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जीवन धारा: समस्या उम्र में नहीं, सोच में
Fri, 11 Sep 2026 07:06 AM IST
निर्मल कांत
रॉबर्ट एन बटलर
रॉबर्ट एन बटलर
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 11 Sep 2026 07:06 AM IST
सार
जब केवल उम्र के कारण बुजुर्गों की अनदेखी की जाती है, तो समस्या उम्र में नहीं, बल्कि उस सोच में होती है, जो आयु को क्षमता का पैमाना मान लेती है। उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति का अनुभव, ज्ञान, समझ और जीवन से अर्जित क्षमताएं कम हो गई हैं।
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जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
हम अक्सर भेदभाव को रंग, जाति, लिंग या आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखते हैं, लेकिन उम्र को लेकर बनी धारणाओं पर उतनी गंभीरता से सवाल नहीं उठाते। किसी बुजुर्ग को धीरे चलते देखकर हम सहज ही मान लेते हैं कि वह कमजोर है और अब उसका महत्व पहले जैसा नहीं रहा। यही सोच धीरे-धीरे हमारे व्यवहार में भी दिखाई देने लगती है और हम उम्रदराज लोगों को नजरअंदाज करने लगते हैं।
मसलन, किसी बुजुर्ग को नई तकनीक इस्तेमाल करने में थोड़ी परेशानी हो, तो हम तुरंत मान लेते हैं कि वह इसे सीख नहीं सकता। इसी तरह, कार्यस्थल पर किसी उम्रदराज व्यक्ति को देखकर यह धारणा बना लेना भी आम है कि अब उसमें पहले जैसी ऊर्जा या काम करने की क्षमता नहीं होगी। समस्या यह है कि ऐसी धारणाएं केवल दूसरों के व्यवहार तक सीमित नहीं रहतीं। लगातार इन्हीं नजरों से देखे जाने पर बुजुर्ग भी कभी-कभी अपनी क्षमताओं को कम आंकने लगते हैं। यही उम्र-आधारित पूर्वाग्रह हमारे सामाजिक संस्थानों, नीतियों और रोजमर्रा के व्यवहार में भी जगह बना लेते हैं। जब किसी व्यक्ति की केवल उसकी उम्र के कारण अनदेखी की जाती है, तो समस्या उम्र में नहीं, बल्कि उस सोच में होती है, जो उम्र को क्षमता का पैमाना मान लेती है। उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति का अनुभव, ज्ञान, समझ और जीवन से अर्जित क्षमताएं कम हो गई हैं। इसलिए, वृद्धावस्था का पैमाना तय करते समय हमें यह देखना चाहिए कि व्यक्ति ने जीवन से क्या सीखा, कितने अनुभव अर्जित किए और वह परिवार व समाज में क्या योगदान दे सकता है।
बुजुर्गों के प्रति हमारी धारणाएं कहीं न कहीं अपनी उम्र बढ़ने के डर से भी जुड़ी होती हैं। इस नजरिये को बदलना जरूरी है। जिस अपनेपन और सहजता से हम अपने युवा मित्रों के साथ समय बिताते हैं, उसी तरह बुजुर्गों के साथ भी बैठें, उनकी बातें सुनें और उनके अनुभवों को समझें। बुजुर्ग केवल हमारे अतीत का हिस्सा नहीं; भविष्य की संभावित तस्वीर भी हैं।
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मसलन, किसी बुजुर्ग को नई तकनीक इस्तेमाल करने में थोड़ी परेशानी हो, तो हम तुरंत मान लेते हैं कि वह इसे सीख नहीं सकता। इसी तरह, कार्यस्थल पर किसी उम्रदराज व्यक्ति को देखकर यह धारणा बना लेना भी आम है कि अब उसमें पहले जैसी ऊर्जा या काम करने की क्षमता नहीं होगी। समस्या यह है कि ऐसी धारणाएं केवल दूसरों के व्यवहार तक सीमित नहीं रहतीं। लगातार इन्हीं नजरों से देखे जाने पर बुजुर्ग भी कभी-कभी अपनी क्षमताओं को कम आंकने लगते हैं। यही उम्र-आधारित पूर्वाग्रह हमारे सामाजिक संस्थानों, नीतियों और रोजमर्रा के व्यवहार में भी जगह बना लेते हैं। जब किसी व्यक्ति की केवल उसकी उम्र के कारण अनदेखी की जाती है, तो समस्या उम्र में नहीं, बल्कि उस सोच में होती है, जो उम्र को क्षमता का पैमाना मान लेती है। उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति का अनुभव, ज्ञान, समझ और जीवन से अर्जित क्षमताएं कम हो गई हैं। इसलिए, वृद्धावस्था का पैमाना तय करते समय हमें यह देखना चाहिए कि व्यक्ति ने जीवन से क्या सीखा, कितने अनुभव अर्जित किए और वह परिवार व समाज में क्या योगदान दे सकता है।
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बुजुर्गों के प्रति हमारी धारणाएं कहीं न कहीं अपनी उम्र बढ़ने के डर से भी जुड़ी होती हैं। इस नजरिये को बदलना जरूरी है। जिस अपनेपन और सहजता से हम अपने युवा मित्रों के साथ समय बिताते हैं, उसी तरह बुजुर्गों के साथ भी बैठें, उनकी बातें सुनें और उनके अनुभवों को समझें। बुजुर्ग केवल हमारे अतीत का हिस्सा नहीं; भविष्य की संभावित तस्वीर भी हैं।
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