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Oil Import: भारत ने बढ़ाई रूस और यूएई से तेल खरीद, अमेरिका को दिया झटका
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sun, 21 Jun 2026 03:53 PM IST
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सार
पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत ने अपनी तेल खरीद को विविध देशों में बांटा है, ताकि पश्चिम एशिया संकट के असर को कम किया जा सके। हालिया आंकड़ों के अनुसार, रूस, भारत का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश बना हुआ है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : @अमर उजाला
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विस्तार
हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पूरी तरह सामान्य होने से पहले भारत ने रूस और संयुक्त अरब अमीरात से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। विश्लेषकों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया है, ताकि पश्चिम एशिया संकट के असर को कम किया जा सके। समुद्री और कमोडिटी इंटेलिजेंस फर्म कपलर के आंकड़ों के मुताबिक, जून में 19 जून तक भारत ने रूस से औसतन 26.6 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया, जो मई में 19.1 लाख बैरल प्रतिदिन था। इसके साथ ही रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
अमेरिका को दिया झटका
वहीं, संयुक्त अरब अमीरात से जून में 6.36 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया गया, जो मई में दर्ज रिकॉर्ड 6.44 लाख बैरल से थोड़ा कम है। इस दौरान वेनेजुएला 2.09 लाख बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति के साथ भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जबकि सऊदी अरब से 3.84 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात हुआ। इसके विपरीत, अमेरिका से तेल आयात में तेज गिरावट दर्ज की गई। जून में यह घटकर 91,000 बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि मई में यह 2.52 लाख बैरल प्रतिदिन था।
रूस और यूएई पर बढ़ा भरोसा
विशेषज्ञों का कहना है कि रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए अब भी पहली पसंद बना हुआ है। वहीं यूएई से बढ़ी खरीद ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता की भरपाई करने में मदद की है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक भारत अपनी तेल, प्राकृतिक गैस (LNG) और रसोई गैस (LPG) की जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है।
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ईरान युद्ध के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई थी। यह जलमार्ग वैश्विक तेल खपत का लगभग 20 प्रतिशत वहन करता है और सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई तथा कतर जैसे देशों के लिए प्रमुख निर्यात मार्ग है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम समझौते के बाद पिछले सप्ताह के अंत से इस मार्ग से तेल आपूर्ति धीरे-धीरे बहाल होने लगी है। फिर भी ईरान द्वारा इस्राइल पर युद्धविराम उल्लंघन का आरोप लगाए जाने के कारण स्थिति को अभी भी नाजुक बनी हुई है।
ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर भारत
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत और एलपीजी खपत का लगभग 65 प्रतिशत आयात करता है। युद्ध से पहले खाड़ी क्षेत्र से भारत को कुल कच्चे तेल आयात का लगभग आधा, एलएनजी की दो-तिहाई जरूरत और एलपीजी आयात का लगभग 90 प्रतिशत गुजरता था। हाल के दिनों में स्थिति सामान्य होने के संकेत भी मिले हैं। भारत के तीन ध्वजवाहक तेल टैंकर, जिनमें 8.6 लाख टन से अधिक कच्चा तेल लदा था, और एक भारतीय एलएनजी पोत युद्धविराम समझौते के बाद सफलतापूर्वक हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर चुके हैं।
एलपीजी बाजार में अमेरिका की बढ़ी भूमिका
हॉर्मुज संकट के दौरान एलपीजी क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला। खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित होने के बाद अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख एलपीजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। पिछले वर्ष हुए दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, लंबी दूरी के कारण परिवहन लागत बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज के पूरी तरह सामान्य होने के बाद खाड़ी देशों की बाजार हिस्सेदारी फिर बढ़ सकती है, लेकिन भारत का आयात स्रोत पहले की तुलना में अधिक विविध बना रहेगा।
अमेरिका को दिया झटका
वहीं, संयुक्त अरब अमीरात से जून में 6.36 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया गया, जो मई में दर्ज रिकॉर्ड 6.44 लाख बैरल से थोड़ा कम है। इस दौरान वेनेजुएला 2.09 लाख बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति के साथ भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जबकि सऊदी अरब से 3.84 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात हुआ। इसके विपरीत, अमेरिका से तेल आयात में तेज गिरावट दर्ज की गई। जून में यह घटकर 91,000 बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि मई में यह 2.52 लाख बैरल प्रतिदिन था।
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रूस और यूएई पर बढ़ा भरोसा
विशेषज्ञों का कहना है कि रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए अब भी पहली पसंद बना हुआ है। वहीं यूएई से बढ़ी खरीद ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता की भरपाई करने में मदद की है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक भारत अपनी तेल, प्राकृतिक गैस (LNG) और रसोई गैस (LPG) की जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है।
ईरान युद्ध के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई थी। यह जलमार्ग वैश्विक तेल खपत का लगभग 20 प्रतिशत वहन करता है और सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई तथा कतर जैसे देशों के लिए प्रमुख निर्यात मार्ग है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम समझौते के बाद पिछले सप्ताह के अंत से इस मार्ग से तेल आपूर्ति धीरे-धीरे बहाल होने लगी है। फिर भी ईरान द्वारा इस्राइल पर युद्धविराम उल्लंघन का आरोप लगाए जाने के कारण स्थिति को अभी भी नाजुक बनी हुई है।
ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर भारत
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत और एलपीजी खपत का लगभग 65 प्रतिशत आयात करता है। युद्ध से पहले खाड़ी क्षेत्र से भारत को कुल कच्चे तेल आयात का लगभग आधा, एलएनजी की दो-तिहाई जरूरत और एलपीजी आयात का लगभग 90 प्रतिशत गुजरता था। हाल के दिनों में स्थिति सामान्य होने के संकेत भी मिले हैं। भारत के तीन ध्वजवाहक तेल टैंकर, जिनमें 8.6 लाख टन से अधिक कच्चा तेल लदा था, और एक भारतीय एलएनजी पोत युद्धविराम समझौते के बाद सफलतापूर्वक हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर चुके हैं।
एलपीजी बाजार में अमेरिका की बढ़ी भूमिका
हॉर्मुज संकट के दौरान एलपीजी क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला। खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित होने के बाद अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख एलपीजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। पिछले वर्ष हुए दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, लंबी दूरी के कारण परिवहन लागत बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज के पूरी तरह सामान्य होने के बाद खाड़ी देशों की बाजार हिस्सेदारी फिर बढ़ सकती है, लेकिन भारत का आयात स्रोत पहले की तुलना में अधिक विविध बना रहेगा।