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CG News: बीमारी, गरीबी और बेबसी से जूझ रहा रामानुजगंज का जितेंद्र पासवान, अब बस उम्मीद बाकी है

अमर उजाला नेटवर्क, रामानुजगंज Published by: अमन कोशले Updated Wed, 22 Oct 2025 03:00 PM IST
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सार

बलरामपुर-रामानुजगंज के कभी अपने परिवार का सहारा रहा 28 वर्षीय जितेंद्र पासवान आज खुद ज़िंदगी की लड़ाई अकेले लड़ रहा है। रामानुजगंज वार्ड क्रमांक 2 का निवासी जितेंद्र पिछले तीन वर्षों से पैरालिसिस की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है।

jitendra Paswan of Ramanujganj is battling illness, poverty and helplessness, now only hope remains.
बीमारी, गरीबी और बेबसी से जूझ रहा रामानुजगंज का जितेंद्र पासवान - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बलरामपुर-रामानुजगंज के कभी अपने परिवार का सहारा रहा 28 वर्षीय जितेंद्र पासवान आज खुद ज़िंदगी की लड़ाई अकेले लड़ रहा है। रामानुजगंज वार्ड क्रमांक 2 का निवासी जितेंद्र पिछले तीन वर्षों से पैरालिसिस की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। बीमारी, गरीबी और अपनों की बेरुख़ी ने उसे इस कदर तोड़ दिया है कि अब उसके लिए दो वक़्त की रोटी और दवाइयों का इंतज़ाम भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
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कभी ड्राइवरी कर परिवार का गुज़ारा चलाने वाले जितेंद्र की ज़िंदगी तब बदल गई जब उसे डायबिटीज़ (शुगर) की बीमारी हुई। इलाज के लिए वह रांची के एक बड़े अस्पताल पहुंचा, लेकिन डॉक्टरों द्वारा दी गई गलत दवाइयों के दुष्प्रभाव से उसके दोनों पैर पूरी तरह पैरालाइज्ड हो गए। तब से वह बिस्तर पर है और कामकाज पूरी तरह बंद हो चुका है।
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जितेंद्र के माता-पिता पहले ही गुजर चुके हैं। उसकी पत्नी, जिससे उसे सहारा की उम्मीद थी, वह भी 15 दिन पहले उसे इस हालत में छोड़कर चली गई। अब वह पूरी तरह अकेला रह गया है। बड़ा भाई खलासी का काम करता है और जितनी मदद कर सकता है, करता है, लेकिन यह मदद इलाज और जीवन-यापन दोनों के लिए नाकाफी है। बीते तीन वर्षों में जितेंद्र का घर, ज़मीन और जेवर सब बिक चुका है। इलाज के लिए उसने सब कुछ दांव पर लगा दिया, लेकिन राहत नहीं मिली। इन दिनों उसका इलाज गढ़वा में चल रहा है, पर आर्थिक तंगी के कारण दवाइयां अधूरी रह जाती हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि दवाइयों का नियमित सेवन जरूरी है, लेकिन पैसों की तंगी के कारण जितेंद्र दवा नहीं खरीद पा रहा। नतीजतन, उसका पैर सूज गया है और स्थिति बिगड़ती जा रही है। जितेंद्र ने समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से मदद की भावुक अपील की है। उसे दवाइयों, भोजन और इलाज के लिए तुरंत आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। 'मुझे बस थोड़ा सहारा चाहिए, ताकि फिर से चल सकूं' जितेंद्र की यही गुहार अब किसी मसीहे के इंतज़ार में गूंज रही है।
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