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Explainer: दाने-दाने को तरस रहे ईरानी, महंगाई ने तोड़े दूसरे विश्व युद्ध के रिकॉर्ड, समझें तंगहाली की कहानी

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Mon, 08 Jun 2026 06:36 PM IST
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सार

ईरान की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। महंगाई 80 साल के सर्वोच्च स्तर पर है और खाने-पीने की चीजें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। अमेरिका-इस्राइल के साथ युद्ध, नौसैनिक नाकेबंदी और दशकों पुरानी आर्थिक नीतियों ने ईरान को कैसे खस्ताहाली के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है? आठ आसान सवालों में समझें पूरी कहानी। 

Iran's Economy in Freefall: Inflation Hits Highest Level Since WWII Amid War and Crisis
ईरान में महंगाई - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

पश्चिम एशिया में फरवरी महीने से शुरू हुआ जंग अब ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ता दिख रहा है। अमेरिका और इस्राइल की ओर से किए गए हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर जहां अमेरिका को खूब छकाया है, वहीं उसके इस कदम से वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई भी लगभग ठप पड़ गई और इसका असर बड़े पैमाने पर भारत समेत दुनियाभर के देशों को झेलना पड़ा। हालांकि, जंग का नुकसान ईरान को भी कम नहीं झेलना पड़ा। पहले अपने राष्ट्रप्रमुख और फिर बड़ी संख्या में अपने शीर्षस्थ नेताओं को गंवाने के बाद अब ईरान की रही-बची इकोनॉमी भी खस्ताहाल हो गई है। 

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ईरान के बाजार इन दिनों खरीदारों की भीड़ से नहीं, बल्कि मायूस चेहरों से भरे हैं। आम आदमी के लिए 'रेड मीट (लाल मांस) जुटाना अब एक सपना बन गया है और चिकन का इस्तेमाल अब सिर्फ मेहमानों के लिए होने लगा है। जंग से आहत ईरान में यह दर्द किसी एक परिवार का नहीं, बल्कि ईरान के लाखों घरों की कहानी है। सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान के ताजा आंकड़ों ने तो पूरी दुनिया को चौंका दिया है। देश में महंगाई 80 साल के शिखर पर पहुंच गई है। 
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आखिर तेल के कुओं पर बैठा देश ईरान एक भयावह आर्थिक दलदल में कैसे फंस गया? क्या यह सिर्फ युद्ध का नतीजा है या दशकों की खराब नीतियां इसका कारण हैं? आइए, आसान बोलचाल की भाषा में आठ सवालों के जरिए इस पूरे संकट को समझते हैं।

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Iran's Economy in Freefall: Inflation Hits Highest Level Since WWII Amid War and Crisis
ईरान की अमेरिका को चेतावनी - फोटो : IANS

सवाल: ईरान में मौजूदा महंगाई के आंकड़े कितने डरावने हैं?

जवाब: सेंट्रल बैंक ऑफ ईरान की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 21 अप्रैल से 20 मई के बीच वार्षिक महंगाई दर 77.2 प्रतिशत पर पहुंच गई। सामानों की प्वाइंट-टू-प्वाइंट महंगाई दर 113 प्रतिशत दर्ज की गई है। सबसे खौफनाक बात यह है कि 1942 (दूसरे विश्व युद्ध) के बाद ईरान में महंगाई का यह सबसे ऊंचा स्तर है। उस समय युद्ध के कारण खाद्य आपूर्ति शृंखलाएं (फूड सप्लाई चेन) टूट गई थीं और आज भी कुछ ऐसे ही हालात बन रहे हैं।

सवाल: क्या सच में आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है खाना-पीना?

जवाब: बिल्कुल। एक साल पहले एक किलो चावल की कीमत 18 लाख रियाल ($1.31) थी, जो अब 50 लाख रियाल ($3.63) के पार जा चुकी है। कुकिंग ऑयल (खाना पकाने का तेल प्रति लीटर) सात लाख रियाल से बढ़कर 30 लाख रियाल के ऊपर पहुंच गया है। आम गृहिणियां अब अंडे तक गिन-गिन कर इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।  महंगाई की यह रफ्तार इतनी तेज है कि मध्यम वर्ग और पेंशन पर निर्भर लोग पहली बार गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हो गए हैं।

सवाल: क्या यह भयानक महंगाई सिर्फ अमेरिका-इस्राइल युद्ध का नतीजा है?

जवाब: सिर्फ युद्ध इसका इकलौता कारण नहीं है। यह सच है कि युद्ध शुरू होने के बाद जनता में घबराहट फैल गई और उन्होंने जरूरी सामानों की जमाखोरी शुरू कर दी, इसके कारण बिना किसी भारी कमी के ही कीमतें आसमान छूने लगीं। लेकिन ईरान चेंबर ऑफ कॉमर्स के प्रमुख अरमान खालेघी इसे 'परफेक्ट इकॉनोमिक स्टॉर्म' (पांच कारकों का मिला-जुला तूफान) मानते हैं।

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ईरान को तेल बिक्री पर नहीं मिलेगी छूट - फोटो : ANI

सवाल: यह 'परफेक्ट इकॉनोमिक स्टॉर्म' क्या है जिसने अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया?

जवाब: खालेघी के अनुसार, ये पांच प्रमुख कारण एक साथ ईरान पर बरसे हैं:

  1. बुनियादी चीजों के आयात के लिए दी जाने वाली सब्सिडी वाली मुद्रा दर को खत्म करना।
  2. साल की शुरुआत में हुए भारी विरोध प्रदर्शन, जिन्होंने सुरक्षा और बाजार दोनों को हिला दिया।
  3. अमेरिका-इस्राइल युद्ध से पैदा हुई अफरा-तफरी।
  4. नए फारसी वर्ष की शुरुआत में वेतन और ऊर्जा (ईंधन) की कीमतों में बढ़ोतरी।
  5. नौसैनिक नाकेबंदी (होर्मुज की नाकेबंदी), इसने आयात-निर्यात को लगभग रोक दिया।

सवाल: नौसैनिक नाकेबंदी ने महंगाई को कैसे भड़काया?

जवाब: समुद्री रास्तों से मालवाहक जहाजों का ईरान आना अब एक जानलेवा और जोखिम भरा काम बन गया है। किसी जहाज पर हमले की महज एक खबर से ही बाजार में कीमतें बढ़ जाती हैं। मजबूरन आयातकों को सड़क के रास्ते माल मंगाना पड़ रहा है, जो बहुत महंगा है। इससे बाजार में सामान की कमी का डर फैल गया है, जो कीमतों को बेतहाशा बढ़ा रहा है।

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2019 के बाद पहली बार भारत आ रहा ईरान से तेल का जहाज - फोटो : ANI

सवाल: सरकार ने तो मजदूरी (वेतन) बढ़ाई थी, फिर भी लोगों को राहत क्यों नहीं मिली?

जवाब: कागजों पर सैलरी जरूर बढ़ी, लेकिन असलियत में वह महंगाई के आगे बौनी साबित हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों की 'असल क्रय शक्ति' बुरी तरह गिर गई है। महंगाई आम लोगों की ओर से पहले से जुटाई गई जमा-पूंजी को निगल रही है, फिर स्वास्थ्य और शिक्षा का बजट खा रही है, और अब सीधा असर दो वक्त की रोटी पर पड़ रहा है।

सवाल: आम ग्राहकों की छोड़िए, ईरान के बाजारों और व्यापारियों का क्या हाल है?

जवाब: दुकानदारों का कहना है कि बाजार दिखने में जिंदा लगता है, लेकिन असल में यह 'क्लिनिकली डेड' (कोमा में) है। ग्राहक अब बाजार में सिर्फ टहलने आते हैं क्योंकि कीमतें देखकर वे खाली हाथ लौट जाते हैं। थोक व्यापारियों के मुताबिक, 40 साल के इतिहास में, यहां तक कि भारी प्रतिबंधों के दौर में भी, उन्होंने इतनी भयानक मंदी नहीं देखी। व्यापारी अब मुनाफा नहीं कमा रहे हैं, बल्कि सिर्फ अपने पुश्तैनी कारोबार को दिवालिया होने से बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

Iran's Economy in Freefall: Inflation Hits Highest Level Since WWII Amid War and Crisis
ईरान की लड़ाई, घर-घर लाई महंगाई - फोटो : amarujala.com

सवाल: क्या इस संकट की जड़ें पुरानी हैं, या यह सिर्फ आज की बीमारी है?

जवाब: विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आज का नहीं, बल्कि दशकों पुरानी गलत नीतियों का परिणाम है। ईरान दशकों तक अपनी अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को 'पेट्रो-डॉलर' (तेल से होने वाली भारी कमाई) के मलहम से छिपाता रहा। अब जब उस 'एनेस्थीसिया' (बेहोशी की दवा) का असर खत्म हो गया है, तो सारी बीमारियां एक साथ उभर आई हैं। 

आगे क्या?

जवाब: अर्थशास्त्रियों की चेतावनी है कि ईरान मौजदा समय में जिस स्थिति में है, वह महज 'टिप ऑफ आइसबर्ग' है। अर्थव्यवस्था 'ना युद्ध-ना शांति' वाले एक बेहद खतरनाक और अस्थिर दौर में फंसी हुई है, जो किसी भी चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक साबित हो सकता है।

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