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नए विधानसभा भवन से बजट की गूंज: 25 साल में कितना बदला छत्तीसगढ़ का वित्तीय सफर, जानें वित्त मंत्रियों की कहानी
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Tue, 24 Feb 2026 12:56 PM IST
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सार
राज्य गठन के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ का बजट किस तरह बदला, किसने कितनी बार पेश किया और कैसे सात हजार करोड़ से शुरू हुई वित्तीय यात्रा लाख से करोड़ के आंकड़े तक पहुंची।
25 साल में कितना बदला छत्तीसगढ़ का वित्तीय सफर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के नए विधानसभा भवन नवा रायपुर अटल नगर में वित्त वर्ष 2026-27 का बजट सत्र शुरू हो चुका है। पहले दिन राज्यपाल रमेन डेका के अभिभाषण के बाद आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया और अब सबकी निगाहें 24 फरवरी पर टिकी हैं, जब वित्त मंत्री ओपी चौधरी अपना तीसरा बजट प्रस्तुत करेंगे।
लेकिन इस मौके पर यह जानना भी दिलचस्प है कि राज्य गठन के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ का बजट किस तरह बदला, किसने कितनी बार पेश किया और कैसे सात हजार करोड़ से शुरू हुई वित्तीय यात्रा लाख से करोड़ के आंकड़े तक पहुंची।
सात हजार करोड़ से शुरू हुआ था यह सफर
राज्य गठन के बाद मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में रामचंद्र सिंहदेव ने वर्ष 2001-02 में छत्तीसगढ़ का पहला बजट पेश किया था। उस समय बजट का आकार 7,294 करोड़ रुपये था। 2002-03 में यह बढ़कर 8,471 करोड़ और 2003-04 में 9,978 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इन वर्षों में अनुपूरक बजट की परंपरा भी शुरू हुई, जिससे स्पष्ट था कि नवगठित राज्य अपनी वित्तीय संरचना को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था।
सत्ता परिवर्तन और मितव्ययिता का दौर
2003 में भाजपा सत्ता में आई और अमर अग्रवाल को वित्त विभाग की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 2004-05 में 10,555 करोड़, 2005-06 में 11,242 करोड़ और 2006-07 में 13,185 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। अमर अग्रवाल को मितव्ययी वित्त मंत्री के रूप में जाना गया, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
12 बजट पेश करने वाले मुख्यमंत्री
2006 के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वित्त विभाग अपने पास रखा और 2007 से 2018 तक लगातार 12 बजट स्वयं पेश किए। इस दौरान बजट आकार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वर्ष 2007-08 में 16,473 करोड़ से शुरू होकर 2017-18 तक यह बढ़कर 88,599 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह वह दौर था जब राज्य ने बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और ग्रामीण योजनाओं पर बड़ा निवेश किया।
कांग्रेस की वापसी और सामाजिक योजनाओं पर जोर
15 साल बाद सत्ता में वापसी के बाद भूपेश बघेल ने भी वित्त विभाग अपने पास रखा। उनके कार्यकाल में बजट का आकार एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा। 2018-19 में पेश बजट 1.50 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा। इसके बाद कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर फोकस के साथ बजट संरचना में बदलाव देखने को मिला। राजस्व संग्रह और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई।
अब ओपी चौधरी का तीसरा बजट
वर्ष 2023 में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार विधायक बने पूर्व आईएएस ओपी चौधरी को वित्त विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने पहले ‘GYAN’ और फिर ‘GATI’ थीम पर आधारित बजट पेश किया। अब 24 फरवरी को उनका तीसरा बजट पेश हो रहा है। माना जा रहा है कि यह बजट बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश, डिजिटल गवर्नेंस और युवाओं के लिए रोजगार सृजन पर केंद्रित हो सकता है। साथ ही केंद्र सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ विजन के अनुरूप राज्य की वित्तीय दिशा तय करने की कोशिश भी दिखाई दे सकती है।
25 साल में क्या बदला?
छत्तीसगढ़ का पहला बजट जहां 7 हजार करोड़ के आसपास था, वहीं आज बजट आकार कई गुना बढ़ चुका है। राजस्व संरचना में खनिज, आबकारी और जीएसटी का योगदान बढ़ा है। सामाजिक योजनाओं, किसानों की आय सहायता, स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय में भी लगातार वृद्धि हुई है।
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लेकिन इस मौके पर यह जानना भी दिलचस्प है कि राज्य गठन के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ का बजट किस तरह बदला, किसने कितनी बार पेश किया और कैसे सात हजार करोड़ से शुरू हुई वित्तीय यात्रा लाख से करोड़ के आंकड़े तक पहुंची।
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सात हजार करोड़ से शुरू हुआ था यह सफर
राज्य गठन के बाद मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में रामचंद्र सिंहदेव ने वर्ष 2001-02 में छत्तीसगढ़ का पहला बजट पेश किया था। उस समय बजट का आकार 7,294 करोड़ रुपये था। 2002-03 में यह बढ़कर 8,471 करोड़ और 2003-04 में 9,978 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इन वर्षों में अनुपूरक बजट की परंपरा भी शुरू हुई, जिससे स्पष्ट था कि नवगठित राज्य अपनी वित्तीय संरचना को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था।
सत्ता परिवर्तन और मितव्ययिता का दौर
2003 में भाजपा सत्ता में आई और अमर अग्रवाल को वित्त विभाग की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 2004-05 में 10,555 करोड़, 2005-06 में 11,242 करोड़ और 2006-07 में 13,185 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। अमर अग्रवाल को मितव्ययी वित्त मंत्री के रूप में जाना गया, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
12 बजट पेश करने वाले मुख्यमंत्री
2006 के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वित्त विभाग अपने पास रखा और 2007 से 2018 तक लगातार 12 बजट स्वयं पेश किए। इस दौरान बजट आकार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वर्ष 2007-08 में 16,473 करोड़ से शुरू होकर 2017-18 तक यह बढ़कर 88,599 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह वह दौर था जब राज्य ने बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और ग्रामीण योजनाओं पर बड़ा निवेश किया।
कांग्रेस की वापसी और सामाजिक योजनाओं पर जोर
15 साल बाद सत्ता में वापसी के बाद भूपेश बघेल ने भी वित्त विभाग अपने पास रखा। उनके कार्यकाल में बजट का आकार एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा। 2018-19 में पेश बजट 1.50 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा। इसके बाद कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर फोकस के साथ बजट संरचना में बदलाव देखने को मिला। राजस्व संग्रह और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई।
अब ओपी चौधरी का तीसरा बजट
वर्ष 2023 में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार विधायक बने पूर्व आईएएस ओपी चौधरी को वित्त विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने पहले ‘GYAN’ और फिर ‘GATI’ थीम पर आधारित बजट पेश किया। अब 24 फरवरी को उनका तीसरा बजट पेश हो रहा है। माना जा रहा है कि यह बजट बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश, डिजिटल गवर्नेंस और युवाओं के लिए रोजगार सृजन पर केंद्रित हो सकता है। साथ ही केंद्र सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ विजन के अनुरूप राज्य की वित्तीय दिशा तय करने की कोशिश भी दिखाई दे सकती है।
25 साल में क्या बदला?
छत्तीसगढ़ का पहला बजट जहां 7 हजार करोड़ के आसपास था, वहीं आज बजट आकार कई गुना बढ़ चुका है। राजस्व संरचना में खनिज, आबकारी और जीएसटी का योगदान बढ़ा है। सामाजिक योजनाओं, किसानों की आय सहायता, स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय में भी लगातार वृद्धि हुई है।