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Kharif: मानसून की बेरुखी से खेतों में सन्नाटा; खरीफ बुवाई 23% गिरी, क्या अल-नीनो बढ़ाएगा महंगाई?

Tue, 30 Jun 2026 03:35 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Tue, 30 Jun 2026 03:35 PM IST
सार

मानसून में देरी और अल-नीनो के बढ़ते खतरे से देश में खरीफ फसलों की बुवाई 23% घट गई है। कृषि क्षेत्र और खाद्य महंगाई पर इसके असर की पूरी इनसाइड स्टोरी जानने के लिए अभी पढ़ें। 

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Monsoon Deficit Hits Agriculture: Kharif Sowing Slumps 23%, El Nino Threatens Crop Yields
खरीफ फसलों की बुवाई सुस्त। - फोटो : amarujala.com

विस्तार

देश के कृषि और ग्रामीण क्षेत्र से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल सुस्त पड़ने से खरीफ फसलों की बुवाई में भारी गिरावट दर्ज की गई है। कमजोर मानसून और अल-नीनो के बढ़ते खतरे ने न सिर्फ किसानों बल्कि नीति निर्माताओं की भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इसका सीधा असर आने वाले दिनों में खाद्य आपूर्ति और महंगाई पर पड़ सकता है। 

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बुवाई के आंकड़ों में कितनी बड़ी गिरावट आई है?

कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 25 जून तक देश भर में खरीफ फसलों का कुल रकबा 182.72 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले साल की इसी अवधि (236.46 लाख हेक्टेयर) के मुकाबले पूरे 23 प्रतिशत कम है। मुख्य खरीफ फसल यानी धान का रकबा 25.17 प्रतिशत घटकर 34.41 लाख हेक्टेयर से 25.75 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। 

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सबसे ज्यादा मार तिलहन पर पड़ी है, जिसकी बुवाई 53.33 प्रतिशत गिरकर महज 16.99 लाख हेक्टेयर रह गई है। दालों की बुवाई 30.47 प्रतिशत घटी है, जिसमें अरहर (तूर) का रकबा 8.45 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.56 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसके अलावा, मोटे अनाज की बुवाई 36.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 31.84 लाख हेक्टेयर और कपास का रकबा 34.61 प्रतिशत गिरकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालांकि, गन्ने और जूट के रकबे में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

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मानसून की बेरुखी और अल-नीनो का क्या है पूरा गणित?

खरीफ फसलों की बुवाई सीधे तौर पर जून में शुरू होने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। लेकिन, भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार, 24 जून तक मानसूनी बारिश सामान्य से 42 प्रतिशत कम रही है। 


सबसे ज्यादा संकट मध्य भारत में है, जहां 59 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके अलावा पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 41 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 28 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 22 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। स्थिति को और गंभीर बनाने का काम 'अल-नीनो' कर रहा है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में फिलहाल अल-नीनो की स्थिति बनी हुई है, जिसके जून-सितंबर के मानसूनी सीजन में और मजबूत होने की आशंका है।

देश के प्रमुख जलाशयों की स्थिति कितनी चिंताजनक है?

बारिश न होने के कारण सिंचाई के लिए पानी का संकट भी गहराता जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा मॉनिटर किए जाने वाले 166 महत्वपूर्ण जलाशयों में 25 जून तक कुल जल स्तर 48.405 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) था, जो इनकी कुल क्षमता (एफआरएल) का सिर्फ 26.37 प्रतिशत है। 

यह जल भंडार पिछले साल के मुकाबले केवल 73.21 प्रतिशत ही है। चिंता की बात यह है कि 166 में से 55 जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य के 80 प्रतिशत या उससे नीचे चला गया है। इनमें से 29 जलाशय तो ऐसे हैं जहां जल स्तर सामान्य के 50 प्रतिशत या उससे भी नीचे आ गया है। 



मानसून की यह देरी और जलाशयों में पानी की कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है। यदि आने वाले हफ्तों में बारिश की स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो खरीफ उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, जिससे बाजारों में कृषि उपजों की आपूर्ति घटेगी और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।

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