Capital Gains: विदेशी निवेशकों को बड़ी राहत, सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर 'कैपिटल गेन्स टैक्स' से मिली छूट
सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को बड़ी राहत देते हुए सरकारी प्रतिभूतियों पर पूंजीगत लाभ कर से छूट का अध्यादेश जारी किया है। बाजार पर इसका क्या असर होगा, पूरी खबर यहां पढ़ें।
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डॉलर के प्रवाह को भारत की ओर आकर्षित करने और रुपये को स्थिरता देने के लिए सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। शुक्रवार को जारी किए गए एक अध्यादेश के जरिए सरकार ने आयकर अधिनियम में बदलाव करते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सैक्स) में किए गए निवेश पर लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। इस बड़े फैसले का मुख्य उद्देश्य लंबे समय तक टिकने वाली पूंजी को भारतीय बाजार में आकर्षित करना है, क्योंकि इन सरकारी ऋण साधनों की अवधि काफी लंबी होती है।
क्या है सरकार का नया अध्यादेश?
इस नए अध्यादेश से पहले विदेशी संस्थागत निवेशकों को इक्विटी और ऋण (डेट) निवेश से होने वाले मुनाफे पर 12.5 प्रतिशत का लंबी अवधि का पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर चुकाना पड़ता था, जिसे जुलाई 2024 के बजट में 10 प्रतिशत से बढ़ाकर लागू किया गया था। कर छूट का यह फैसला ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में आया है जब भू-राजनीतिक तनाव के कारण विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक शेयर बाजार से 2.6 लाख करोड़ रुपये की भारी रकम निकाल ली है। यह आंकड़ा पूरे 2025 में निकाले गए 1.66 लाख करोड़ रुपये से काफी अधिक है, और केवल जून के पहले तीन दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने 34,000 करोड़ रुपये की निकासी कर ली है।
रुपये की ऐतिहासिक गिरावट और गहराता दबाव
विदेशी फंड की इस भारी निकासी, महंगे कच्चे तेल, बढ़ते व्यापार घाटे और अमेरिकी व्यापार शुल्क (अमेरिकी टैरिफ) के कारण भारतीय मुद्रा पर भारी दबाव पड़ा है। 20 मई 2026 को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था। 28 फरवरी को ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये में लगभग 6 प्रतिशत और इस पूरे साल (2026) में अब तक कुल सात प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। कभी एशिया की सबसे स्थिर मुद्राओं में गिना जाने वाला भारतीय रुपया अब उभरते बाजारों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गया है।
फैसले के मायने और एफआईआई को फायदा
सरकारी प्रतिभूतियां (जी-सैक्स) अनिवार्य रूप से केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जारी किए गए सुरक्षित ऋण साधन होते हैं। आमतौर पर, जब विदेशी संस्थागत निवेशक इन प्रतिभूतियों को खरीदकर उन पर मुनाफा कमाते थे, तो उन्हें उस लाभ पर भारत में टैक्स देना पड़ता था। लेकिन, सरकार द्वारा जारी किए गए इस नए अध्यादेश के तहत कैपिटल गेन्स टैक्स में दी गई यह छूट भारतीय सरकारी ऋण बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए कहीं अधिक आकर्षक और लाभदायक बना देगी।
विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और आरबीआई के बचाव के प्रयास
रुपये में हो रही इस अभूतपूर्व गिरावट को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रहा है। लगातार डॉलर बेचने के कारण 22 मई को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 7.511 अरब डॉलर घटकर 681.384 अरब डॉलर पर आ गया, जो कि मध्य पूर्व का संघर्ष शुरू होने से पहले 27 फरवरी को 728.494 अरब डॉलर के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर था। इसके अलावा, बाजार में विदेशी पूंजी बढ़ाने के लिए आरबीआई ने अलग से कुछ लंबी अवधि के सॉवरेन नोट्स (सरकारी बॉन्ड) को पूरी तरह से सुलभ श्रेणी में अनुमति दी है, जिससे विदेशी निवेशक अब इन्हें बिना किसी सीमा के खरीद सकेंगे।
बाजार और अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
पूंजीगत लाभ कर से छूट मिलने का सीधा अर्थ है कि विदेशी निवेशकों का कर का बोझ कम होगा, जिससे उनका शुद्ध मुनाफा बढ़ जाएगा। इस कदम से भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी में भारी उछाल आने की संभावना है। विदेशी मुद्रा का यह प्रवाह अर्थव्यवस्था में तरलता को बढ़ाएगा और सरकार के लिए अपने विकास और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए बाजार से आवश्यक धन जुटाना अधिक सुविधाजनक हो जाएगा।
सरकार की ओर से जारी यह अधिसूचना भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक निवेशकों के लिए खोलने और उनके अनुकूल बनाने की दिशा में एक बड़ा नीतिगत बदलाव है। विदेशी संस्थागत निवेशकों को दी गई इस कर छूट से न केवल बाजार का विश्वास मजबूत होगा, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी के दीर्घकालिक निवेश को भी एक मजबूत समर्थन मिलेगा।