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Chandigarh News: पीजीआई का शोध........डांसिंग आई सिंड्रोम की अब समय रहते पहचान, सही इलाज से बढ़ेगी बच्चों की उम्मीद
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चंडीगढ़। छोटे बच्चों में आंखों का अनियंत्रित तरीके से हिलना, शरीर में झटके आना और चलने में संतुलन बिगड़ना अब नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। यह लक्षण एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी ओएमएएस (डांसिंग आई सिंड्रोम) की ओर इशारा करते हैं। राहत की बात यह है कि पीजीआई के विशेषज्ञों के हालिया शोध से इस बीमारी की जल्दी और सटीक पहचान संभव हो सकेगी जिससे समय रहते इलाज शुरू कर बच्चों के ठीक होने की संभावना बढ़ जाएगी।
यह महत्वपूर्ण शोध अप्रैल 2026 में प्रतिष्ठित कैंसर रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों डॉ. अनीश भट्टाचार्य, डॉ. राजेंद्र कुमार बशेर, डॉ. हरमनदीप सिंह और डॉ. जितेंद्र कुमार साहू की टीम ने वर्ष 2019 से 2024 के बीच 43 बच्चों पर विस्तृत अध्ययन किया। इन बच्चों की औसत आयु करीब डेढ़ वर्ष रही।
शोध में पाया गया कि ओएमएएस से पीड़ित 72 प्रतिशत बच्चों में न्यूरोब्लास्टोमा नाम का ट्यूमर मौजूद था। यह ट्यूमर शरीर के भीतर छिपा रहता है और सामान्य जांचों में अक्सर पकड़ में नहीं आता, जिसके कारण बीमारी का पता देर से चलता है और उपचार जटिल हो जाता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने 68जीए-डोटानोक पेट/सीटी जांच तकनीक का उपयोग किया। जब इस उन्नत तकनीक की तुलना पारंपरिक जांच विधियों अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई से की गई तो पाया गया कि कई मामलों में पारंपरिक जांच ट्यूमर की पहचान करने में असफल रहीं जबकि पेट/सीटी जांच ने सटीक और स्पष्ट परिणाम दिए। शोध में 43 में से 31 बच्चों में ट्यूमर की पुष्टि हुई।
सबसे अहम पहलू यह रहा कि अधिकांश मामलों में ट्यूमर शुरुआती चरण में ही पकड़ में आ गया जिससे उपचार अधिक प्रभावी साबित हुआ। विशेषज्ञों के मुताबिक यह तकनीक न केवल ट्यूमर की पहचान करती है बल्कि यह भी बताती है कि बीमारी शरीर में कितनी फैली है। इससे डॉक्टरों को इलाज की सटीक रणनीति बनाने में मदद मिलती है। सर्जरी के बाद की जांचों में भी सकारात्मक परिणाम सामने आए।
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यह महत्वपूर्ण शोध अप्रैल 2026 में प्रतिष्ठित कैंसर रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों डॉ. अनीश भट्टाचार्य, डॉ. राजेंद्र कुमार बशेर, डॉ. हरमनदीप सिंह और डॉ. जितेंद्र कुमार साहू की टीम ने वर्ष 2019 से 2024 के बीच 43 बच्चों पर विस्तृत अध्ययन किया। इन बच्चों की औसत आयु करीब डेढ़ वर्ष रही।
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शोध में पाया गया कि ओएमएएस से पीड़ित 72 प्रतिशत बच्चों में न्यूरोब्लास्टोमा नाम का ट्यूमर मौजूद था। यह ट्यूमर शरीर के भीतर छिपा रहता है और सामान्य जांचों में अक्सर पकड़ में नहीं आता, जिसके कारण बीमारी का पता देर से चलता है और उपचार जटिल हो जाता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने 68जीए-डोटानोक पेट/सीटी जांच तकनीक का उपयोग किया। जब इस उन्नत तकनीक की तुलना पारंपरिक जांच विधियों अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई से की गई तो पाया गया कि कई मामलों में पारंपरिक जांच ट्यूमर की पहचान करने में असफल रहीं जबकि पेट/सीटी जांच ने सटीक और स्पष्ट परिणाम दिए। शोध में 43 में से 31 बच्चों में ट्यूमर की पुष्टि हुई।
सबसे अहम पहलू यह रहा कि अधिकांश मामलों में ट्यूमर शुरुआती चरण में ही पकड़ में आ गया जिससे उपचार अधिक प्रभावी साबित हुआ। विशेषज्ञों के मुताबिक यह तकनीक न केवल ट्यूमर की पहचान करती है बल्कि यह भी बताती है कि बीमारी शरीर में कितनी फैली है। इससे डॉक्टरों को इलाज की सटीक रणनीति बनाने में मदद मिलती है। सर्जरी के बाद की जांचों में भी सकारात्मक परिणाम सामने आए।
