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एसएंडपी का दावा: महंगा तेल नहीं रोक पाएगा रफ्तार, 6.3 फीसदी की दर से बढ़ेगी भारतीय अर्थव्यवस्था

एजेंसी/अमर उजाला ब्यूरो,नई दिल्ली/मुंबई। Published by: Nirmal Kant Updated Fri, 17 Apr 2026 04:43 AM IST
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सार

कच्चा तेल 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने पर भी भारत की अर्थव्यवस्था 6.3% की दर से बढ़ सकती है, जबकि सामान्य स्थिति में यह 7.1% रहने का अनुमान है। भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा। रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा, पढ़िए-

S&P report indian economy growth 6.3 percent despite high oil prices
भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार

वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने कहा है कि अगर चालू वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तब भी भारत की अर्थव्यवस्था 6.3 फीसदी की दर से बढ़ सकती है। एजेंसी के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के आधार स्तर पर रहती है, तो भारत की वृद्धि दर 7.1 फीसदी रहने का अनुमान है। यह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज रफ्तार होगी।
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एसएंडपी के निदेशक (संप्रभु एवं अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त रेटिंग) यी फर्न फुआ ने कहा, दुनिया की किसी भी प्रमुख अर्थव्यवस्था की तुलना में यह आंकड़ा बहुत मजबूत है। इस संकट काल में भारत की विकास दर 6.3 फीसदी रहना एक मजबूत संकेत है जो अन्य अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है।  हालांकि, एजेंसी ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा आपूर्ति में बाधा या ईंधन की कमी जैसी स्थितियां जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा, क्रूड की ऊंची कीमतों से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। कंपनियों की लागत बढ़ने से मुनाफा प्रभावित हो सकता है। इसके साथ ही महंगाई बढ़ने से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर भी दबाव पड़ सकता है।
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एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऊर्जा की बढ़ी कीमतों का असर कम करने के लिए सरकार को उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है। इससे राजकोषीय दबाव बढ़ेगा, लेकिन भारत की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग पर इसका खास असर नहीं पड़ेगा।

सरकार दीर्घकाल में राजकोषीय संतुलन के प्रति प्रतिबद्ध है। खर्चों में लचीलापन है और जरूरत पड़ने पर वह अन्य मदों में कटौती कर राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बनाए रख सकती है।

यदि ऊर्जा कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो 2026-27 में देश की शीर्ष 100 कंपनियों की आय में 15 से 20 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। इससे कर्ज बढ़ेगा जो अंततः उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव डालेगा। बड़ी कंपनियों का कर्ज से कमाई अनुपात (लीवरेज) 0.5 से एक गुना तक बढ़ सकता है।

रिफाइनिंग और एविएशन सेक्टर सबसे अधिक संवेदनशील हैं। ऊर्जा आयात पर निर्भर होने के कारण सीमेंट, धातु और स्टील जैसे क्षेत्र भी जोखिम में हैं। ईधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी से लोगों की क्रय शक्ति घट सकती है, जिसका असर बैंकिंग क्षेत्र पर भी पड़ेगा।

जोखिम वाले ऋण, वाहन ऋण और किफायती आवास में कमी आ सकती है। खराब स्थिति में एनपीए में बढ़ोतरी सालाना एक फीसदी के आसपास हो सकती है।

यदि हालात लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण बने रहते हैं तो रिजर्व बैंक कुछ क्षेत्रों के लिए ऋण पुनर्गठन की अनुमति दे सकता है ताकि अल्पकालिक नकदी दबाव को संभाला जा सके। फिलहाल भारत की बीबीबी निवेश-ग्रेड संप्रभु रेटिंग पर तत्काल कोई खतरा नहीं है।

पश्चिम एशिया संकट का प्रभाव सीमित देश की कर्ज अदायगी पर नहीं पड़ा असर
ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद भी भारत की कर्ज चुकाने की क्षमता मजबूत बनी हुई है। आयात-निर्यात बैंक (एक्जिम बैंक) ने कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भारतीय कंपनियों की कर्ज अदायगी पर अब तक कोई असर नहीं पड़ा है।

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आयात-निर्यात बैंक की एमडी और सीईओ हर्षा बंगारी ने बताया कि भले ही पश्चिम एशिया में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों की गतिविधियों पर हाल के महीनों में कुछ असर पड़ा हो, लेकिन उनकी ऋण चुकाने (पुनर्भुगतान) की क्षमता मजबूत बनी हुई है। स्थिर और भरोसेमंद आर्थिक बुनियाद ने वैश्विक अनिश्चितता के दौर में कंपनियों को वित्तीय संकट में फंसने से बचाया है। भारतीय कंपनियों की मजबूती का मुख्य कारण उनके राजस्व स्रोतों का विविधीकरण है। यह सिर्फ पश्चिम एशिया के देशों तक सीमित नहीं हैं। हालांकि, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कंपनियों के लिए बहुत-सी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। 

रुपये में जारी कमजोरी से एक्जिम बैंक को फायदा हो सकता है। बैंक का बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा में होता है, ऐसे में बैलेंस शीट मजबूत हो सकती है। मौजूदा परिस्थितियों में रुपये में कर्ज लेने को प्राथमिकता दी जा रही है।

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