LNG: कतर के एलएनजी टर्मिनल पर हमले के बाद बढ़ सकती हैं मुश्किलें, जानें वैश्विक गैस सप्लाई खतरे में कैसे
कतर के रास लाफान LNG टर्मिनल पर हमले से वैश्विक गैस सप्लाई को बड़ा झटका लगा है। भारी नुकसान के चलते सप्लाई बाधित हो सकती है और मरम्मत में तीन से पांच साल लगने का अनुमान है, जिससे खासकर एशिया में गैस की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
पिछले हफ्ते 19 मार्च को कतर के रास लाफान स्थित दुनिया के सबसे बड़े लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) टर्मिनल पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोन से हमला हुआ। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मच गई है। यह टर्मिनल दुनिया की कुल एलएनजी सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है।
हमले के बाद परिसर में स्थित गैस-टू-लिक्विड्स (GTL) प्लांट में भीषण आग लग गई। करीब 295 वर्ग किलोमीटर में फैले इस विशाल कॉम्प्लेक्स को भारी नुकसान पहुंचा है। शुरुआती आकलन के मुताबिक, करोड़ों-करोड़ डॉलर के निवेश को नुकसान हुआ है।
मरम्मत में लग सकता है पांच साल तक का समय
कतर एनर्जी के सीईओ साद शेरिदा अल-काबी ने संकेत दिए हैं कि कंपनी को फोर्स मेज्योर घोषित करना पड़ सकता है, यानी हालात के चलते लंबे समय के सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट पूरे नहीं किए जा सकेंगे। इसका असर इटली, बेल्जियम, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों को पांच साल तक झेलना पड़ सकता है। कंपनी के अनुसार, हमलों में प्रमुख उत्पादन सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे सालाना लगभग 20 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है। मरम्मत कार्य में तीन से पांच साल तक का समय लग सकता है।
एलएनजी सप्लाई पर बड़ा असर
रास लाफान टर्मिनल कतर की एलएनजी इंफ्रास्ट्रक्चर का करीब 17% हिस्सा संभालता है। इसके क्षतिग्रस्त होने से वैश्विक गैस बाजार में सप्लाई संकट गहराने की आशंका है। कतर की लगभग 75% एलएनजी सप्लाई एशियाई देशों खासतौर पर चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, ताइवान और पाकिस्तान को जाती है।
मरम्मत में लगेगा लंबा समय
विशेषज्ञों के मुताबिक एनएनजी प्लांट की मरम्मत बेहद जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है। प्लांट को पहले धीरे-धीरे गर्म और फिर ठंडा करना पड़ता है, क्योंकि अचानक तापमान बदलाव से पाइपलाइन और उपकरण टूट सकते हैं। भारी-भरकम मशीनें जैसे 50 मीटर लंबे हीट एक्सचेंजर और हजारों टन वजनी कंप्रेसर को बदलना भी आसान नहीं होता।
गैस बाजार में संरचनात्मक संकट
इस घटना ने एलएनजी संकट को सिर्फ लॉजिस्टिक समस्या से आगे बढ़ाकर संरचनात्मक संकट में बदल दिया है। पहले जहां होर्मुज जलडमरूमध्य की बाधा चिंता का कारण थी, अब उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ा है।
यूरोप में गैस के बेंचमार्क दाम डच टाइटल ट्रांसफर फैसिलिटी (TTF) मिड जनवरी के बाद से दोगुने से ज्यादा हो चुके हैं। वहीं, कोयले की मांग भी बढ़ी है, हालांकि उसकी कीमतों में अपेक्षाकृत कम तेजी आई है।
भारत समेत एशिया पर सबसे ज्यादा असर
ऊंची कीमतों का असर सबसे ज्यादा एशियाई देशों पर पड़ने की संभावना है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश, जो ईंधन की कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं, महंगे गैस के विकल्प के तौर पर कोयले की ओर रुख कर सकते हैं।
वैश्विक असर तय
एलएनजी एक वैश्विक बाजार का हिस्सा है, इसलिए किसी एक क्षेत्र में सप्लाई घटने का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कतर के इस प्रमुख टर्मिनल को हुए नुकसान की भरपाई में कई साल लग सकते हैं, जिससे गैस की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं।