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कारगिल के रणबांकुरे धर्मवीर सिंह ने अंतिम सांस तक दुश्मन से लोहा लिया
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संवाद न्यूज एजेंसी
झज्जर। वीर भूमि के सपूत धर्मवीर सिंह ने कारगिल के ऑपरेशन विजय में अंतिम सांस तक दुश्मन से लोहा लिया। पैर में गोली लगने से जख्मी होने के बाद भी उन्होंने हथियार नहीं छोड़ा और पाकिस्तानी सैनिकों पर गोलियां चलाते रहे। घंटों तक जख्मी हालत में लड़ने के बाद सिर में गोली लगने से वह वीरगति को प्राप्त हुए, पर शहीद होने से पहले 8 से 10 दुश्मन सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।
मूल रूप से झज्जर के गांव ढाकला निवासी धर्मवीर सिंह ने मात्र 26 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वह जाट रेजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात थे और 1993 में सेना में भर्ती हुए थे। धर्मवीर सिंह का जन्म अप्रैल 1973 में किसान सूबेदार सिंह और बेदकौर के घर हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सीमा से अपनी पत्नी विद्या देवी के नाम एक पत्र लिखा था।
पत्र में उन्होंने बच्चों का ध्यान रखने और उन्हें पालने की बात कही थी। सात जुलाई 1999 को दुश्मन से लोहा लेते हुए उन्होंने देश के नाम अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम संस्कार के समय गांव और आसपास के हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। बाद में सरकार ने उनके परिजनों को एक गैस एजेंसी आवंटित की थी।
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पारिवारिक जीवन
धर्मवीर सिंह आखिरी बार घर तब आए थे जब उनका बेटा पैदा हुआ था। उनकी शहादत के समय बेटे की उम्र केवल छह महीने और बेटी की उम्र दो साल थी। उनकी पत्नी विद्या देवी के जेहन में आज भी उनके पत्र के शब्द छपे हुए हैं। अब उनकी बेटी सोमी ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर ली है। बेटे लोकेश ने एलएलबी और एलएलएम की शिक्षा प्राप्त की है।
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प्रेरणास्रोत प्रतिमा
बलिदानी धर्मवीर सिंह की प्रतिमा बनाने के लिए गांव ढाकला की ओर से गांव में ही जमीन दी गई थी। परिवार ने उस स्थान पर उनकी प्रतिमा बनवाई। आज वह प्रतिमा गांव के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। यह प्रतिमा उनके सर्वोच्च बलिदान को याद दिलाती है।
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झज्जर। वीर भूमि के सपूत धर्मवीर सिंह ने कारगिल के ऑपरेशन विजय में अंतिम सांस तक दुश्मन से लोहा लिया। पैर में गोली लगने से जख्मी होने के बाद भी उन्होंने हथियार नहीं छोड़ा और पाकिस्तानी सैनिकों पर गोलियां चलाते रहे। घंटों तक जख्मी हालत में लड़ने के बाद सिर में गोली लगने से वह वीरगति को प्राप्त हुए, पर शहीद होने से पहले 8 से 10 दुश्मन सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।
मूल रूप से झज्जर के गांव ढाकला निवासी धर्मवीर सिंह ने मात्र 26 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वह जाट रेजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात थे और 1993 में सेना में भर्ती हुए थे। धर्मवीर सिंह का जन्म अप्रैल 1973 में किसान सूबेदार सिंह और बेदकौर के घर हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सीमा से अपनी पत्नी विद्या देवी के नाम एक पत्र लिखा था।
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पत्र में उन्होंने बच्चों का ध्यान रखने और उन्हें पालने की बात कही थी। सात जुलाई 1999 को दुश्मन से लोहा लेते हुए उन्होंने देश के नाम अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम संस्कार के समय गांव और आसपास के हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। बाद में सरकार ने उनके परिजनों को एक गैस एजेंसी आवंटित की थी।
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पारिवारिक जीवन
धर्मवीर सिंह आखिरी बार घर तब आए थे जब उनका बेटा पैदा हुआ था। उनकी शहादत के समय बेटे की उम्र केवल छह महीने और बेटी की उम्र दो साल थी। उनकी पत्नी विद्या देवी के जेहन में आज भी उनके पत्र के शब्द छपे हुए हैं। अब उनकी बेटी सोमी ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर ली है। बेटे लोकेश ने एलएलबी और एलएलएम की शिक्षा प्राप्त की है।
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प्रेरणास्रोत प्रतिमा
बलिदानी धर्मवीर सिंह की प्रतिमा बनाने के लिए गांव ढाकला की ओर से गांव में ही जमीन दी गई थी। परिवार ने उस स्थान पर उनकी प्रतिमा बनवाई। आज वह प्रतिमा गांव के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। यह प्रतिमा उनके सर्वोच्च बलिदान को याद दिलाती है।