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दुर्गापूजा में दिखेगा सत्ता परिवर्तन का असर? पहली बार दक्षिणपंथी सरकार के राज में कैसे बदलेंगे बंगाल के पंडाल
सार
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर अब दुर्गापूजा तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। भाजपा सरकार के आने के बाद पहली बार होने वाली दुर्गापूजा में सिर्फ पंडालों की सजावट और थीम नहीं बदलने वाली, बल्कि आयोजक समितियों की राजनीति, सरकारी अनुदान की नीति, नेताओं की मौजूदगी और सांस्कृतिक संदेश में भी बदलाव के संकेत हैं।
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दुर्गा पूजा।
- फोटो : AI Generated
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में दुर्गापूजा सिर्फ पांच दिनों का धार्मिक उत्सव नहीं है। यह बंगाली समाज की संस्कृति, कला, अर्थव्यवस्था, सामुदायिक जीवन और राजनीति सबको एक साथ जोड़ने वाला सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच है। इसलिए जब राज्य में सत्ता बदलती है तो उसका असर दुर्गापूजा पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है। इस बार यह बदलाव और महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2026 में पश्चिम बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है और मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी सत्ता संभाल रहे हैं।
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इसलिए सवाल केवल इतना नहीं है कि इस बार पंडाल कैसे सजेंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा के शासन में दुर्गापूजा की पूरी राजनीतिक-सांस्कृतिक भाषा बदलने वाली है?
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2026 की दुर्गापूजा 16 से 21 अक्टूबर के बीच होगी। यह पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के गठन के बाद पहली दुर्गापूजा होगी। इस लिहाज से यह सरकार के लिए भी एक तरह की सांस्कृतिक परीक्षा है। भाजपा को एक तरफ अपने समर्थक वर्ग को यह संदेश देना है कि सत्ता परिवर्तन का असर जमीन पर दिख रहा है, तो दूसरी तरफ बंगाल की उस सांस्कृतिक पहचान को भी स्वीकार करना है जिसमें दुर्गापूजा किसी एक राजनीतिक विचारधारा की संपत्ति नहीं है।
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यही वजह है कि इस बार पंडालों की राजनीति पर खास नजर रहेगी
सबसे बड़ा बदलाव पहले ही दिखाई देने लगा है। सत्ता परिवर्तन के बाद कोलकाता के कई बड़े और चर्चित दुर्गापूजा आयोजक समितियों में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। कई समितियों में, जो पहले तृणमूल कांग्रेस से जुड़े नेताओं या समर्थकों के प्रभाव में मानी जाती थीं, नए पदाधिकारियों को जगह मिली है। कुछ समितियों ने अपनी कार्यकारिणी का पुनर्गठन किया है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर पंडाल भाजपा के कब्जे में चला गया है। लेकिन इतना जरूर है कि बंगाल की सत्ता बदलते ही उन सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के भीतर भी शक्ति संतुलन बदलने लगा है, जिनका राजनीतिक दलों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध रहा है।
यही बदलाव दुर्गापूजा को लेकर भाजपा की सबसे महत्वपूर्ण रणनीति हो सकता है—सरकार से ज्यादा समाज में अपनी मौजूदगी बढ़ाना।
ममता बनर्जी के लंबे शासन में दुर्गापूजा सरकारी कार्यक्रमों, प्रशासनिक सहयोग और राजनीतिक जनसंपर्क का बड़ा माध्यम बन गई थी। मुख्यमंत्री खुद बड़ी संख्या में पूजा पंडालों का उद्घाटन करती थीं। राज्य सरकार की ओर से पूजा समितियों को आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। 2025 में यह सहायता बढ़ाकर प्रति पूजा समिति 1.10 लाख रुपये तक पहुंच गई थी।
भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस व्यवस्था में बदलाव का संकेत मिल चुका है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने जून में संकेत दिया था कि सरकार सभी पूजा समितियों को एक समान आर्थिक सहायता देने की पुरानी व्यवस्था जारी रखने के बजाय जरूरत के आधार पर सहायता देने पर विचार कर रही है।
बाद में सामने आई जानकारी के मुताबिक 10 लाख रुपये से कम बजट वाली लगभग 75 प्रतिशत पूजा समितियों को सहायता जारी रहने की संभावना है, जबकि अपेक्षाकृत समृद्ध समितियों को सरकारी अनुदान से बाहर किया जा सकता है।
यहीं भाजपा सरकार और ममता सरकार की शैली में बड़ा अंतर दिखाई देता है
ममता सरकार ने दुर्गापूजा को बड़े पैमाने पर सरकारी सहयोग और जनकल्याणकारी राजनीति से जोड़ा था। भाजपा सरकार इसे अधिक ‘जरूरत आधारित’ मॉडल में बदलना चाहती दिखाई दे रही है। यानी सरकार का तर्क यह हो सकता है कि गरीब या छोटे पूजा आयोजकों को मदद मिले, लेकिन करोड़ों रुपये के बजट वाले बड़े कॉरपोरेट-प्रायोजित पंडालों को सरकारी पैसे की जरूरत नहीं है।
लेकिन इसके राजनीतिक अर्थ भी हैं, क्योंकि बंगाल में पूजा समितियां केवल धार्मिक संगठन नहीं हैं। ये स्थानीय सामाजिक नेटवर्क हैं। मोहल्ले की राजनीति, क्लब संस्कृति, युवा संगठन, व्यापारिक समुदाय और स्थानीय नेताओं के बीच इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिस राजनीतिक दल की इन समितियों तक ज्यादा पहुंच होती है, उसकी स्थानीय सामाजिक पकड़ भी मजबूत होती है।
भाजपा इस नेटवर्क को अब नए सिरे से बनाने की कोशिश करेगी
इसकी एक झलक पिछले साल ही दिखाई दे चुकी थी, जब भाजपा ने दुर्गापूजा के दौरान बड़े पैमाने पर जनसंपर्क कार्यक्रम चलाने की योजना बनाई थी। पार्टी कार्यकर्ताओं को पूजा पंडालों के माध्यम से लोगों तक पहुंचने और साड़ी वितरण जैसे कार्यक्रमों के जरिए संपर्क बढ़ाने को कहा गया था। इसका उद्देश्य सिर्फ धार्मिक उत्सव में भाग लेना नहीं, बल्कि ‘बंगाली अस्मिता’ के सवाल पर तृणमूल के राजनीतिक नैरेटिव का मुकाबला करना भी था। अब फर्क इतना है कि तब भाजपा विपक्ष में थी और अब सत्ता में है।
इसलिए इस बार उसका संदेश ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सांस्कृतिक सवाल भी यही है कि क्या वह बंगाल की दुर्गापूजा को उत्तर भारत के धार्मिक उत्सवों की तरह देखेगी या उसकी विशिष्ट बंगाली परंपरा को उसी रूप में स्वीकार करेगी?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल की दुर्गापूजा की पहचान सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं बनी। इसमें कला है, साहित्य है, संगीत है, लोक संस्कृति है, सामाजिक समावेश है और आधुनिकता भी है। कोलकाता के पंडाल पिछले कई दशकों से देश-दुनिया के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को अपनी थीम बनाते रहे हैं।
2025 में भी यह साफ दिखाई दिया था। जहां कुछ पंडालों ने बंगाली भाषा और अस्मिता को केंद्र में रखा, वहीं भाजपा से जुड़े आयोजनों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और राष्ट्रीय गौरव जैसे विषयों को प्रमुखता मिली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम वाले पंडाल का उद्घाटन किया था और उसी मौके पर उन्होंने ‘सोनार बांग्ला’ के लिए भाजपा सरकार की बात भी की थी। यानी पंडाल अब राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन चुके हैं।
2026 में यह प्रयोग और आगे जा सकता है
संभावना है कि भाजपा समर्थित या भाजपा के करीब माने जाने वाले पूजा आयोजनों में सनातन परंपरा, बंगाल का धार्मिक इतिहास, हिंदू सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता आंदोलन, भारतीय सेना, राष्ट्रीय गौरव और बंगाली हिंदू पहचान जैसे विषय ज्यादा दिखाई दें। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सरकार सभी पंडालों को ऐसी थीम अपनाने के लिए कहेगी। ऐसा कोई व्यापक सरकारी निर्देश सामने नहीं आया है।
दरअसल, भाजपा के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है यदि सरकार दुर्गापूजा को बहुत अधिक राजनीतिक या धार्मिक रंग देने की कोशिश करती है तो तृणमूल कांग्रेस को तुरंत यह कहने का मौका मिल सकता है कि भाजपा बंगाल की उदार और समावेशी संस्कृति को बदलना चाहती है। दूसरी तरफ यदि भाजपा पूरी तरह तटस्थ रहती है तो उसके अपने समर्थक वर्ग को लग सकता है कि सत्ता में आने के बाद पार्टी ने सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी वैचारिक धार कमजोर कर दी।
इसलिए भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता शायद यही होगा कि वह ‘हिंदुत्व’ की सीधी राजनीतिक भाषा के बजाय ‘बंगाली सनातन संस्कृति’ और ‘परंपरा’ की भाषा इस्तेमाल करे।
इसका संकेत पार्क स्ट्रीट के एलन पार्क में इस साल पहली बार दुर्गापूजा के आयोजन से भी मिलता है। यहां ‘कोलकाता सनातनी संघ’ पूजा आयोजित कर रहा है, जिसके नेतृत्व में भाजपा से जुड़े कई लोग हैं। आयोजकों ने इसे भव्य और पारंपरिक तरीके से आयोजित करने की बात कही है।
यह सिर्फ एक पूजा नहीं है। प्रतीक के स्तर पर इसका महत्व काफी बड़ा है
पार्क स्ट्रीट लंबे समय से कोलकाता की महानगरीय, आधुनिक और क्रिसमस-केंद्रित सार्वजनिक पहचान से जुड़ा रहा है। ऐसे स्थान पर ‘सनातनी’ पहचान के साथ दुर्गापूजा का विस्तार भाजपा की उस सांस्कृतिक राजनीति को मजबूत कर सकता है जिसमें बंगाल की आधुनिकता के साथ उसकी हिंदू परंपरा को भी प्रमुखता दी जाती है। लेकिन भाजपा के सामने एक और दिलचस्प चुनौती है—दुर्गापूजा पर सिर्फ तृणमूल का प्रभाव खत्म करना आसान नहीं होगा।
ममता बनर्जी ने लंबे समय में पूजा आयोजकों के साथ जो नेटवर्क बनाया था, वह सिर्फ सरकारी अनुदान से नहीं बना था। स्थानीय क्लब, नेता, व्यवसायी, कलाकार, प्रशासन और पूजा समितियों के बीच एक जटिल संबंध विकसित हुआ था। अब भाजपा सत्ता में है तो उसके सामने इन रिश्तों को नए सिरे से बनाने की चुनौती है।
इसीलिए इस बार पंडालों में कौन उद्घाटन कर रहा है, कौन मुख्य अतिथि है, कौन समिति का अध्यक्ष या सचिव बना है और किन नेताओं की तस्वीरें दिखाई देती हैं—इन सब पर राजनीतिक नजर रहेगी।
कई बड़े पंडालों में राजनीतिक नेताओं का प्रवेश पहले से ही शुरू हो चुका है। जुलाई में मोहम्मद अली पार्क की खुटी पूजा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य को आमंत्रित किया गया।
यह संकेत देता है कि भाजपा अब उन पूजा आयोजनों तक भी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है, जिन्हें लंबे समय से तृणमूल के प्रभाव वाला माना जाता था।
हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने यह भी कहा है कि पार्टी सांस्कृतिक मोर्चों पर बाहरी नियंत्रण नहीं करेगी और सरकार अपने प्रशासनिक काम में पार्टी के हस्तक्षेप के बिना काम करेगी।
इस बयान को भी समझना जरूरी है
भाजपा शायद यह नहीं चाहती कि उसकी सरकार पर यह आरोप लगे कि वह पूजा समितियों को राजनीतिक निर्देश दे रही है। इसलिए औपचारिक रूप से सरकार और पार्टी के बीच दूरी बनाए रखने की कोशिश होगी, जबकि जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की सामाजिक मौजूदगी बढ़ सकती है।
दुर्गापूजा के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी
ममता बनर्जी के दौर में मुख्यमंत्री खुद पूजा का चेहरा बन गई थीं। पंडाल उद्घाटन, मंत्रोच्चार, आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पूजा समितियों से संवाद—इन सबके जरिए उन्होंने एक ऐसी राजनीतिक शैली विकसित की जिसमें मुख्यमंत्री और दुर्गापूजा के बीच सीधा संबंध बन गया था। अब शुभेंदु अधिकारी के सामने उसी सार्वजनिक स्पेस में अपनी अलग पहचान बनाने की चुनौती है।
हाल के दिनों में उनका धार्मिक स्थलों पर जाना भी चर्चा में रहा है। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने पहली बार तारापीठ में पूजा-अर्चना की और वहां बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने पहुंचे।
इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भाजपा सरकार के दौरान मुख्यमंत्री की सार्वजनिक धार्मिक उपस्थिति पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे सकती है। लेकिन दुर्गापूजा के मामले में यह उपस्थिति कितनी राजनीतिक होगी और कितनी सांस्कृतिक, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
एक और बड़ा मुद्दा है पंडाल और सार्वजनिक स्थान
कई पूजा समितियां सड़क, पार्क या सार्वजनिक जगहों पर पंडाल लगाती हैं। नई सरकार के आने के बाद सड़क पर धार्मिक आयोजनों और अतिक्रमण को लेकर प्रशासनिक नीति में बदलाव की चर्चा हुई है। पूजा आयोजकों ने भी पंडाल निर्माण और सरकारी सहायता को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे हैं।
यहां भाजपा सरकार की परीक्षा होगी
अगर वह कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्थान के इस्तेमाल को लेकर सख्ती करती है तो उसे प्रशासनिक अनुशासन के रूप में पेश किया जा सकता है। लेकिन यदि बड़े पूजा आयोजनों को विशेष छूट मिलती दिखाई दी तो विपक्ष इसे दोहरे मानदंड के रूप में पेश कर सकता है।
यानी दुर्गापूजा सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, नई सरकार की प्रशासनिक शैली की भी परीक्षा होगी
सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा की अपनी राजनीति भी पूजा के मैदान में चुनौती से मुक्त नहीं है। हाल ही में कोलकाता के एंटाली इलाके में प्रस्तावित दुर्गापूजा को लेकर भाजपा के ही अलग-अलग गुटों के बीच विवाद सामने आया। खुटी पूजा के बाद खुटी उखाड़े जाने, बैनर हटाए जाने और पार्क को लेकर विवाद की खबरें सामने आईं।
इससे एक संकेत साफ है—सत्ता बदलने के बाद पूजा समितियों पर प्रभाव हासिल करने की होड़ सिर्फ भाजपा बनाम तृणमूल नहीं होगी। भाजपा के भीतर भी स्थानीय नेतृत्व और संगठन के बीच वर्चस्व की लड़ाई हो सकती है।
यही शायद इस साल की दुर्गापूजा की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बने
ममता बनर्जी के दौर में सवाल था कि तृणमूल का प्रभाव किस पूजा समिति पर कितना है। अब सवाल होगा कि भाजपा के कौन से नेता किस पूजा समिति के करीब हैं।
लेकिन इसके बावजूद एक बात नहीं भूलनी चाहिए। बंगाल की दुर्गापूजा इतनी बड़ी सामाजिक संस्था है कि किसी एक पार्टी के नियंत्रण में पूरी तरह आना मुश्किल है। यहां राजनीतिक सत्ता बदल सकती है, लेकिन पूजा की सामुदायिक प्रकृति बनी रहती है।
भाजपा यदि इसे समझती है तो उसकी रणनीति ज्यादा सफल हो सकती है
अगर वह दुर्गापूजा को सिर्फ हिंदुत्व के राजनीतिक मंच में बदलने की कोशिश करती है तो उसे विरोध का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन अगर वह इसे बंगाली संस्कृति, सनातन परंपरा, कला, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामुदायिक उत्सव के व्यापक मंच के रूप में देखती है तो उसका प्रभाव ज्यादा गहरा हो सकता है।
इस बार छोटे पंडालों के लिए सरकारी सहायता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अगर सरकार अपेक्षाकृत गरीब समितियों को मदद जारी रखती है और बड़े बजट वाले पंडालों को सरकारी अनुदान से बाहर करती है, तो इसे भाजपा सरकार की आर्थिक प्राथमिकता के रूप में देखा जाएगा। करीब 75 प्रतिशत समितियों को सहायता जारी रखने और 10 लाख रुपये से अधिक बजट वाली समितियों को सहायता से बाहर करने के संकेत मिल चुके हैं।
इससे भाजपा को एक राजनीतिक संदेश भी मिल सकता है, सरकारी पैसा बड़े आयोजनों के बजाय जरूरतमंदों के लिए।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बड़े पंडालों का बजट केवल पूजा तक सीमित नहीं होता। वे कलाकारों, कारीगरों, बिजली कर्मियों, सजावट कारोबारियों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी रोजगार देते हैं। इसलिए सरकार को अनुदान नीति बनाते समय केवल पूजा समिति की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि पूरे पूजा अर्थतंत्र को ध्यान में रखना होगा।
और यही कारण है कि 2026 की दुर्गापूजा को केवल धार्मिक चश्मे से देखना भूल होगी।
यह बंगाल की नई सत्ता का पहला बड़ा सांस्कृतिक प्रदर्शन है
पंडालों की थीम में क्या आता है, किस नेता को बुलाया जाता है, किन समितियों में नेतृत्व बदलता है, सरकार कितनी आर्थिक सहायता देती है, मुख्यमंत्री कितने पंडालों का उद्घाटन करते हैं, भाजपा के नेता कितनी सक्रियता दिखाते हैं और क्या ‘सनातनी’ पहचान को सार्वजनिक उत्सव में ज्यादा जगह मिलती है—इन सभी सवालों के जवाब एक साथ मिलेंगे।
सबसे बड़ा सवाल फिर भी यही रहेगा कि क्या भाजपा बंगाल की दुर्गापूजा को बदलना चाहती है या सिर्फ उसमें अपनी जगह बनाना चाहती है?
दोनों में बहुत बड़ा अंतर है
अगर भाजपा सिर्फ अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाती है तो यह बंगाल की राजनीति का स्वाभाविक विस्तार होगा। लेकिन यदि सरकार पूजा की सांस्कृतिक भाषा को बदलने की कोशिश करती है तो मामला कहीं ज्यादा संवेदनशील हो जाएगा।
क्योंकि बंगाल में दुर्गा सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं। वह बंगाली पहचान का भी हिस्सा हैं। यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस ने भी वर्षों तक दुर्गापूजा को ‘बंगाली अस्मिता’ से जोड़ा और भाजपा ने भी धीरे-धीरे बंगाली सांस्कृतिक पहचान को अपने राजनीतिक विमर्श में शामिल किया।
अब सत्ता भाजपा के हाथ में है
इसलिए पहली बार दक्षिणपंथी सरकार के शासन में होने वाली दुर्गापूजा यह बताएगी कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति कितनी बदलती है। क्या वह पंडालों को अधिक ‘सनातनी’ बनाने की कोशिश करेगी? क्या राष्ट्रीय गौरव और धार्मिक इतिहास की थीम बढ़ेगी?
क्या पूजा समितियों में भाजपा समर्थक नेतृत्व का विस्तार होगा? क्या सरकारी सहायता जरूरत के आधार पर सीमित होगी? और क्या मुख्यमंत्री तथा भाजपा के बड़े नेता पूजा को अपने जनसंपर्क का सबसे बड़ा मंच बनाएंगे?
इन सवालों के जवाब इस साल के पंडालों में मिलेंगे
इसलिए 2026 की दुर्गापूजा को सिर्फ देवी की आराधना और पंडाल दर्शन के नजरिये से देखना शायद अधूरा होगा। यह बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद बदलती सांस्कृतिक राजनीति का पहला बड़ा सार्वजनिक मंच भी होगी।
और शायद इस बार पंडालों की रोशनी में सिर्फ मां दुर्गा का चेहरा नहीं चमकेगा—बंगाल की बदली हुई राजनीतिक सत्ता का नया चेहरा भी दिखाई देगा।
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