Textile: भारतीय कपड़ा उद्योग में लौटा दम; अमेरिकी शुल्क कम होने से मांग में तेजी, रिपोर्ट में दावा
डोलाट कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी शुल्क कम होने और वैश्विक मांग में सुधार से भारतीय कपड़ा क्षेत्र में तेजी आई है। उद्योग के बुनियादी सिद्धांत मजबूत हुए और मुक्त व्यापार समझौतों से भारत की स्थिति मजबूत हुई।
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भारतीय कपड़ा क्षेत्र अब सुधार के दौर में प्रवेश कर रहा है। अमेरिकी शुल्कों से जुड़ी अनिश्चितता कम होने और वैश्विक मांग में सुधार से यह संभव हुआ है। रिपोर्ट में उद्योग के बेहतर बुनियादी सिद्धांतों, मांग की स्पष्टता और अनुकूल नीतिगत विकास पर जोर दिया गया है। यह क्षेत्र अब नए आशावाद के चरण में प्रवेश कर रहा है। डोलाट कैपिटल की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 के अंत में एक बड़ा बदलाव आया। भारतीय कपड़ा उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटकर 10 फीसदी हो गए। अमेरिकी प्रतिशोधात्मक और दंडात्मक शुल्कों के समाप्त होने से भारतीय कपड़ा क्षेत्र को बड़ी राहत मिली है। इससे व्यापार सामान्य हुआ और निर्यात की मात्रा स्थिर हुई। दंडात्मक शुल्कों को हटाने से भारतीय निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बहाल हुई है। अमेरिकी बाजार में रुकी हुई मांग भी अब बाहर आ रही है। उद्योग के बुनियादी सिद्धांत भी काफी सुधरे हैं। कताई में क्षमता समेकन, कपास की लागत प्रतिस्पर्धा की बहाली और यार्न के प्रसार में मजबूत सुधार हुआ है। इससे पूरे मूल्य श्रृंखला में लाभप्रदता बेहतर हुई है।
क्या अमेरिकी शुल्क कम होने से भारत को फायदा हुआ?
अमेरिकी शुल्कों में कमी भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई है। पहले ये शुल्क 50 फीसदी तक पहुंच गए थे, जिससे भारतीय उत्पादों की लागत बढ़ गई थी। दंडात्मक शुल्क हटने से कुल शुल्क जो 65-69 फीसदी तक थे, वे अब काफी कम हो गए हैं। इससे भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता वापस मिली है। अमेरिका में दबी हुई मांग भी अब सामने आ रही है, जिससे भारतीय उत्पादों की बिक्री में वृद्धि हो रही है। यह बदलाव उद्योग के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।
उद्योग के बुनियादी सिद्धांत कैसे मजबूत हुए हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग के बुनियादी सिद्धांतों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कताई खंड में क्षमता का समेकन हुआ है, जिससे उत्पादन दक्षता बढ़ी है। कपास की लागत प्रतिस्पर्धा भी बहाल हुई है, जिससे निर्माताओं को फायदा मिल रहा है। यार्न के प्रसार में तेज वृद्धि देखी गई है, जो लाभप्रदता को बढ़ा रही है। इन सभी कारकों ने मिलकर पूरे मूल्य श्रृंखला में बेहतर लाभ सुनिश्चित किया है। यह सुधार उद्योग को भविष्य के लिए मजबूत आधार प्रदान कर रहा है।
भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखला में कैसे मजबूत हो रहा है?
भारत यूके, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख बाजारों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है। ये समझौते उद्योग को संरचनात्मक सहायता प्रदान करेंगे। वैश्विक खरीदार अब बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे शुल्क-मुक्त राष्ट्रों पर निर्भरता कम कर रहे हैं। वे अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की कोशिश में हैं, जिससे भारत एक आकर्षक दीर्घकालिक सोर्सिंग विकल्प बन रहा है। मजबूत घरेलू मांग और अनुशासित पूंजी आवंटन से यह क्षेत्र टिकाऊ वृद्धि के लिए तैयार है। हालांकि, निवेशकों को अमेरिकी शुल्कों की निरंतरता और कपास की कीमतों में अस्थिरता पर नजर रखनी चाहिए।