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Chandigarh News: पीयू पीएचडी स्कॉलरों को आ रही समस्याएं, कैंपस में कोई शिकायत सेल ही नहीं
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चंडीगढ़। पंजाब विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थियों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन पीयू में कोई शिकायत सेल ही नहीं है। अब पीएचडी स्कॉलरों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अलग शिकायत सेल बनाने, स्टाइपेंड बढ़ाने और स्टाइपेंड की अवधि तीन साल से बढ़ाकर पांच साल करने की मांग की है।
शोधार्थियों का कहना है कि पीयू में पीएचडी प्रवेश परीक्षा के माध्यम से चयनित स्कॉलरों को मिलने वाला स्टाइपेंड कई वर्षों से नहीं बढ़ाया गया है, जबकि महंगाई, किराया, भोजन, किताबें, जर्नल्स और शोध से जुड़े खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। यह स्टाइपेंड यूजीसी और सीएसआईआर जैसी राष्ट्रीय एजेंसियों से मिलने वाली राशि से भी काफी कम है, जिससे स्कॉलरों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
शोधार्थियों के अनुसार कोर्सवर्क, फील्डवर्क, लैब वर्क और शोध पत्र प्रकाशित करने में आमतौर पर चार से पांच साल लग जाते हैं, ऐसे में स्टाइपेंड खत्म होने के बाद स्कॉलर गंभीर आर्थिक दबाव झेलते हैं।
पार्ट टाइम काम करने को मजबूर स्कॉलर
एक पीएचडी शोधार्थी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा आज के समय में मौजूदा स्टाइपेंड में चंडीगढ़ जैसे शहर में रहना बेहद मुश्किल है। कई स्कॉलर पार्ट-टाइम काम करने को मजबूर हैं जिससे शोध की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। पीएचडी स्कॉलर शीशपाल ने कहा कि शिकायत सेल न होने की वजह से हमारी अकादमिक और प्रशासनिक समस्याएं महीनों तक लटकी रहती हैं। अगर कोई पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था हो, तो स्कॉलरों को काफी राहत मिलेगी।
पीयूसीएसी उपाध्यक्ष अश्मीत सिंह और सत्थ पीयू प्रशासन को लेटर भी सौंप चुके हैं, लेकिन समाधान नहीं हुआ। पीयू में रिसर्च स्कॉलर शिकायत सेल बनने से विश्वविद्यालय में जवाबदेही बढ़ेगी और शोध का माहौल बेहतर होगा। उन्होंने पीएचडी स्कॉलरों के स्टाइपेंड में तत्काल बढ़ोतरी, स्टाइपेंड अवधि 5 साल करने, यूजीसी सीएसआईआर के समान ढांचा बनाने और शिकायतों को जल्दी और पारदर्शी समाधान करने की मांग उठाई है।
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शोधार्थियों का कहना है कि पीयू में पीएचडी प्रवेश परीक्षा के माध्यम से चयनित स्कॉलरों को मिलने वाला स्टाइपेंड कई वर्षों से नहीं बढ़ाया गया है, जबकि महंगाई, किराया, भोजन, किताबें, जर्नल्स और शोध से जुड़े खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। यह स्टाइपेंड यूजीसी और सीएसआईआर जैसी राष्ट्रीय एजेंसियों से मिलने वाली राशि से भी काफी कम है, जिससे स्कॉलरों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
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शोधार्थियों के अनुसार कोर्सवर्क, फील्डवर्क, लैब वर्क और शोध पत्र प्रकाशित करने में आमतौर पर चार से पांच साल लग जाते हैं, ऐसे में स्टाइपेंड खत्म होने के बाद स्कॉलर गंभीर आर्थिक दबाव झेलते हैं।
पार्ट टाइम काम करने को मजबूर स्कॉलर
एक पीएचडी शोधार्थी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा आज के समय में मौजूदा स्टाइपेंड में चंडीगढ़ जैसे शहर में रहना बेहद मुश्किल है। कई स्कॉलर पार्ट-टाइम काम करने को मजबूर हैं जिससे शोध की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। पीएचडी स्कॉलर शीशपाल ने कहा कि शिकायत सेल न होने की वजह से हमारी अकादमिक और प्रशासनिक समस्याएं महीनों तक लटकी रहती हैं। अगर कोई पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था हो, तो स्कॉलरों को काफी राहत मिलेगी।
पीयूसीएसी उपाध्यक्ष अश्मीत सिंह और सत्थ पीयू प्रशासन को लेटर भी सौंप चुके हैं, लेकिन समाधान नहीं हुआ। पीयू में रिसर्च स्कॉलर शिकायत सेल बनने से विश्वविद्यालय में जवाबदेही बढ़ेगी और शोध का माहौल बेहतर होगा। उन्होंने पीएचडी स्कॉलरों के स्टाइपेंड में तत्काल बढ़ोतरी, स्टाइपेंड अवधि 5 साल करने, यूजीसी सीएसआईआर के समान ढांचा बनाने और शिकायतों को जल्दी और पारदर्शी समाधान करने की मांग उठाई है।
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