आरबीआई का बड़ा कदम: बैंकिंग सिस्टम में तरलता की कमी दूर करने के लिए डाले 48014 करोड़ रुपये, जानिए सबकुछ
आरबीआई ने सात दिन की वीआरआर नीलामी के जरिए बैंकिंग सिस्टम में 48,014 करोड़ रुपये डाले हैं। एडवांस टैक्स और आगामी जीएसटी भुगतान से लिक्विडिटी पर पड़े असर की पूरी और सटीक खबर पढ़ें। अभी क्लिक करें।
विस्तार
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को देश के बैंकिंग सिस्टम में 48,014 करोड़ रुपये की शाॅर्ट टर्म लिक्विडिटी यानी अल्पकालिक तरलता डाली है। केंद्रीय बैंक ने सात दिवसीय 'वेरिएबल रेट रेपो' (वीआरआर) नीलामी के जरिए बैंकिंग प्रणाली के लिए इस राशि का इंतजाम किया है। हाल ही में एडवांस टैक्स (अग्रिम कर) के भारी भुगतान के कारण बैंकिंग प्रणाली में नकदी के अधिशेष (सरप्लस लिक्विडिटी) में तेज गिरावट दर्ज की गई थी, जिसके बाद अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह संतुलित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े क्या कह रहे?
- आरबीआई की ओर से जारी बयान के अनुसार, यह फंड 5.26 प्रतिशत की कट-ऑफ दर और भारित औसत दर पर सिस्टम में डाला गया है।
- इस नीलामी से जुड़ी सबसे खास बात यह रही कि लिक्विडिटी में भारी गिरावट के बावजूद, बैंकों द्वारा ली गई यह राशि केंद्रीय बैंक की तय सीमा से काफी कम रही।
- आरबीआई ने इस वीआरआर नीलामी के लिए 1.50 लाख करोड़ रुपये की राशि अधिसूचित की थी।
- इसके मुकाबले सिस्टम में केवल 48,014 करोड़ रुपये ही डाले गए।
एडवांस टैक्स भुगतान से लिक्विडिटी पर कैसे पड़ता है असर?
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति में पिछले कुछ दिनों के भीतर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कॉरपोरेट्स द्वारा एडवांस टैक्स के भुगतान के कारण बैंकों से बड़े पैमाने पर फंड का आउटफ्लो हुआ है। एडवांस टैक्स के भुगतान से पहले, 15 मार्च को बैंकिंग प्रणाली में लगभग 2.08 लाख करोड़ रुपये की भारी अतिरिक्त लिक्विडिटी मौजूद थी। टैक्स आउटफ्लो के ठीक बाद, 16 मार्च को यह अधिशेष तेजी से गिरकर मात्र 75,483.63 करोड़ रुपये पर आ गया। इससे निपटने के लिए अल्पकालिक तरलता का प्रबंध किया गया है।
क्या है वीआरआर नीलामी?
वीआरआर (वेरिएबल रेट रेपो) नीलामी के तहत, भारतीय रिजर्व बैंक छोटी अवधि के लिए परिवर्तनशील ब्याज दरों पर फंड की नीलामी करता है। इस प्रक्रिया में वाणिज्यिक बैंकों को अपनी आवश्यकता के अनुसार एक निश्चित राशि के लिए बोली लगाने (विडिंग) की अनुमति होती है, जिससे वे अपनी तात्कालिक नकदी की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।
क्या आगे और लिक्विडिटी की होगी दिक्कत?
बाजार के जानकारों और मौजूदा रुझानों के अनुसार, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति आने वाले दिनों में और अधिक टाइट (तंग) होने की उम्मीद है। इसका मुख्य कारण इस सप्ताह के अंत में होने वाला वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का भुगतान है। जीएसटी आउटफ्लो के कारण बैंकों से और अधिक फंड बाहर जाएगा, जिससे नकदी का दबाव बढ़ सकता है।
ओवरनाइट दरों को नियंत्रित करने की कवायद
केंद्रीय बैंक पिछले कुछ महीनों से लगातार बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डाल रहा है ताकि ओवरनाइट दरों को नियंत्रण में रखा जा सके। लिक्विडिटी के इस निरंतर प्रवाह के कारण ही ओवरनाइट दरें रेपो रेट से काफी नीचे बनी हुई हैं।
ओवरनाइट दरें वह ब्याज दर है जिस पर बैंक और वित्तीय संस्थान आपस में एक दिन (24 घंटे या रातोंरात) के लिए धन उधार लेते या देते हैं। यह अल्पकालिक मुद्रा बाजार का हिस्सा है, इसका उपयोग बैंक अपनी दैनिक तरलता जरूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं। इस दर को भारत में भारित औसत कॉल दर यानी WACR के रूप में भी जाना जाता है। यह दर केंद्रीय बैंक की ओर से मौद्रिक नीति को लागू करने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में काम करती है।
इसके अलावा, रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 से आरबीआई ने सरकारी प्रतिभूतियों की ओपन मार्केट खरीद (ओएमओ) के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में कुल 3.50 लाख करोड़ रुपये की टिकाऊ लिक्विडिटी भी डाली है।