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जीवन धारा: क्रोध की आग हमें ही जलाती है
Thu, 03 Sep 2026 07:20 AM IST
निर्मल कांत
सेनेका
सेनेका
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 03 Sep 2026 07:20 AM IST
सार
क्रोध में हमें लगता है कि हम दूसरे को दंड दे रहे हैं, जबकि असल में अपनी ही शांति भंग कर रहे होते हैं। ऐसे में यदि हम कुछ देर रुक जाएं, तो शायद गुस्से की आग खुद ही शांत हो जाए।
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जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
मनुष्य के भीतर उठने वाली सबसे तीव्र भावनाओं में क्रोध एक ऐसी आग है, जो बाहर से देखने पर दूसरे के विरुद्ध दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे उस व्यक्ति को ही भीतर से जलाने लगती है, जिसके हृदय में वह जन्म लेती है। जब हमें लगता है कि किसी ने हमारा अपमान किया, हमारे साथ अन्याय किया या हमारे अधिकारों की अनदेखी की, तब एक बेचैनी उठती है। मन तुरंत प्रतिशोध चाहता है। वह चाहता है कि जिसने हमें दुख दिया है, उसे भी वही पीड़ा महसूस हो। लेकिन इसी क्षण हमें रुककर स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या दूसरे की गलती की कीमत हमें अपनी शांति खोकर चुकानी चाहिए?
क्रोध हमें विश्वास दिलाता है कि हम दूसरे को दंड दे रहे हैं, जबकि वास्तव में हम अपनी ही चेतना को अशांत कर रहे होते हैं। जिस व्यक्ति पर हम क्रोधित हैं, वह शायद कुछ देर बाद अपनी दुनिया में लौट जाता है, लेकिन हमारा मन उसी घटना को बार-बार दोहराता रहता है। हम बातचीत को फिर से याद करते हैं, शब्दों को दोहराते हैं, कल्पना करते हैं कि हमें क्या कहना चाहिए था और मन ही मन उस व्यक्ति को दंड देने के अनेक तरीके खोजते रहते हैं। घटना समाप्त हो चुकी होती है, लेकिन हमारा क्रोध उसे भीतर जीवित रखता है। यहीं से क्रोध धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है। एक छोटी-सी बात बड़ी लगने लगती है, एक कठोर शब्द अपमान बन जाता है और एक गलती व्यक्ति के पूरे चरित्र का निर्णय करने लगती है। हम भूल जाते हैं कि मनुष्य अपूर्ण है, हम स्वयं भी। यदि हर भूल का उत्तर क्रोध से और हर चोट का उत्तर प्रतिशोध से दिया जाए, तो जीवन संबंधों का नहीं, संघर्षों का संग्रह बन जाएगा। क्रोध एक क्षणिक भावना नहीं, बल्कि ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसे विवेक से संभालना आवश्यक है। क्रोध आने पर यदि हम कुछ देर रुक जाएं, तो संभव है कि वह आग उतनी बड़ी न हो, जितनी पहली प्रतिक्रिया में दिखाई देती है। रुकना कमजोरी नहीं है। शांत रहना कायरता नहीं है।
कई बार सबसे बड़ा साहस यही होता है कि हमारे पास चोट पहुंचाने का अवसर हो, फिर भी हम अपने विवेक को अपने क्रोध से बड़ा बना दें। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए या गलत व्यवहार के सामने चुप रहा जाए। क्रोध के स्थान पर स्पष्टता हो सकती है। प्रतिशोध के स्थान पर न्याय हो सकता है। अपमान के स्थान पर आत्मसम्मान हो सकता है। किसी को क्षमा करना भी हमेशा उसके व्यवहार को सही मान लेना नहीं होता, कई बार क्षमा का अर्थ स्वयं को उस घटना की मानसिक कैद से मुक्त करना होता है। जीवन में ऐसे लोग अवश्य मिलेंगे, जो हमें समझेंगे नहीं, जो हमारे साथ अन्याय करेंगे, जो हमारे विश्वास को चोट पहुंचाएंगे। हम हर व्यक्ति को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया को दिशा दे सकते हैं। यही भीतर की स्वतंत्रता है।
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- ऑन एंगर के अनूदित अंश
सूत्र: क्षमा करना सीखें
क्रोध की आग में सबसे पहले वही जलता है, जो उसे अपने भीतर स्थान देता है। इसलिए, हर चोट का उत्तर क्रोध से देना आवश्यक नहीं। रुक जाना, शांत रहना और सोचकर प्रतिक्रिया देना ही सबसे बड़ी शक्ति है। अन्याय के सामने खड़े हों, लेकिन अपने भीतर की शांति न खोएं। क्षमा कमजोरी नहीं, स्वयं को मानसिक कैद से मुक्त करने का साहस है।
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क्रोध हमें विश्वास दिलाता है कि हम दूसरे को दंड दे रहे हैं, जबकि वास्तव में हम अपनी ही चेतना को अशांत कर रहे होते हैं। जिस व्यक्ति पर हम क्रोधित हैं, वह शायद कुछ देर बाद अपनी दुनिया में लौट जाता है, लेकिन हमारा मन उसी घटना को बार-बार दोहराता रहता है। हम बातचीत को फिर से याद करते हैं, शब्दों को दोहराते हैं, कल्पना करते हैं कि हमें क्या कहना चाहिए था और मन ही मन उस व्यक्ति को दंड देने के अनेक तरीके खोजते रहते हैं। घटना समाप्त हो चुकी होती है, लेकिन हमारा क्रोध उसे भीतर जीवित रखता है। यहीं से क्रोध धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है। एक छोटी-सी बात बड़ी लगने लगती है, एक कठोर शब्द अपमान बन जाता है और एक गलती व्यक्ति के पूरे चरित्र का निर्णय करने लगती है। हम भूल जाते हैं कि मनुष्य अपूर्ण है, हम स्वयं भी। यदि हर भूल का उत्तर क्रोध से और हर चोट का उत्तर प्रतिशोध से दिया जाए, तो जीवन संबंधों का नहीं, संघर्षों का संग्रह बन जाएगा। क्रोध एक क्षणिक भावना नहीं, बल्कि ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसे विवेक से संभालना आवश्यक है। क्रोध आने पर यदि हम कुछ देर रुक जाएं, तो संभव है कि वह आग उतनी बड़ी न हो, जितनी पहली प्रतिक्रिया में दिखाई देती है। रुकना कमजोरी नहीं है। शांत रहना कायरता नहीं है।
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कई बार सबसे बड़ा साहस यही होता है कि हमारे पास चोट पहुंचाने का अवसर हो, फिर भी हम अपने विवेक को अपने क्रोध से बड़ा बना दें। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए या गलत व्यवहार के सामने चुप रहा जाए। क्रोध के स्थान पर स्पष्टता हो सकती है। प्रतिशोध के स्थान पर न्याय हो सकता है। अपमान के स्थान पर आत्मसम्मान हो सकता है। किसी को क्षमा करना भी हमेशा उसके व्यवहार को सही मान लेना नहीं होता, कई बार क्षमा का अर्थ स्वयं को उस घटना की मानसिक कैद से मुक्त करना होता है। जीवन में ऐसे लोग अवश्य मिलेंगे, जो हमें समझेंगे नहीं, जो हमारे साथ अन्याय करेंगे, जो हमारे विश्वास को चोट पहुंचाएंगे। हम हर व्यक्ति को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया को दिशा दे सकते हैं। यही भीतर की स्वतंत्रता है।
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सूत्र: क्षमा करना सीखें
क्रोध की आग में सबसे पहले वही जलता है, जो उसे अपने भीतर स्थान देता है। इसलिए, हर चोट का उत्तर क्रोध से देना आवश्यक नहीं। रुक जाना, शांत रहना और सोचकर प्रतिक्रिया देना ही सबसे बड़ी शक्ति है। अन्याय के सामने खड़े हों, लेकिन अपने भीतर की शांति न खोएं। क्षमा कमजोरी नहीं, स्वयं को मानसिक कैद से मुक्त करने का साहस है।