PCI: क्या यूपीआई लेनदेन पर देना होगा चार्ज? पीसीआई ने किया यह दावा; जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर
क्या अब यूपीआई से लेनदेन पर आम लोगों को शुल्क का भुगतान करना होगा? पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने यूपीआई के मुफ्त बने रहने और मर्चेंट चार्ज से जुड़े हर भ्रम को दूर कर दिया है। पूरी खबर पढ़ें और जानें सच।
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भारत में चाय के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, यूपीआई हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका है। लेकिन हाल के दिनों में यूपीआई के जरिए लेनदेन पर चार्ज लगने की खबरों ने आम उपभोक्ताओं और छोटे दुकानदारों के बीच चिंता पैदा कर दी थी। इस भ्रम को पूरी तरह दूर करते हुए पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने साफ किया है कि ग्राहकों के लिए यूपीआई सेवाएं पूरी तरह मुफ्त बनी रहेंगी। डिजिटल इंडिया की रफ्तार को बनाए रखने और वित्तीय समावेशन को सुरक्षित रखने के लिहाज से यह स्पष्टीकरण एक बड़ा राहत देने वाला कदम है। देश में डिजिटल भुगतान उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए आईएएमएआई के तत्वावधान में वर्ष 2013 में पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन किया गया था।
क्या ग्राहकों को यूपीआई इस्तेमाल करने के लिए पैसे देने होंगे?
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया ने बिल्कुल साफ किया है कि उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई का उपयोग पूरी तरह से मुफ्त रहेगा। साल 2016 में अपनी शुरुआत के बाद से ही यूपीआई उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह फ्री रहा है और आगे भी हर भारतीय नागरिक बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के तत्काल डिजिटल लेनदेन कर सकेगा।
क्या छोटे दुकानदारों और किराना स्टोर पर यूपीआई भुगतान स्वीकार करने के लिए चार्ज लगेगा?
नहीं, छोटे व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए किसी भी तरह का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या चार्ज नहीं देना होगा। यूपीआई को देश के सबसे छोटे व्यवसायों के अनुकूल और सुलभ बनाने के लिए ही डिजाइन किया गया था। इसलिए छोटे दुकानदारों और किराना स्टोरों का संरक्षण इस डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ बना रहेगा।
यूपीआई शुल्क को लेकर अचानक यह चर्चा क्यों शुरू हुई है?
यूपीआई आज केवल एक भुगतान मंच नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम भुगतान प्रणाली बन चुकी है। हर महीने इस मंच के माध्यम से अरबों सुरक्षित लेनदेन किए जाते हैं। ऐसे में इस विशाल बुनियादी ढांचे को भविष्य में भी सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने और इसके संचालन को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के तरीकों पर चर्चा की जा रही है।
अगर यूपीआई पूरी तरह मुफ्त है, तो इसे चलाने का खर्च कौन उठाता है?
इतने बड़े राष्ट्रीय स्तर के डिजिटल बुनियादी ढांचे को चौबीसों घंटे चालू और सुरक्षित रखने के लिए भारी तकनीकी निवेश की जरूरत होती है। पिछले लगभग 10 वर्षों से बैंक, भुगतान कंपनियां, फिनटेक संस्थान, एनपीसीआई और आरबीआई लगातार तकनीक, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी की रोकथाम और नए नवाचारों पर खर्च कर रहे हैं। वर्तमान में इस परिचालन लागत का पूरा भार इस पारिस्थितिकी तंत्र के प्रतिभागी जैसे बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता ही उठा रहे हैं ताकि उपभोक्ताओं को सुरक्षित भुगतान का अनुभव मिलता रहे।
क्या बड़े मर्चेंट्स और पेमेंट प्रदाताओं के बीच होने वाले व्यावसायिक समझौतों का असर ग्राहकों पर पड़ेगा?
नहीं, इसका आम ग्राहकों पर कोई असर नहीं होगा। बड़े व्यापारियों और पेमेंट प्रदाताओं के बीच मर्चेंट सर्विस चार्ज को लेकर होने वाले समझौते विशुद्ध रूप से व्यावसायिक व्यवस्था के तहत आते हैं। वैश्विक स्तर पर भी डिजिटल पेमेंट सिस्टम में मर्चेंट सर्विस चार्ज एक सामान्य प्रक्रिया है और इसके कारण उपभोक्ताओं को भुगतान नहीं करना पड़ता।
यूपीआई के इस बुनियादी ढांचे को लगातार बनाए रखना क्यों जरूरी है?
यूपीआई अब देश का एक महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचा बन चुका है जिसे रोजाना करोड़ों भारतीय इस्तेमाल करते हैं। जैसे-जैसे इसके लेनदेन का दायरा और वॉल्यूम बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसकी सुरक्षा, लचीलापन, नए नवाचार और धोखाधड़ी नियंत्रण को लगातार अपग्रेड करना बेहद जरूरी है ताकि आने वाले वर्षों में भी देश का भरोसा इस पर टिका रहे।
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया के वर्तमान रुख से यह साफ हो गया है कि ग्राहकों और छोटे दुकानदारों को यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए कोई अतिरिक्त जेब ढीली नहीं करनी होगी। बड़े व्यावसायिक स्तर पर होने वाले समझौते इसके तकनीकी संचालन को मजबूत करने के लिए हैं, जिससे ग्राहकों की सुरक्षा और सुलभता और अधिक सुदृढ़ होगी।