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RBI MPC Meeting: ब्याज दरें लंबी अवधि तक रहेंगी कम, गवर्नर ने दिए और कटौती के संकेत; एफडी पर घट सकता है रिटर्न

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Fri, 06 Feb 2026 03:04 PM IST
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सार

RBI Monetary Policy 2026: आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, ब्याज दरें लंबी अवधि तक कम रहेंगी। रेपो रेट 5.25% पर स्थिर। एफडी दरों में गिरावट के संकेत। जानें जीडीपी और लोन पर क्या होगा असर।

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आरबीआई एमपीसी - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से शुक्रवार को दो महीने के अंतराल पर होने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के फैसलों का एलान किया गया। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। हालांकि, केंद्रीय बैंक का आगे का रुख कर्जदारों के लिए बेहद राहत भरा है।

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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ किया है कि ब्याज दरें लंबी अवधि तक निचले स्तर पर बनी रहेंगी और भविष्य में इनके और नीचे जाने की उम्मीद है। एमपीसी ने रेपो रेट को 5.25% पर जस का तस रखा है और अपना रुख 'तटस्थ' बनाए रखा है। आरबीआई गवर्नर ने किन बातों पर जोर दिया, आइए जानें।
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दरों में कटौती का चक्र और एफडी निवेशकों पर असर
गवर्नर मल्होत्रा ने कहा, "नीतिगत दरें लंबे समय तक निचले स्तर पर बनी रहेंगी और वे और भी नीचे जा सकती हैं"। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि दरों पर अंतिम निर्णय एमपीसी की ओर से ही लिया जाएगा।

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल फरवरी से अब तक केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में कुल 125 आधार अंकों की कटौती की है। गवर्नर ने स्वीकार किया कि जमा पक्ष पर नीतिगत दरों में कटौती का असर धीमा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरें नीचे जाएंगी, जो निश्चित आय पर निर्भर निवेशकों के लिए चिंता का सबब बन सकता है। 

जीडीपी और व्यापार समझौतों का 'बूस्टर डोज'
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर आरबीआई का नजरिया सकारात्मक है। केंद्रीय बैंक ने अगले वित्त वर्ष की पहली और दूसरी तिमाही के लिए जीडीपी विकास दर के अनुमान को संशोधित कर बढ़ा दिया है। भारत द्वारा हाल ही में किए गए व्यापार समझौतों के प्रभाव पर एक सवाल का जवाब देते हुए गवर्नर ने कहा कि अन्य कारकों के साथ मिलकर ये समझौते देश की जीडीपी वृद्धि में 20 आधार अंकों तक का योगदान दे सकते हैं।

सरकारी उधारी और विदेशी निवेश
बजट के बाद सरकारी उधारी को लेकर बाजार की चिंताओं को दूर करते हुए डिप्टी गवर्नर टी रबी शंकर ने कहा कि आरबीआई सरकारी उधारी कार्यक्रम को आसानी से प्रबंधित कर लेगा।

  • अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार की सकल उधारी 17.2 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है।
  • शुद्ध उधारी 11.73 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।

गवर्नर मल्होत्रा ने कहा कि ट्रेजरी बिल्स यील्ड कर्व को प्रबंधित करने में मदद करेंगे और सरकार उचित दरों पर अपनी उधारी जुटाने में सक्षम होगी।

निवेश और करेंसी का हाल
बजट में डेटा सेंटर्स को लेकर की गई घोषणाओं पर गवर्नर ने कहा कि इससे देश में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आने की उम्मीद है। वहीं, नकदी के चलन पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले एक साल में 'करेंसी इन सर्कुलेशन' में काफी बढ़ोतरी हुई है।

आरबीआई की यह नीति समीक्षा बताती है कि केंद्रीय बैंक का फोकस अब भी विकास को सहारा देने पर है। जहां कर्जदारों के लिए ईएमआई कम होने की उम्मीद बरकरार है, वहीं जमाकर्ताओं को गिरती ब्याज दरों के दौर के लिए तैयार रहना होगा।

सोने-चांदी की चमक ने बढ़ाई तपिश
आरबीआई ने पहली बार साफ तौर पर माना है कि कीमती धातुओं की कीमतें अब महंगाई को आकार देने में अहम भूमिका निभा रही हैं। एमपीसी के बयान के अनुसार, महंगाई के दृष्टिकोण में जो मामूली बढ़ोतरी की गई है, उसमें लगभग 60-70 बेसिस पॉइंट्स (0.60-0.70%) का योगदान केवल कीमती धातुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण है।

गुरुवार को सोना 1.24% की गिरावट के बाद भी 1,48,860 रुपये प्रति 10 ग्राम के उच्च स्तर पर बंद हुआ। आरबीआई ने नोट किया कि वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशक 'सेफ-हेवन' के तौर पर सोने का रुख कर रहे हैं, जिससे इसकी कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर बनी हुई हैं। भले ही हेडलाइन इन्फ्लेशन का अनुमान बढ़ाया गया हो, लेकिन आंतरिक महंगाई की स्थिति नियंत्रण में दिख रही है। कोर इन्फ्लेशन यानी यदि सोने और चांदी को हटा दिया जाए, तो मुख्य महंगाई 2.6% (दिसंबर के आंकड़ों के अनुसार) पर स्थिर बनी हुई है।

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