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'गोली किसकी बंदूक से चली साबित नहीं': चर्चित मीना खलखो हत्याकांड में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दो जवान बरी
Tue, 18 Aug 2026 09:03 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 18 Aug 2026 09:03 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित मीना खलखो हत्याकांड में हाई कोर्ट ने दो सशस्त्र बल के जवानों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
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मीना खलखो हत्याकांड में hc का ऑर्डर
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित मीना खलखो हत्याकांड में हाई कोर्ट ने दो सशस्त्र बल के जवानों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि मीना खलखो की मौत जिस गोली से हुई, वह आरोपी जवान धर्मदत्त धनिया और जीवनलाल रत्नाकर के हथियार से चली थी। कोर्ट ने कहा कि केवल यह साबित होना कि घटना के दौरान पुलिस की ओर से फायरिंग हुई और मीना की गोली लगने से मौत हुई, आरोपियों को हत्या का दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।
चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट सेशन ट्रायल के बाद रायपुर के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पांच अप्रैल 2022 को दोनों जवानों को धारा 302/34 के आरोप से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। अपील की सुनवाई जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस एनके व्यास के डिवीजन बेंच में हुई। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण करने के बाद दोनों जवानों को संदेह का लाभ दिया है। उसका निष्कर्ष न तो विकृत है और न ही साक्ष्यों की अनदेखी पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, बरी किए जाने के फैसले में अपीलीय अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से गलत या विकृत हो और साक्ष्यों से आरोपी की दोषसिद्धि के अलावा कोई दूसरा उचित निष्कर्ष संभव न हो।
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चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट सेशन ट्रायल के बाद रायपुर के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पांच अप्रैल 2022 को दोनों जवानों को धारा 302/34 के आरोप से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। अपील की सुनवाई जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस एनके व्यास के डिवीजन बेंच में हुई। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है।
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कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण करने के बाद दोनों जवानों को संदेह का लाभ दिया है। उसका निष्कर्ष न तो विकृत है और न ही साक्ष्यों की अनदेखी पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, बरी किए जाने के फैसले में अपीलीय अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से गलत या विकृत हो और साक्ष्यों से आरोपी की दोषसिद्धि के अलावा कोई दूसरा उचित निष्कर्ष संभव न हो।
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