सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   IIM Ahmedabad Alumnus Akriti Gupta turns down Rs 75 Lakh offer in Shark Tank India

आकृति गुप्ता: सौदेबाजी की नई भाषा और जेन-जी का आत्मविश्वास

Girish Upadhyay गिरीश उपाध्याय
Updated Sun, 11 Jan 2026 12:27 PM IST
विज्ञापन
सार

  • आज का युवा उद्यमी एक मंच, एक निवेशक या एक शो पर निर्भर नहीं है। उसके पास विकल्प हैं, जानकारी है और सबसे बड़ी बात उसमें आत्मविश्वास है। वह जानता है कि पैसा जरूरी है, लेकिन अपनी कंपनी की आत्मा गिरवी रखकर नहीं।

IIM Ahmedabad Alumnus Akriti Gupta turns down Rs 75 Lakh offer in Shark Tank India
शार्क टैंक इंडिया (फाइल फोटो) - फोटो : इंस्टाग्राम @sharktank.india
विज्ञापन

विस्तार
Follow Us

दुनिया के कई हिस्सों में जेन-जी व्यवस्था बदलने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। वहां युवाओं का असंतोष, हिंसा और अराजकता में बदल रहा है और भविष्य गुस्से की भाषा में लिखा जा रहा है, लेकिन भारत के जेन-जी ने अलग रास्ता चुना है। वे व्यवस्था को तोड़ने में नहीं, बल्कि खुद की शर्तों पर गढ़ने में लगे हैं। शांति, समझदारी और आत्मविश्वास के साथ।

Trending Videos


इसी बदलते भारत की जेन-जी का एक सशक्त चेहरा हाल ही में टीवी शो ‘शार्क टैंक’ में दिखा। धनबाद की युवा उद्यमी आकृति गुप्ता ने न गुस्सा दिखाया और न ही भावुक अपील की। सिर्फ इतना कहा- ‘‘यह सौदा मुझे मंजूर नहीं।’’ और यही एक वाक्य इस पूरे एपिसोड की पहचान बन गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


आकृति का यह ‘ना’ किसी निवेशक को नहीं, उस पुरानी सोच को था जो मानती है कि मौका मिले तो झुक जाना चाहिए। यह ‘ना’ उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जो बताता है कि आज का युवा उद्यमी भीख नहीं मांगता, बराबरी और सम्मान के साथ बातचीत करता है। शार्क टैंक-5 का यह एपिसोड एक डील की कहानी नहीं, बल्कि जेन जी के नए तेवर की बानगी है। 

पैसा चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर

इस पूरे एपिसोड को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आकृति गुप्ता आखिर चाह क्या रही थीं और निवेशक किस बात पर अटक गए। क्योंकि यहां मामला लालच या अहंकार का नहीं, मूल्य और मूल्यांकन का था।

आकृति ने निवेश के लिए हो रही बातचीत में साफ कहा कि उन्हें 75 लाख रुपये चाहिए और इसके बदले वे अपनी कंपनी का 1 प्रतिशत हिस्सा देंगी। साधारण भाषा में इसका मतलब यह है कि वे अपनी पूरी कंपनी की कीमत करीब 75 करोड़ रुपये मान रही थीं। यह वही गणित है, जैसे कोई कहे कि मेरी दुकान 75 लाख की है, इसलिए आप मुझे यदि निवेश के लिए 75 हजार रुपये देते हैं तो मैं आपको 1 प्रतिशत हिस्सा ही दूंगा।

अब निवेशकों की नजर से देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। उनके सामने बाबागाड़ी (स्ट्रोलर) बनाने वाली एक नई कंपनी थी, जिसकी बिक्री अभी शुरुआती दौर में है, और जिसका बाजार ऐसा है जहां सेकेंड हैंड सामान का चलन बहुत आम है। इसलिए निवेशकों ने कहा कि वे 75 लाख देने को तैयार हैं, लेकिन बदले में 3 प्रतिशत हिस्सा चाहते हैं। यानी उनके हिसाब से कंपनी की कीमत करीब 25 करोड़ के आसपास बैठती थी।

यहीं से टकराव शुरू हुआ। लेकिन यह टकराव किसी की जिद का नहीं था, बल्कि सोच का था। आकृति का भरोसा भविष्य पर था, निवेशकों का फोकस जोखिम पर। आकृति को लगा कि आज ज्यादा हिस्सा देना कल की ग्रोथ को कमजोर कर देगा। निवेशकों को लगा कि कम हिस्सेदारी में जोखिम ज्यादा है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अपना मकान 1 करोड़ में बेचना चाहता हो और खरीदार 60 लाख से आगे जाने को तैयार न हो। दोनों अपने अपने हिसाब से सही हो सकते हैं, लेकिन सौदा तभी होता है जब नजरिये मिलें। यहां नजरिये नहीं मिले।

अब सवाल उठता है कि क्या डील न होना असफलता है? पुरानी पीढ़ी कहेगी कि हां, मौका चला गया। जबकि नई पीढ़ी कहेगी गलत सौदा होने से बच गया। यहीं से जेन जी की सोच समझ में आती है। आज का युवा उद्यमी एक मंच, एक निवेशक या एक शो पर निर्भर नहीं है। उसके पास विकल्प हैं, जानकारी है और सबसे बड़ी बात उसमें आत्मविश्वास है। वह जानता है कि पैसा जरूरी है, लेकिन अपनी कंपनी की आत्मा गिरवी रखकर नहीं।

आकृति की यात्रा

यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आता। आकृति की यात्रा बताती है कि उद्यमिता कोई एक दिन का फैसला नहीं। आईआईएम अहमदाबाद की पासआउट आकृति चाहतीं तो किसी भी नामी कंपनी में अच्छी खासी नौकरी हासिल कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने स्वयं की उद्यमिता को चुना। पहले बच्चों के कपड़ों का ब्रांड शुरू किया, फिर ई-कॉमर्स में हाथ आजमाया, फिर कॉरपोरेट अनुभव लिया और अंततः बेबी गियर के क्षेत्र में उतरीं। हर मोड़ पर उन्होंने सीखा, बदला और खुद को मजबूत किया। इसलिए शार्क टैंक जैसे मंच पर उन्होंने जल्दबाजी नहीं की।

इस कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू भी है। आकृति झारखंड के उस धनबाद शहर से आती हैं जिसकी सामान्य छवि कोयला खदानों और कोयला मजदूरों के कठोर श्रम से गढ़ी जाती है। लेकिन आकृति ने दिखा दिया कि छोटे शहरों से आने वाली नई पीढ़ी अब सिर्फ मेहनतकश नहीं, रणनीतिक भी है। वह कॉरपोरेट की भाषा समझती है, वैल्यूएशन का गणित जानती है और बातचीत में खुद को कमतर नहीं आंकती।

यह बदलाव इसलिए आया है क्योंकि आज का युवा ऑनलाइन दुनिया से जुड़ा है, वह शिक्षा और अनुभव को मिलाकर फैसले लेता है और यह मानता है कि आत्मविश्वास का शहर से कोई रिश्ता नहीं होता।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू है, महिला उद्यमिता। अक्सर यह माना जाता है कि महिला फाउंडर सौदे में ज्यादा लचीली होंगी लेकिन आकृति ने साफ कहा कि वे शर्तों से सहमत नहीं हैं। न कोई आक्रोश, न कोई भावुकता सिर्फ बहुत गंभीरता से सोची समझी ‘ना’। यह बताता है कि महिला उद्यमिता अब सहानुभूति नहीं, समानता चाहती है।

बाजार के लिए भी यह एक आईना है। हम चाहते हैं कि देसी स्टार्टअप आगे बढें, भारत आत्मनिर्भर बने, लेकिन जब कीमत चुकाने की बारी आती है तो हमें वही चीज महंगी लगने लगती है, जो विदेशी ब्रांड में सस्ती लगती है। यह दुविधा नए उद्यमियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

हम देख रहे हैं कि आज का युवा अपने मजबूत इरादों से इस चुनौती का पूरी ताकत से सामना कर रहा है। याद कीजिये ‘थ्री इडियट’ फिल्म का वह सीन जिसमें शरमन जोशी व्हील चेयर पर इंटरव्यू देने जाता है। पूरी ईमानदारी से इंटरव्यू बोर्ड को अपनी कहानी सुनाता है, जिसमें ज्यादातर ‘निगेटिव’ ही है।

बोर्ड उसकी फाइल वापस करते हुए कहता है- ‘’देखिये आपका इतना फ्रैंक बिहेवियर हमारी कंपनी के लिए ठीक नहीं है। इस काम को हैंडल करने के लिए हमें एक डिप्लोमैटिक आदमी की जरूरत है, आप कुछ ज्यादा ही स्ट्रेट फॉरवर्ड हैं। ... बट, अगर आप हमें भरोसा दिलाएं कि आप इस एटीट्यूड को कंट्रोल कर सकते हैं तो कुछ हो सकता है...’’

और जो जवाब आता है वह सुनने लायक है। शरमन जोशी कहते हैं- ‘‘दोनों टांगें तुड़वा कर अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है सर... बड़ी मुश्किल से आया है यह एटीट्यूड... नहीं होगा सर... आप अपनी नौकरी रख लीजिये और मैं अपना एटीट्यूड रख लेता हूं..’’ इतना कहकर शरमन अपनी व्हीलचेयर का रुख मोड़कर जाने लगते हैं। तभी इंटरव्यू बोर्ड का एक सदस्य उन्हें रोकते हुए कहता है- ‘‘रुको... 25 साल से मैं रिक्रूटमेंट कर रहा हूं, बहुत सारे इंटरव्यू लिए हैं... जॉब पाने के लिए लोग हमारी हां में हां मिला ही लेते हैं। तुम कहां से आए हो यार... सेलेरी कितनी लोगे भैया... डिस्कस कर लें...’’

थ्री इडियट की उस रील लाइफ और शार्क टैंक की रीयल लाइफ दोनों में युवा पीढ़ी ने अपने आत्मविश्वास से कोई समझौता नहीं किया। फर्क है तो बस इतना कि शरमन जोशी को उसी आत्मविश्वास ने नौकरी दिला दी और आकृति को उसके आत्मविश्वास ने वह ऊंचाई दी जिसके कारण आज वह कॉरपोरेट से लेकर मीडिया तक में चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। आज का उद्यमी दया या सहानुभूति नहीं चाहता। वह कहता है- “मुझे निवेश चाहिए, लेकिन बराबरी के साथ।”

शार्क टैंक से बिना डील के लौटना आकृति के सफर का अंत नहीं है। यह सिर्फ एक पड़ाव है। इसीसे उनकी नई पहचान बनी, चर्चा हुई और सबसे बड़ी बात, लोगों में यह संदेश गया कि आज का जेन-जी उद्यमी जल्द अमीर नहीं, बल्कि सही और मजबूत कारोबारी बनना चाहता है।

यही इस पूरे एपिसोड का असली अर्थ है। यह कहानी पैसों की नहीं, अपने काम की सही कीमत समझने की कहानी है।


---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed