Niti Aayog: सौर ऊर्जा के मामले में बड़ा खुलासा, जानिए चीन पर निर्भरता खत्म कर करने के मामले में हम कहां
नीति आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत के सौर ऊर्जा सेक्टर को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। जानिए कैसे 100 GW क्षमता के बावजूद भारत चीन से आयात करने को मजबूर है और आगे की राह क्या है।
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भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर छू लिया है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सौर मॉड्यूल बनाने की क्षमता साल 2014 के महज 2.3 गीगावाट से बढ़कर अगस्त 2025 में रिकॉर्ड 100 गीगावाट पहुंच चुकी है। लेकिन इस शानदार कामयाबी के पीछे एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। भारत आज भी सोलर पैनल बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल और कल-पुर्जों के लिए विदेशों, विशेषकर चीन पर निर्भर है ।
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने कितनी बड़ी छलांग लगाई है?
भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2015 से 2025 के बीच देश ने अपनी ग्रिड में 103 गीगावाट सौर ऊर्जा जोड़ी है, जिससे मार्च 2025 तक भारत का कुल सौर ऊर्जा आधार 106 गीगावाट तक पहुंच गया है। साल 2030 तक भारत ने 280 गीगावाट सौर क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि देश को अगले कुछ वर्षों में 174 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़नी होगी, जिससे घरेलू स्तर पर सोलर कंपोनेंट्स (पुर्जों) की मांग काफी तेजी से बढ़ेगी।
भारी-भरकम क्षमता होने के बावजूद आयात पर क्यों निर्भर है देश?
नीति आयोग के मुताबिक, देश का सौर विनिर्माण मुख्य रूप से सोलर सेल और मॉड्यूल को असेंबल करने तक ही सीमित है। सोलर पैनल बनाने की शुरुआती कड़ियों, जैसे पॉलीसिल्कॉन, इंगट ) और वेफर के निर्माण में भारत की मौजूदगी बेहद सीमित है। वेफर मैन्युफैक्चरिंग न होने और सेल उत्पादन क्षमता कम होने के चलते, भारतीय विनिर्माताओं को बड़े पैमाने पर इनका आयात करना पड़ता है।
सौर आयात के मामले में चीन का दबदबा कितना बड़ा है?
चीन वैश्विक सौर विनिर्माण क्षेत्र पर पूरी तरह हावी है। दिसंबर 2024 तक दुनिया की कुल आपूर्ति क्षमता का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले चीन के पास था। यही कारण है कि साल 2024 में भारत के कुल सोलर सेल और मॉड्यूल आयात में चीन की हिस्सेदारी लगभग 59 प्रतिशत रही। यह आंकड़ा दर्शाता है कि घरेलू क्षमता बढ़ने के बावजूद चीन पर भारत की निर्भरता काफी गहरी है।
वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों का भारतीय उद्योगों पर क्या असर हो सकता है?
चीन में मैन्युफैक्चरिंग का एकीकरण और विदेशी संस्थाओं पर अमेरिका द्वारा संभावित प्रतिबंधों के कारण वैश्विक स्तर पर पॉलीसिल्कॉन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतें बढ़ने का खतरा है, जिसका सीधा असर भारतीय मॉड्यूल निर्माताओं की लागत पर पड़ेगा। हालांकि, सरकार के समय पर हस्तक्षेप और वर्तमान ओवरसप्लाई (अत्यधिक आपूर्ति) ने भारतीय उद्योगों को सहारा दिया है। लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भारत को जल्द ही एकीकृत मूल्य शृंखला अपनानी होगी।
आत्मनिर्भर बनने के लिए आगे की राह क्या होनी चाहिए?
नीति आयोग ने साफ चेतावनी दी है कि भारत को केवल असेंबलिंग तक सीमित रहने के बजाय पॉलीसिल्कॉन से लेकर सेल विनिर्माण तक की पूरी मूल्य श्रृंखला का भारत में ही विस्तार करना होगा। स्थिर बाजार की परिस्थितियां केवल उन्हीं कंपनियों के पक्ष में रहेंगी जो कच्चे माल से लेकर अंतिम उत्पाद तक खुद तैयार करती हैं। भारत को 2030 का लक्ष्य पाने और आयात से मुक्ति के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन (पिछड़ा एकीकरण) को तेज करना ही होगा।