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हिंदी दिवस विशेष : क्या उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का संवाद बिना हिंदी के संभव है?
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सार
उत्तर-दक्षिण संवाद का इतिहास संस्कृत से शुरू होकर अंग्रेजी और अब हिंदी व तकनीक (AI) तक पहुँचा है। वास्तविक संवाद किसी भाषाई प्रभुत्व में नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, कलात्मक आदान-प्रदान और संवेदनाओं के साझा 'ह्यूमन फ्लो' में निहित है।
विश्व हिंदी दिवस 2026
- फोटो : Amar ujala
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विस्तार
Hindi Day Special Article: क्या उत्तर और दक्षिण भारत के बीच का संवाद बिना हिंदी के संभव है? हिंदी दिवस पर यह प्रश्न बेहद प्रासंगिक है। दरअसल, उत्तर और दक्षिण भाषाई परंपराओं के बीच का संवाद हमेशा से कौतूहल तथा चर्चा का विषय रहा है। आज के डिजिटल युग में जहां दूरियां सिमट रही हैं, वहीं यह प्रश्न फिर से नए संदर्भों में खड़ा है। हालांकि, इसका उत्तर इतिहास, वर्तमान और तकनीक के तीन अलग-अलग दृष्टिकोणों से मिलता है। इतिहास गवाह है कि जब हिंदी अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं थी, तब भी उत्तर और दक्षिण के बीच का संवाद कभी नहीं रुका। प्राचीन भारत में भाषाओं की भिन्नता के बावजूद विचारों का आदान-प्रदान निर्बाध था।
आठवीं शताब्दी में केरल के कालडी में जन्मे आदि शंकराचार्य जब पदयात्रा करते हुए कश्मीर और काशी पहुंचे तो उन्होंने उत्तर के प्रकांड विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया। उनके बीच संवाद का माध्यम संस्कृत थी। संस्कृत उस समय की 'लिंगुआ फ्रैंका' (संपर्क भाषा) थी, जो केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि दर्शन, तर्क और विज्ञान की साझी कड़ी थी। यह वह काल था, जब दक्षिण का दर्शन उत्तर की धरती पर अपनी जड़ें जमा रहा था।
मध्यकाल में जब अलवार और नयनार संतों की भक्ति लहर दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ी तो कबीर, तुलसी और मीरा जैसे संतों ने उन भावों को आत्मसात किया। वहां संवाद शब्दावली से अधिक अनुभव और संगीत के माध्यम से हुआ। रामेश्वरम से काशी तक के यात्रियों ने बिना किसी औपचारिक भाषा प्रशिक्षण के, संकेतों और साझा सांस्कृतिक प्रतीकों से अपने रास्ते खोजे। यह इस बात का प्रमाण है कि संवाद के लिए लिपि से अधिक संवेदना की आवश्यकता होती है।
हालांकि, आधुनिक भारत में अंग्रेजी ने संवाद के एक तटस्थ सेतु के रूप में काम किया है। स्वतंत्रता के बाद जब भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो अंग्रेजी एक अनिवार्य बुराई के रूप में हमारे बीच बनी रही, जिसने उत्तर और दक्षिण को जोड़े रखा। तमिलनाडु जैसे राज्यों के लिए, जहां हिंदी के प्रति ऐतिहासिक और राजनीतिक संवेदनशीलता रही है, अंग्रेजी एक सुरक्षा कवच की तरह है। यह उन्हें उत्तर के साथ एक समान धरातल प्रदान करती है। द्रविड़ राजनीति ने अंग्रेजी को ज्ञान की खिड़की और हिंदी को पहचान का खतरा माना।
वर्तमान में दक्षिण भारत के शहर बेंगलुरु, हैदराबाद या चेन्नई के आईटी गलियारों में कार्यरत उत्तर भारतीय प्रोफेशनल और वहां के स्थानीय निवासी के बीच संवाद का प्राथमिक जरिया अंग्रेजी ही है। यह पेशेवर स्तर पर बहुत सफल है। इसने भारत को एक ग्लोबल हब बनाया है, लेकिन प्रश्न वही है, क्या यह अंग्रेजी संवाद आम आदमी के हृदय को छू पाता है? यहां संवाद तो है, पर वह मानवीय प्रवाह अक्सर गायब रहता है, जो अपनी भाषा में मिलता है।
यहीं पर हिंदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदी केवल एक सरकारी भाषा नहीं, बल्कि संवाद का एक इमोशनल फ्लो भी है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसका लचीलापन और स्वीकार्यता है। मध्यकाल में जब दिल्ली की सेनाएं, सूफी संत और व्यापारी दक्षिण गए तो वहां दकनी हिंदी का जन्म हुआ। इसने तेलुगु, मराठी और कन्नड़ के शब्दों को ऐसे अपनाया कि वह वहीं की मिट्टी की सुगंध देने लगी। कुली कुतुबशाह जैसे सुल्तानों ने इसी भाषा में कविताएं लिखीं। यह साबित करता है कि हिंदी थोपने की नहीं, बल्कि घुलने-मिलने की भाषा रही है।
यदि उत्तर भारत का कोई छोटा दुकानदार या मजदूर काम की तलाश में चेन्नई या कोच्चि जाता है तो वह अंग्रेजी नहीं बोल पाता। वहां वह स्थानीय भाषा के चंद शब्दों और अपनी टूटी-फूटी हिंदी के मिश्रण से संवाद का एक नया कामचलाऊ, लेकिन प्रभावी रास्ता निकाल लेता है। यह मजबूरी नहीं, बल्कि संवाद की सहज प्रवृत्ति है। यह दिखाता है कि आम आदमी के स्तर पर हिंदी एक 'लिंगुआ फ्रैंका' के रूप में स्वतः विकसित हो रही है। 21वीं सदी का युवा संवाद के लिए किसी सरकारी व्याकरण या राजनीतिक नारों का इंतजार नहीं करता है।
मनोरंजन की दुनिया ने वह कर दिखाया जो दशकों की नीतियां नहीं कर पाईं। पुष्पा, बाहुबली, आरआरआर, कांतारा जैसी दक्षिण भारतीय फिल्मों ने साबित कर दिया है कि कला की कोई सीमा नहीं होती। दक्षिण की कहानियों और वहां के परिवेश को उत्तर भारत में जिस तरह हिंदी के माध्यम से सराहा गया, उसने भाषाई पूर्वाग्रहों को जड़ से हिला दिया है। अब दक्षिण का युवा बॉलीवुड के माध्यम से और उत्तर का युवा डब की गई फिल्मों के माध्यम से एक-दूसरे के मुहावरों, प्रतीकों और संस्कृति को समझ रहे हैं। यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर दक्षिण के ब्लॉगर्स और उत्तर के इन्फ्लुएंसर्स एक साझा स्पेस बना रहे हैं। यहां संवाद हाइब्रिड है, थोड़ी अंग्रेजी, थोड़ी हिंदी और थोड़ी स्थानीय भाषा। यह ह्यूमन फ्लो का वह आधुनिक स्वरूप है, जो बिना किसी भाषाई कट्टरता के बह रहा है।
आज हम उस मुकाम पर खड़े हैं, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भाषाई बाधा को पूरी तरह खत्म करने वाला है। संभव है, कुछ वर्षों में तकनीक इतनी विकसित हो जाए कि एक तमिल भाषी फोन पर तमिल में बोले और सामने खड़ा उत्तर भारतीय उसे अपनी मातृभाषा में सुने। जब तकनीक संवाद को इतना सरल बना देगी, तब किसी एक कॉमन भाषा को थोपने या उसे अनिवार्य रूप से सीखने की विवशता स्वतः समाप्त हो जाएगी। तब संवाद केवल स्वेच्छा पर आधारित होगा। भावी संवाद भाषा पर नहीं, बल्कि विचार पर केंद्रित होगा।
दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध केवल भाषा का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक भय का परिणाम है कि कहीं हिंदी का वर्चस्व उनकी प्राचीन और समृद्ध भाषाओं के अस्तित्व को न निगल जाए। वैसे, भारत सरकार का त्रिभाषा सूत्र एक संतुलित समाधान है, बशर्ते उसे ईमानदारी से लागू किया जाए। संवाद तब सबसे प्रगाढ़ होता है, जब वह बराबरी का हो। यदि उत्तर भारत के स्कूलों में दक्षिण की एक भाषा अनिवार्य रूप से सिखाई जाए तो दक्षिण के राज्यों में हिंदी के प्रति स्वीकार्यता स्वतः बढ़ जाएगी। संवाद दोतरफा होना चाहिए।
संवाद तब सबसे सफल होता है, जब वह दिल से हो। यदि उत्तर भारतीय, दक्षिण की समृद्ध भाषाओं के प्रति सम्मान दिखाएं और उनके साहित्य व कला को सराहें और दक्षिण भारतीय हिंदी को एक प्रभुत्व के बजाय विकल्प के रूप में अपनाएं तो भारत का भाषाई संघर्ष एक बहुभाषी उत्सव में बदल जाएगा। हमें अपने संवाद की जड़ों को अपनी मिट्टी की भाषाओं में खोजना होगा। देश का भविष्य किसी एक भाषा के एकाधिकार में नहीं, बल्कि उन अनेक भाषाओं के सह-अस्तित्व और साझे संवाद में है, जो मिलकर एक महान राष्ट्र का संगीत बनाती हैं। संवाद शब्दों का मोहताज हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय एकता केवल साझा संवेदनाओं से ही आती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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आठवीं शताब्दी में केरल के कालडी में जन्मे आदि शंकराचार्य जब पदयात्रा करते हुए कश्मीर और काशी पहुंचे तो उन्होंने उत्तर के प्रकांड विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया। उनके बीच संवाद का माध्यम संस्कृत थी। संस्कृत उस समय की 'लिंगुआ फ्रैंका' (संपर्क भाषा) थी, जो केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि दर्शन, तर्क और विज्ञान की साझी कड़ी थी। यह वह काल था, जब दक्षिण का दर्शन उत्तर की धरती पर अपनी जड़ें जमा रहा था।
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मध्यकाल में जब अलवार और नयनार संतों की भक्ति लहर दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ी तो कबीर, तुलसी और मीरा जैसे संतों ने उन भावों को आत्मसात किया। वहां संवाद शब्दावली से अधिक अनुभव और संगीत के माध्यम से हुआ। रामेश्वरम से काशी तक के यात्रियों ने बिना किसी औपचारिक भाषा प्रशिक्षण के, संकेतों और साझा सांस्कृतिक प्रतीकों से अपने रास्ते खोजे। यह इस बात का प्रमाण है कि संवाद के लिए लिपि से अधिक संवेदना की आवश्यकता होती है।
हालांकि, आधुनिक भारत में अंग्रेजी ने संवाद के एक तटस्थ सेतु के रूप में काम किया है। स्वतंत्रता के बाद जब भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो अंग्रेजी एक अनिवार्य बुराई के रूप में हमारे बीच बनी रही, जिसने उत्तर और दक्षिण को जोड़े रखा। तमिलनाडु जैसे राज्यों के लिए, जहां हिंदी के प्रति ऐतिहासिक और राजनीतिक संवेदनशीलता रही है, अंग्रेजी एक सुरक्षा कवच की तरह है। यह उन्हें उत्तर के साथ एक समान धरातल प्रदान करती है। द्रविड़ राजनीति ने अंग्रेजी को ज्ञान की खिड़की और हिंदी को पहचान का खतरा माना।
वर्तमान में दक्षिण भारत के शहर बेंगलुरु, हैदराबाद या चेन्नई के आईटी गलियारों में कार्यरत उत्तर भारतीय प्रोफेशनल और वहां के स्थानीय निवासी के बीच संवाद का प्राथमिक जरिया अंग्रेजी ही है। यह पेशेवर स्तर पर बहुत सफल है। इसने भारत को एक ग्लोबल हब बनाया है, लेकिन प्रश्न वही है, क्या यह अंग्रेजी संवाद आम आदमी के हृदय को छू पाता है? यहां संवाद तो है, पर वह मानवीय प्रवाह अक्सर गायब रहता है, जो अपनी भाषा में मिलता है।
यहीं पर हिंदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदी केवल एक सरकारी भाषा नहीं, बल्कि संवाद का एक इमोशनल फ्लो भी है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसका लचीलापन और स्वीकार्यता है। मध्यकाल में जब दिल्ली की सेनाएं, सूफी संत और व्यापारी दक्षिण गए तो वहां दकनी हिंदी का जन्म हुआ। इसने तेलुगु, मराठी और कन्नड़ के शब्दों को ऐसे अपनाया कि वह वहीं की मिट्टी की सुगंध देने लगी। कुली कुतुबशाह जैसे सुल्तानों ने इसी भाषा में कविताएं लिखीं। यह साबित करता है कि हिंदी थोपने की नहीं, बल्कि घुलने-मिलने की भाषा रही है।
यदि उत्तर भारत का कोई छोटा दुकानदार या मजदूर काम की तलाश में चेन्नई या कोच्चि जाता है तो वह अंग्रेजी नहीं बोल पाता। वहां वह स्थानीय भाषा के चंद शब्दों और अपनी टूटी-फूटी हिंदी के मिश्रण से संवाद का एक नया कामचलाऊ, लेकिन प्रभावी रास्ता निकाल लेता है। यह मजबूरी नहीं, बल्कि संवाद की सहज प्रवृत्ति है। यह दिखाता है कि आम आदमी के स्तर पर हिंदी एक 'लिंगुआ फ्रैंका' के रूप में स्वतः विकसित हो रही है। 21वीं सदी का युवा संवाद के लिए किसी सरकारी व्याकरण या राजनीतिक नारों का इंतजार नहीं करता है।
मनोरंजन की दुनिया ने वह कर दिखाया जो दशकों की नीतियां नहीं कर पाईं। पुष्पा, बाहुबली, आरआरआर, कांतारा जैसी दक्षिण भारतीय फिल्मों ने साबित कर दिया है कि कला की कोई सीमा नहीं होती। दक्षिण की कहानियों और वहां के परिवेश को उत्तर भारत में जिस तरह हिंदी के माध्यम से सराहा गया, उसने भाषाई पूर्वाग्रहों को जड़ से हिला दिया है। अब दक्षिण का युवा बॉलीवुड के माध्यम से और उत्तर का युवा डब की गई फिल्मों के माध्यम से एक-दूसरे के मुहावरों, प्रतीकों और संस्कृति को समझ रहे हैं। यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर दक्षिण के ब्लॉगर्स और उत्तर के इन्फ्लुएंसर्स एक साझा स्पेस बना रहे हैं। यहां संवाद हाइब्रिड है, थोड़ी अंग्रेजी, थोड़ी हिंदी और थोड़ी स्थानीय भाषा। यह ह्यूमन फ्लो का वह आधुनिक स्वरूप है, जो बिना किसी भाषाई कट्टरता के बह रहा है।
आज हम उस मुकाम पर खड़े हैं, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भाषाई बाधा को पूरी तरह खत्म करने वाला है। संभव है, कुछ वर्षों में तकनीक इतनी विकसित हो जाए कि एक तमिल भाषी फोन पर तमिल में बोले और सामने खड़ा उत्तर भारतीय उसे अपनी मातृभाषा में सुने। जब तकनीक संवाद को इतना सरल बना देगी, तब किसी एक कॉमन भाषा को थोपने या उसे अनिवार्य रूप से सीखने की विवशता स्वतः समाप्त हो जाएगी। तब संवाद केवल स्वेच्छा पर आधारित होगा। भावी संवाद भाषा पर नहीं, बल्कि विचार पर केंद्रित होगा।
दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध केवल भाषा का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक भय का परिणाम है कि कहीं हिंदी का वर्चस्व उनकी प्राचीन और समृद्ध भाषाओं के अस्तित्व को न निगल जाए। वैसे, भारत सरकार का त्रिभाषा सूत्र एक संतुलित समाधान है, बशर्ते उसे ईमानदारी से लागू किया जाए। संवाद तब सबसे प्रगाढ़ होता है, जब वह बराबरी का हो। यदि उत्तर भारत के स्कूलों में दक्षिण की एक भाषा अनिवार्य रूप से सिखाई जाए तो दक्षिण के राज्यों में हिंदी के प्रति स्वीकार्यता स्वतः बढ़ जाएगी। संवाद दोतरफा होना चाहिए।
संवाद तब सबसे सफल होता है, जब वह दिल से हो। यदि उत्तर भारतीय, दक्षिण की समृद्ध भाषाओं के प्रति सम्मान दिखाएं और उनके साहित्य व कला को सराहें और दक्षिण भारतीय हिंदी को एक प्रभुत्व के बजाय विकल्प के रूप में अपनाएं तो भारत का भाषाई संघर्ष एक बहुभाषी उत्सव में बदल जाएगा। हमें अपने संवाद की जड़ों को अपनी मिट्टी की भाषाओं में खोजना होगा। देश का भविष्य किसी एक भाषा के एकाधिकार में नहीं, बल्कि उन अनेक भाषाओं के सह-अस्तित्व और साझे संवाद में है, जो मिलकर एक महान राष्ट्र का संगीत बनाती हैं। संवाद शब्दों का मोहताज हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय एकता केवल साझा संवेदनाओं से ही आती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।