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Pax Silica Explainer: तेल और हथियारों का दौर खत्म, अब चिप से तय होगी दुनिया की महाशक्ति और भारत की नई उड़ान
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Fri, 20 Feb 2026 04:35 PM IST
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सार
कोविड-19 के बाद चिप किल्लत'से जन्मी नई वैश्विक व्यवस्था 'पैक्स सिलिका' की शुरुआत कैसे हुई? दुनिया में जारी सेमीकंडक्टर रेस में भारत की रणनीतिक भूमिका क्या है? पढ़ें इससे जुड़ी पूरी रिपोर्ट।
पैक्स सिलिका
- फोटो : amarujala.com
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विस्तार
बीसवीं सदी में दुनिया पर राज करने के लिए तेल और स्टील की जरूरत होती थी, लेकिन 21वीं सदी की महाशक्ति अब एक छोटी सी सिलिकॉन चिप तय कर रही है। इसी तर्ज पर दुनिया 'पैक्स सिलिका' के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाला एक ऐसा आक्रामक भू-राजनीतिक और आर्थिक गठबंधन है, जिसने सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की दुनिया में चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए कूटनीतिक बिसात बिछा दी है। इस वैश्विक रेस में सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए भारत ने 20 फरवरी 2026 को इस एलीट ग्रुप में अपनी औपचारिक एंट्री दर्ज करा ली है। यह कदम भारत को महज एक आयातक से निकालकर चीन के सबसे बड़े और मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने जा रहा है।
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कैसे हुआ पैक्स सिलिका का जन्म?
जिस तरह कभी 'पैक्स रोमाना' या 'पैक्स अमेरिकाना' ने दुनिया का शक्ति संतुलन तय किया था, उसी तरह आज चिप्स और डेटा का नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा निर्धारित कर रहा है। पैक्स सिलिका की जड़ें मुख्य रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान चरमराई वैश्विक आपूर्ति शृंखला और दुनिय में चिप की किल्लत की गहराई में छिपी है। जब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को यह अहसास हुआ कि उनकी ऑटोमोबाइल से लेकर रक्षा उपकरणों तक की विशाल औद्योगिक मशीनरी कुछ एशियाई देशों पर निर्भर है, तब इस रणनीतिक निर्भरता को खत्म करने की कवायद शुरू हुई। इसके साथ ही, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तकनीकी तनाव और ताइवान जलडमरूमध्य में अस्थिरता ने दुनिया को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि भविष्य की वैश्विक शांति अब सिलिका के निर्बाध प्रवाह पर टिकी है।
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क्या है पैक्स सिलिका का मकसद?
इस गठबंधन का घोषित उद्देश्य भले ही आपूर्ति शृंखला में लचीलापन लाना हो, लेकिन इसका सबसे बड़ा मकसद चीन को अलग-थलग करना है। वर्तमान में दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण के मामले में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर चीन का नियंत्रण है। इसे काउंटर करने के लिए पैक्स सिलिका वाशिंगटन के मूविंग गैप सिद्धांत पर काम कर रहा है, ताकि एआई और सेमीकंडक्टर में चीन पर स्थायी तकनीकी बढ़त बनाए रखी जा सके। सहयोगी देशों के बीच निर्यात नियंत्रण और पूंजी प्रवाह का समन्वय करके, यह गठबंधन वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक 'सिलिकॉन कर्टेन' (सिलिकॉन पर्दा) खींच रहा है, जो चीन को एआई मॉडल प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण उपकरणों तक पहुंचने से रोकता है।
कौन-कौन से देश हैं पैक्स सिलिका का हिस्सा?
इस महा-गठबंधन में ऑस्ट्रेलिया, इस्राइल, जापान, नीदरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और ब्रिटेन शामिल हैं, जबकि ताइवान एक पर्यवेक्षक की भूमिका में है। हाल ही में यूएई और कतर जैसे देशों के जुड़ने से इस समूह को सस्ती ऊर्जा का भी लाभ मिला है। इस पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका डिजाइन, सॉफ्टवेयर और बौद्धिक संपदा (आईपी) का नेतृत्व कर रहा है। ताइवान अपनी दिग्गज कंपनी टीएसएमसी (टीएसएमसी) के जरिए उन्नत चिप्स का निर्माण कर रहा है, जबकि जापान और नीदरलैंड लिथोग्राफी जैसे जटिल उपकरणों की आपूर्ति में अपना एकाधिकार रखते हैं।
पैक्स सिलिका समूह में भारत के शामिल होने का क्या मतलब?
अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के बाद कूटनीतिक संबंधों में आई गर्माहट के चलते भारत ने इस गठबंधन में अपनी जगह पक्की की है। भारत की यह एंट्री दुनिया को एक स्पष्ट संदेश है कि कोई भी 'चाइना प्लस वन' रणनीति नई दिल्ली के बिना पूरी नहीं हो सकती। भारत इस गठबंधन की मेज पर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी भंडार, 1.45 अरब नागरिकों का डेटा और एक विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश लेकर आया है। इसके अलावा, दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत सेमीकंडक्टर डिजाइनर पहले से ही भारत में मौजूद हैं, जो इसे चिप डिजाइन का ग्लोबल पावरहाउस बनाते हैं। पैक्स सिलिका में शामिल होने से 'सेमीकॉन इंडिया' को जबर्दस्त रफ्तार मिलेगी, विदेशी निवेश (एफडीआई) आएगा और टाटा ग्रुप जैसी भारतीय कंपनियों को माइक्रोन जैसी ग्लोबल चिप कंपनियों के साथ काम करने का बड़ा मौका मिलेगा। भारत अब चिप्स का केवल उपभोग नहीं करेगा, बल्कि असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (एटीएमपी) में भी अपना दबदबा बनाएगा।
पैक्स सिलिका में शामिल होने के बीच भारत के लिए क्या सावधानी जरूरी?
हालांकि, पैक्स सिलिका का सफर भारत के लिए पूरी तरह से आसान नहीं होगा। इस एलीट क्लब में नई दिल्ली को कई नीतिगत चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। भारत अपने घरेलू टेक सेक्टर को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीतियों, भारी सब्सिडी और आयात नियमों पर काफी निर्भर करता है। इन घरेलू नीतियों का पैक्स सिलिका के मुक्त-बाजार दृष्टिकोण और समन्वित एंटी-डंपिंग उपायों के साथ टकराव हो सकता है, जिसके लिए भारत को बेहद सधी हुई कूटनीति की आवश्यकता होगी।
पैक्स सिलिका में शामिल होना भारत के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह बताता है भारत अब वैश्विक तकनीक का भविष्य तय करने वाले इस संभ्रांत गठबंधन में अपनी स्थायी जगह बना चुका है। एआई और चिप्स के इस वैश्विक महायुद्ध में भारत का एक निर्णायक महाशक्ति के रूप में उभरना तय है।
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