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महंगाई की मार: महंगे कच्चे माल और उच्च ब्याज दरों से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव, जानिए रिपोर्ट के क्या दावा

Thu, 22 Oct 2026 05:35 PM IST
Navita R Asthana बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Navita R Asthana Updated Thu, 22 Oct 2026 05:35 PM IST
सार

  • भारत और अमेरिका की ब्याज दरों के बीच अंतर कम होने से विदेशी निवेश पर असर पड़ सकता है और रुपये पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
  • कच्चे माल और अन्य चीजों की लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ने की उम्मीद है। जिसका प्रभाव सितंबर तिमाही के नतीजों में दिखाई दे सकता है।

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Impact of rising costs on companies' profits may be visible in September quarter results: Report
महंगाई के आंकड़े - फोटो : ANI

विस्तार

वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में मजबूत प्रदर्शन के बाद अब भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर बढ़ती लागत और सख्त मौद्रिक नीति का दबाव दिखने लगा है। फ्रैंकलिन टेम्पलटन इंडिया म्यूचुअल फंड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल की ऊंची कीमतों, महंगे कच्चे तेल और भारत-अमेरिका के बीच घटते ब्याज दर अंतर के कारण कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ेगा। इस स्थिति का सीधा प्रभाव सितंबर तिमाही (Q2) के कॉरपोरेट नतीजों पर साफ नजर आ सकता है।

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सितंबर तिमाही में दबाव क्यों आ रहा है?

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कंपनियों के मुनाफे में अच्छी वृद्धि बनी रही थी, क्योंकि कंपनियां पहले से खरीदे गए सस्ते स्टॉक का इस्तेमाल कर रही थीं और उन्होंने अपने प्रॉडक्ट्स के दाम भी बढ़ा दिए थे। हालांकि, अब सस्ते स्टॉक का बफर खत्म हो चुका है और महंगे कच्चे माल की लागत का असर उत्पादन पर सीधे दिखने लगा है। 
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विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन सेक्टरों और कंपनियों को होगा, जो लागत बढ़ने के बावजूद ग्राहकों पर कीमतें बढ़ाने का बोझ डालने में सीमित क्षमता रखते हैं।
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रिजर्व बैंक दरें बढ़ाने पर क्यों मजबूर हुआ?

कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 95 से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटे के लिए एक बड़ा जोखिम हैं। कच्चे तेल के कारण खुदरा महंगाई में लगभग 30 बेसिस प्वॉइंट का इजाफा हुआ, जिससे देश की खुदरा महंगाई दर 4.5 प्रतिशत से बढ़कर 4.8 प्रतिशत तक पहुंच गई। 

महंगाई के इस दबाव को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने अक्तूबर 2026 की शुरुआत में रेपो रेट को 0.25 प्रतिशत (25 बीपीएस) बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। रिपोर्ट का मानना है कि केंद्रीय बैंक बाजार से अतिरिक्त तरलता कम करने के लिए वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो और ओपन मार्केट ऑपरेशंस के तहत सरकारी बॉन्ड की बिक्री जैसे कदम उठा सकता है।

ब्याज दरों का घटता अंतर विदेशी निवेश को कैसे प्रभावित कर रहा है?

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान द्वारा ब्याज दरों में 25-25 बेसिस प्वॉइंट की बढ़ोतरी के बाद सरकारी बॉन्ड यील्ड कई साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। अमेरिका में 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर 5.3 प्रतिशत दर्ज की गई। भारत में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की दर 7.2 प्रतिशत रही।

दोनों देशों की ब्याज दरों के बीच अंतर कम होने से भारत में विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) के फ्लो पर असर पड़ सकता है और भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही, बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तर पर होने से कंपनियों के लिए बाजार से पूंजी जुटाना भी महंगा हो गया है।

निवेशकों की रणनीति को लेकर रिपोर्ट में क्या सलाह दी गई है?

भारतीय शेयर बाजार में हाल ही में आई गिरावट के बाद कई शेयरों की कीमतें अब वाजिब और उचित स्तर पर आ गई हैं। पिछले दो वर्षों में शेयर बाजार से मिला कुल रिटर्न कमजोर रहा है, लेकिन कंपनियों की मजबूत बैलेंस शीट के दम पर वैल्यूएशन का स्तर अब निवेशकों के लिए आकर्षक बन रहा है।
  • पोर्टफोलियो में अनुशासन: बाजार की अनिश्चितता को देखते हुए निवेशकों को अपने निवेश को अलग-अलग एसेट क्लास में बांटकर रखना चाहिए।
  • कम अवधि वाले फंड: निवेशकों को कम अवधि की रणनीतियों और फिक्स्ड इनकम बाजार में नियमित ब्याज से कमाई करने वाले विकल्पों से फायदा मिल सकता है।
  • सक्रिय फंड प्रबंधन: ब्याज दरों में होने वाले बदलावों के अनुरूप सक्रिय रूप से अवधि तय करने वाली रणनीतियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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