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बेअदबी कानून पर कानूनी विवाद: हाईकोर्ट में चुनौती, उम्रकैद के प्रावधान और राष्ट्रपति की मंजूरी पर सवाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 22 Apr 2026 02:48 PM IST
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सार
पंजाब विधानसभा ने 13 अप्रैल को जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया था। उसी दिन राज्यपाल ने इसे मंजूरी दे दी। 20 अप्रैल को इसे राजपत्र में अधिसूचित कर लागू कर दिया गया।
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब सरकार द्वारा लागू किए गए जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है। इस कानून को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। जालंधर निवासी सिमरनजीत सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर इसे असांविधानिक घोषित करने और रद्द करने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि यह कानून संविधान की मूल भावना और स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली के विपरीत है। खासतौर पर इसके दंडात्मक प्रावधानों और प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई गई हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अधिनियम समवर्ती सूची के विषयों को प्रभावित करता है और मौजूदा आपराधिक कानूनों, विशेषकर भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों से टकराव पैदा करता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है, जबकि इस अधिनियम को केवल राज्यपाल की सहमति से लागू कर दिया गया। इसे गंभीर संवैधानिक त्रुटि बताया गया है।
सबसे ज्यादा विवाद अधिनियम की धारा 5(3) को लेकर सामने आया है, जिसमें बेअदबी की साजिश जैसे अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है। याचिका में इसे अनुपातहीन और मनमाना बताया गया है, क्योंकि इस तरह के अपराध में प्रत्यक्ष हिंसा शामिल नहीं होती।
इसके अलावा बेअदबी की परिभाषा को अत्यधिक व्यापक बताते हुए कहा गया है कि इसमें शब्दों, संकेतों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को शामिल किया गया है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
याचिका में अधिनियम के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की गई है। दलील दी गई है कि यदि बाद में यह कानून असांविधानिक करार दिया जाता है, तो इसके तहत शुरू हुई आपराधिक कार्यवाहियां नागरिकों को अपूरणीय नुकसान पहुंचा सकती हैं। फिलहाल याचिका हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में दाखिल हो चुकी है और जल्द ही इसके सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना है।
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याचिका में कहा गया है कि यह कानून संविधान की मूल भावना और स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली के विपरीत है। खासतौर पर इसके दंडात्मक प्रावधानों और प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई गई हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अधिनियम समवर्ती सूची के विषयों को प्रभावित करता है और मौजूदा आपराधिक कानूनों, विशेषकर भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों से टकराव पैदा करता है।
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याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है, जबकि इस अधिनियम को केवल राज्यपाल की सहमति से लागू कर दिया गया। इसे गंभीर संवैधानिक त्रुटि बताया गया है।
धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को कमजोर करने का आरोप
अधिनियम पर धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को कमजोर करने का आरोप भी लगाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसमें केवल एक धार्मिक ग्रंथ को विशेष सुरक्षा देते हुए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है, जबकि अन्य धर्मों के ग्रंथों को शामिल नहीं किया गया, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।सबसे ज्यादा विवाद अधिनियम की धारा 5(3) को लेकर सामने आया है, जिसमें बेअदबी की साजिश जैसे अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है। याचिका में इसे अनुपातहीन और मनमाना बताया गया है, क्योंकि इस तरह के अपराध में प्रत्यक्ष हिंसा शामिल नहीं होती।
इसके अलावा बेअदबी की परिभाषा को अत्यधिक व्यापक बताते हुए कहा गया है कि इसमें शब्दों, संकेतों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को शामिल किया गया है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
याचिका में अधिनियम के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की गई है। दलील दी गई है कि यदि बाद में यह कानून असांविधानिक करार दिया जाता है, तो इसके तहत शुरू हुई आपराधिक कार्यवाहियां नागरिकों को अपूरणीय नुकसान पहुंचा सकती हैं। फिलहाल याचिका हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में दाखिल हो चुकी है और जल्द ही इसके सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना है।

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