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PU रिसर्च: कीटनाशकों से बीमार हो रही मिट्टी, विशेषज्ञों की चेतावनी-संतुलन बिगड़ा तो खेती संकट में

वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Wed, 22 Apr 2026 11:15 AM IST
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सार

मालाथियॉन, क्लोरपायरीफॉस और साइपरमेथ्रिन जैसे कीटनाशकों के इस्तेमाल से फंगस और एक्टिनोमाइसीट्स पर नकारात्मक असर पड़ता है। खासतौर पर ज्यादा डोज में इनका उपयोग मिट्टी के माइक्रोबियल बैलेंस को बिगाड़ देता है।

PU Research Soil Falling Ill Due to Pesticides Experts Warn Balance Disrupted Agriculture Faces Crisis
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार

खेती में बढ़ती पैदावार की दौड़ अब जमीन की सेहत पर भारी पड़ रही है। पंजाब यूनिवर्सिटी के बॉटनी विभाग की ताजा रिसर्च में सामने आया है कि आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक मिट्टी में मौजूद जरूरी सूक्ष्मजीवों को तेजी से खत्म कर रहे हैं।
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यह स्टडी साफ इशारा करती है कि अगर कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल जारी रहा तो मिट्टी की उर्वरता और फसल उत्पादन दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा। यह रिसर्च 31 मार्च 2026 को एक्टा साइंटिफिक एग्रीकल्चर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
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रिसर्च को विभाग के राजनी यादव और प्रो. आनंद नारायण सिंह की टीम ने इको सिस्टम एंड रिस्टोरेशन इकोलॉजी लैब में किया। अध्ययन में ऑर्गेनोक्लोरीन (एल्ड्रिन) और ऑर्गेनोफॉस्फेट (फोरेट) जैसे कीटनाशकों का मिट्टी के सूक्ष्म जीवों पर असर परखा गया। इसके लिए सात अलग-अलग ट्रीटमेंट बनाए गए और 1, 7, 14 और 21 दिन के अंतराल पर मिट्टी के सैंपल जांचे गए। प्रो. आनंद ने बताया कि नतीजों में सामने आया कि कीटनाशकों के इस्तेमाल से बैक्टीरिया, फंगस और एक्टिनोमाइसीट्स जैसे जरूरी सूक्ष्मजीवों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई। बैक्टीरिया की संख्या 1.98×10⁵ से 9.5×10⁵ cfu/g के बीच रही जबकि फंगस 1.43×10³ से 7.34×10³ cfu/g और एक्टिनोमाइसीट्स 2.63×10³ से 13.97×10³ cfu/g के बीच पाए गए। खास बात यह रही कि ऑर्गेनोफॉस्फेट कीटनाशकों ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया।

पहले ही दिन बैक्टीरिया की संख्या में 17 से 45 फीसदी तक गिरावट

अध्ययन के दौरान पहले ही दिन बैक्टीरिया की संख्या में 17 से 45 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई। सातवें दिन यह कमी कुछ मामलों में 54 फीसदी तक पहुंच गई। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह गिरावट मिट्टी की जैविक गतिविधियों को कमजोर कर सकती है जिससे पौधों को मिलने वाला पोषण और उनकी वृद्धि प्रभावित होती है।

सूक्ष्मजीव ही खेती की रीढ़

प्रो आनंद का कहना है कि मिट्टी के ये सूक्ष्मजीव ही असल में खेती की रीढ़ हैं। ये जैविक पदार्थों को विघटित कर पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं और मिट्टी की संरचना को बनाए रखते हैं। यदि इनकी संख्या घटती है तो जमीन की उर्वरता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। शोध में शामिल वैज्ञानिकों ने अपील की है कि किसान संतुलित मात्रा में ही कीटनाशकों का इस्तेमाल करें और जैविक खेती, प्राकृतिक कीटनाशकों व मिट्टी संरक्षण तकनीकों को अपनाएं।

रोचक तथ्य

इस अध्ययन में मिट्टी का आकलन पीयू के बॉटनी विभाग में स्थापित एक्सपेरिमेंटल डोम (माइक्रोकोज्म सेटअप) में किया गया। यानी यह किसी बाहरी खेत की मिट्टी नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय परिसर के नियंत्रित प्रयोगात्मक क्षेत्र की मिट्टी थी। यह रिसर्च 2019-20 से 2021-22 के रबी सीजन के दौरान की गई। अध्ययन चंडीगढ़ क्षेत्र की कृषि-प्रकार की सैंडी लोम मिट्टी पर आधारित था, जिसे लैब/डोम की नियंत्रित परिस्थितियों में रखा गया, ताकि कीटनाशकों के प्रभाव का सटीक और वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया जा सके।

मिट्टी की खासियत

टेक्सचर: सैंडी लोम (रेतीली-दोमट)
पीएच: करीब 7.58
जल धारण क्षमता: 38.7%
औसत वर्षा: करीब 1100 मिमी (चंडीगढ़ क्षेत्र)
 
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