन घरेलू मूल्यवर्धन, लाइफसाइकल लागत और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव के आधार पर किया जाए। इसमें पारदर्शिता सुनिश्चित हो, ताकि विदेशी और भारतीय खिलाड़ी समान प्रतिस्पर्धा कर सकें।
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सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि भारत उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्टहोम अप्लायंसेज के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। यह बाजार उपभोक्ता के साथ विक्रेता के रूप में भी स्थापित हो चुका है। 2014-15 में मोबाइल का घरेलू उत्पादन महज 18,000 करोड़ रुपये का था, जो 2024-25 में 28 गुना बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ी भूमिका पीएलआई की रही है।
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आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस योजना का सबसे ज्यादा लाभ विदेशी ब्रांडों को मिला है। स्वदेशी कंपनियां इन योजनाओं का उतना बेहतर तरीके से लाभ नहीं उठा पातीं। यह सब बौद्धिक संपदा और ब्रांडों के तहत हो रहा है, जिनका मालिकाना हक भारत के पास नहीं है। इसका मतलब है कि ये भविष्य सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेहतर लागत मिलने पर अन्य देशों की ओर अपनी विनिर्माण क्षमता मोड़ सकती हैं। भारत को दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनाने का एकमात्र तरीका भारतीय ब्रांड को मजबूत करना है, जो न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें।
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ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन का दबदबा
आईटेल इंडिया के सीईओ अरिजीत तलपात्रा ने कहा, आज कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में ताइवान, दक्षिण कोरिया एवं चीन के ब्रांड सरकारी नीतियों का सबसे ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में भारतीय विनिर्माता अपने ही बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते।
तो बढ़ेंगी कंपनियां
सरकारी खरीदारी में प्राथमिकता मिलने से भारतीय कंपनियां नई क्षमता हासिल कर सकती हैं और कोरियाई-चीनी प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला कर सकती हैं। दक्षिण कोरिया और चीन घरेलू कंपनियों से ही खरीद पर जोर देते हैं।
घरेलू कंपनियों को मिले मौके
- पीएलआई योजना से जुड़ी भारतीय कंपनियों का कहना है कि वे विदेशी ब्रांड को बाहर करने की मांग नहीं कर रही हैं। इसके बजाय वे अपने लिए प्राथमिकता, समान अवसर और घरेलू मूल्यवर्धन का निष्पक्ष मूल्यांकन चाहती हैं।
- उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं और इलेक्ट्रॉनिक्स में भारतीय ब्रांडों में वोबल, डिक्सन और लावा जैसी कंपनियां हैं। ये गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन करती हैं। घरेलू आपूर्ति शृंखला में निवेश करती हैं।
कंज्यूमर ड्यूरेबल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के सरकारी टेंडरों में अक्सर सैमसंग, एसर, आसुस भाग लेती हैं और सफल होती हैं। ये कंपनियां भारत में उत्पाद असेंबल करती हैं, लेकिन असली मूल्यवर्धन, डिजाइन और कोर आईपी विदेश में ही रहता है। ऐसे टेंडर में भारतीय निर्माताओं को स्थानीय क्षमताओं के बावजूद नुकसान झेलना पड़ता है।
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मांग...घरेलू कंपनियों को मिले प्राथमिकता
भारतीय कंपनियों ने उम्मीद जताई है कि जिन उत्पादों में गुणवत्ता मानक पूरे हों, वहां भारतीय स्वामित्व वाले निर्माताओं को प्राथमिकता दी जाए। सरकारी टेंडरों का मूल्यांकन घरेलू मूल्यवर्धन, लाइफसाइकल लागत और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव के आधार पर किया जाए। इसमें पारदर्शिता सुनिश्चित हो, ताकि विदेशी और भारतीय खिलाड़ी समान प्रतिस्पर्धा कर सकें।
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