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न्यूयॉर्क: स्कूलों में एआई पर पाबंदी क्यों, चैटबॉट से क्या हैं नुकसान? जानिए 6 लाख छात्रों पर क्या होगा असर
Thu, 03 Sep 2026 02:02 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Thu, 03 Sep 2026 02:02 PM IST
सार
न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने छोटे बच्चों के लिए जनरेटिव एआई के इस्तेमाल पर एक साल का सख्त बैन लगा दिया है। इस बड़े फैसले से लगभग छह लाख छात्र प्रभावित होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में सोचने-समझने की क्षमता विकसित करना और शिक्षकों से उनके सीधे जुड़ाव को सुरक्षित रखना है।
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न्यूयॉर्क के स्कूलों में एआई पर लगा प्रतिबंध
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हर क्षेत्र में तेजी से पैर पसार रहा है, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में। लेकिन अमेरिका के सबसे बड़े स्कूल डिस्ट्रिक्ट न्यूयॉर्क ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने टेक इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी ने पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 6 लाख छात्रों के लिए जनरेटिव एआई के इस्तेमाल पर तत्काल प्रभाव से एक साल का प्रतिबंध लगा दिया है। टेक कंपनियों और एआई के बढ़ते दखल के बीच उठाया गया यह कदम शिक्षा के पारंपरिक और मानवीय तरीकों को बचाने की एक बड़ी कोशिश माना जा रहा है।
बच्चों के लिए एआई टूल्स पर क्यों लगी पाबंदी?
चैटबॉट्स के इस्तेमाल से बच्चों को क्या हैं नुकसान?
क्रिटिकल थिंकिंग की कमी: एआई चैटबॉट्स से बच्चों को हर जटिल सवाल का बना-बनाया जवाब सेकंडों में मिल जाता है, इससे वे खुद से तर्क करना, समस्याओं का विश्लेषण करना और दिमागी कसरत करना छोड़ देते हैं। इससे उनकी सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है।
रचनात्मकता और मौलिकता की कमी: निबंध, कविताएं या प्रोजेक्ट खुद तैयार करने के बजाय बच्चे एआई का सहारा लेते हैं। इससे उनकी भाषा शैली, कल्पनाशीलता और खुद को अभिव्यक्त करने की प्राकृतिक कला धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
गलत सूचनाओं का असर: चैटबॉट्स अक्सर गलत या भ्रामक तथ्यों को बहुत ही प्रामाणिक और आत्मविश्वास भरे ढंग से पेश करते हैं। कच्ची उम्र के बच्चे इन जानकारियों को पूरी तरह सच मान लेते हैं, जिससे उनके बुनियादी ज्ञान की नींव ही गलत तथ्यों पर खड़ी हो सकती है।
मानवीय और सामाजिक कौशल में गिरावट: कक्षा में दोस्तों के साथ ग्रुप डिस्कशन करने या शिक्षकों से सवाल पूछने की बजाय स्क्रीन देखते रहने के कारण बच्चों के संवाद और सामाजिक कौशल का विकास रुक जाता है।
शिक्षक-छात्र संबंधों में दूरी: एक शिक्षक बच्चे की मानसिक स्थिति, उसकी कमजोरी और मजबूती को समझकर व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है। हर समस्या के लिए मशीनों पर निर्भरता इस भावनात्मक जुड़ाव और जरूरी मार्गदर्शन को पूरी तरह खत्म कर देती है।
स्क्रीन टाइम लिमिट कम करने पर जोर
टेक कंपनियों के दावों पर मेयर का पलटवार
प्रेस ब्रीफिंग के दौरान शहर के अधिकारियों ने टेक इंडस्ट्री की उस सोच को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एआई को शिक्षा के लिए जरूरी बताया जाता है। मेयर जोहरान ममदानी ने कड़े शब्दों में कहा कि टेक कंपनियां हमें यह विश्वास दिलाना चाहती हैं कि शुरुआती शिक्षा में एआई जरूरी है, लेकिन हम ऐसा बिल्कुल नहीं मानते। उन्होंने तर्क दिया कि स्कूलों का काम बच्चों को सवाल पूछना और चीजों को परखना सिखाना है, इसलिए यह अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे व्यावसायिक सॉफ्टवेयर की आंख मूंदकर अनुमति देने के बजाय उसकी कड़ी निगरानी करें।
फैसले पर उठ रहे सवाल
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बच्चों के लिए एआई टूल्स पर क्यों लगी पाबंदी?
- यह पाबंदी प्री-किंडरगार्टन से लेकर आठवीं कक्षा तक के छात्रों पर लागू की गई है। मेयर ममदानी और स्कूल्स चांसलर कामर सैमुअल्स द्वारा जारी इस निर्देश का मुख्य उद्देश्य बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग यानी खुद से सोचने-समझने की क्षमता को बचाना और शिक्षकों व छात्रों के बीच संवाद को बनाए रखना है।
- इस नए नियम के तहत शिक्षा अधिकारी 38 से अधिक क्लासरूम प्रोग्राम्स के स्वचालित (ऑटोमेटेड) फीचर्स को पूरी तरह बंद कर देंगे। इसके अलावा चैटजीपीटी और क्लॉड जैसे पब्लिक चैटबॉट सभी स्तर के स्कूलों में पूरी तरह से ब्लॉक रहेंगे। न्यूयॉर्क ने साल 2023 में भी चैटजीपीटी पर बैन लगाया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया गया था। अब प्रशासन ने पिछली नीतियों में बदलाव करते हुए दो-तिहाई छात्रों के लिए सख्त नियम लागू कर दिए हैं।
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चैटबॉट्स के इस्तेमाल से बच्चों को क्या हैं नुकसान?
क्रिटिकल थिंकिंग की कमी: एआई चैटबॉट्स से बच्चों को हर जटिल सवाल का बना-बनाया जवाब सेकंडों में मिल जाता है, इससे वे खुद से तर्क करना, समस्याओं का विश्लेषण करना और दिमागी कसरत करना छोड़ देते हैं। इससे उनकी सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है।
रचनात्मकता और मौलिकता की कमी: निबंध, कविताएं या प्रोजेक्ट खुद तैयार करने के बजाय बच्चे एआई का सहारा लेते हैं। इससे उनकी भाषा शैली, कल्पनाशीलता और खुद को अभिव्यक्त करने की प्राकृतिक कला धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
गलत सूचनाओं का असर: चैटबॉट्स अक्सर गलत या भ्रामक तथ्यों को बहुत ही प्रामाणिक और आत्मविश्वास भरे ढंग से पेश करते हैं। कच्ची उम्र के बच्चे इन जानकारियों को पूरी तरह सच मान लेते हैं, जिससे उनके बुनियादी ज्ञान की नींव ही गलत तथ्यों पर खड़ी हो सकती है।
मानवीय और सामाजिक कौशल में गिरावट: कक्षा में दोस्तों के साथ ग्रुप डिस्कशन करने या शिक्षकों से सवाल पूछने की बजाय स्क्रीन देखते रहने के कारण बच्चों के संवाद और सामाजिक कौशल का विकास रुक जाता है।
शिक्षक-छात्र संबंधों में दूरी: एक शिक्षक बच्चे की मानसिक स्थिति, उसकी कमजोरी और मजबूती को समझकर व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है। हर समस्या के लिए मशीनों पर निर्भरता इस भावनात्मक जुड़ाव और जरूरी मार्गदर्शन को पूरी तरह खत्म कर देती है।
स्क्रीन टाइम लिमिट कम करने पर जोर
- इस पाबंदी से हाई स्कूल के छात्रों को थोड़ी राहत दी गई है। उन्हें साल में दो बार एआई साक्षरता की कक्षाएं दी जाएंगी और कड़ी निगरानी में कुछ चुनिंदा एआई प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने की छूट मिलेगी। दूसरी ओर शिक्षकों को लेसन प्लानिंग और प्रशासनिक कार्यों के लिए एआई टूल्स का उपयोग करने की अनुमति दी गई है।
- हालांकि, कॉपियां जांचने (ग्रेडिंग) या छात्रों के किसी भी तरह के औपचारिक मूल्यांकन के लिए एआई का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित रहेगा। प्रशासन ने बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की लिमिट भी तय कर दी है। इसके तहत तीसरी से पांचवीं कक्षा के बच्चों के लिए 30 मिनट और छठी से आठवीं कक्षा के लिए 45 मिनट की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है। हालांकि, दिव्यांग छात्रों और अंग्रेजी भाषा सीखने वाले बच्चों को इन नियमों में विशेष छूट दी जाएगी।
टेक कंपनियों के दावों पर मेयर का पलटवार
प्रेस ब्रीफिंग के दौरान शहर के अधिकारियों ने टेक इंडस्ट्री की उस सोच को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एआई को शिक्षा के लिए जरूरी बताया जाता है। मेयर जोहरान ममदानी ने कड़े शब्दों में कहा कि टेक कंपनियां हमें यह विश्वास दिलाना चाहती हैं कि शुरुआती शिक्षा में एआई जरूरी है, लेकिन हम ऐसा बिल्कुल नहीं मानते। उन्होंने तर्क दिया कि स्कूलों का काम बच्चों को सवाल पूछना और चीजों को परखना सिखाना है, इसलिए यह अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे व्यावसायिक सॉफ्टवेयर की आंख मूंदकर अनुमति देने के बजाय उसकी कड़ी निगरानी करें।
फैसले पर उठ रहे सवाल
- इस बड़े फैसले पर शिक्षा जगत से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ टीचर्स के अध्यक्ष माइकल मुलग्रू ने स्क्रीन टाइम लिमिट और विशेष बच्चों को दी गई छूट का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय टेक कंपनियों और सप्लायर्स से सीधे तौर पर सुरक्षा मानकों की मांग की जानी चाहिए।
- वहीं फेयरप्ले के कार्यकारी निदेशक जॉश गोलिन ने चिंता जताई कि एआई के लंबे समय तक पड़ने वाले दुष्प्रभावों को समझने के लिए एक साल का समय काफी नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बच्चे स्कूल के बाद घर जाकर अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर होमवर्क के लिए एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं।
- चांसलर कामर सैमुअल्स ने भी माना कि घर पर बच्चों की डिजिटल आदतों पर नजर रखने के लिए स्कूल के साथ-साथ अभिभावकों की भी मदद लेनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया और इसके प्रभाव पर नजर रखने के लिए 'टेक्नोलॉजी इन स्कूल्स कोएलिशन' नाम का एक नया संगठन भी बनाया गया है।