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Highcourt: पंजाब भारत का हिस्सा नहीं जैसे नारे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं, आरोपी को नहीं दी जा सकती राहत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Tue, 17 Feb 2026 08:03 AM IST
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सार
बटाला के समध रोड स्थित आरआर थापर कॉलेज के निकट दीवारों पर देश-विरोधी और भड़काऊ नारे लिखे जाने से जुड़ा है। दीवारों पर केंद्रीय गृह मंत्री, पंजाब के मुख्यमंत्री और डीजीपी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां भी की गई थीं।
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब भारत का हिस्सा नहीं और खालिस्तान एसएफजे जिंदाबाद जैसे नारे लिखने के आरोपी को राहत देने से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इन्कार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के नारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आते और यह सांप्रदायिक सौहार्द व शांति भंग करने का गंभीर मामला है।
मामला बटाला के समध रोड स्थित आरआर थापर कॉलेज के निकट दीवारों पर देश-विरोधी और भड़काऊ नारे लिखे जाने से जुड़ा है। दीवारों पर केंद्रीय गृह मंत्री, पंजाब के मुख्यमंत्री और डीजीपी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां भी की गई थीं। पुलिस के अनुसार यह कृत्य प्रतिबंधित संगठन सिख्स फाॅर जस्टिस (एसएफजे) से जुड़ा है। जांच में सीसीटीवी फुटेज में याचिकाकर्ता की मौजूदगी पाई गई और उसे नारे लिखने में संलिप्त बताया गया।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया गंभीर अपराध की ओर संकेत करती है। ऐसे मामलों में हिरासत में पूछताछ जांच एजेंसी का महत्वपूर्ण अधिकार है और असाधारण परिस्थितियों के बिना इसे नकारा नहीं जा सकता। याचिकाकर्ता ने खुद को निर्दोष बताते हुए पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप लगाया, जबकि राज्य सरकार ने कहा कि साजिश की पूरी कड़ी उजागर करने के लिए हिरासत आवश्यक है।
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मामला बटाला के समध रोड स्थित आरआर थापर कॉलेज के निकट दीवारों पर देश-विरोधी और भड़काऊ नारे लिखे जाने से जुड़ा है। दीवारों पर केंद्रीय गृह मंत्री, पंजाब के मुख्यमंत्री और डीजीपी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां भी की गई थीं। पुलिस के अनुसार यह कृत्य प्रतिबंधित संगठन सिख्स फाॅर जस्टिस (एसएफजे) से जुड़ा है। जांच में सीसीटीवी फुटेज में याचिकाकर्ता की मौजूदगी पाई गई और उसे नारे लिखने में संलिप्त बताया गया।
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अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया गंभीर अपराध की ओर संकेत करती है। ऐसे मामलों में हिरासत में पूछताछ जांच एजेंसी का महत्वपूर्ण अधिकार है और असाधारण परिस्थितियों के बिना इसे नकारा नहीं जा सकता। याचिकाकर्ता ने खुद को निर्दोष बताते हुए पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप लगाया, जबकि राज्य सरकार ने कहा कि साजिश की पूरी कड़ी उजागर करने के लिए हिरासत आवश्यक है।