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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   China Dam project and Fears of Devastation What Will Happen When Himalayan Disasters Collide on Brahmaputra

चीन के बांध और तबाही की चिंताएं: जब हिमालयी आपदाएं ब्रह्मपुत्र नदी पर परियोजनाओं से टकराएंगी, तो क्या होगा?

Mon, 21 Sep 2026 04:51 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Mon, 21 Sep 2026 04:51 AM IST
सार

चीन का तर्क है कि विकास उसका संप्रभु अधिकार है। पर जब हिमालयी आपदाएं ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की प्रस्तावित पनबिजली परियोजनाओं से टकराएंगी, तो क्या होगा।

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China Dam project and Fears of Devastation What Will Happen When Himalayan Disasters Collide on Brahmaputra
चीन ने ब्रह्मपुत्र पर दुनिया के सबसे बड़े बांध परियोजना को मंजूरी दी (नदी की फाइल फोटो) - फोटो : एएनआई

विस्तार

नेपाल में 26 अगस्त को आई त्रासदी याद दिलाती है कि हिमालय अब महज एक भौगोलिक दीवार नहीं, बल्कि बेहद नाजुक पारिस्थितिक क्षेत्र है। अब सवाल यह है कि जब हिमालयी आपदाएं तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की प्रस्तावित पनबिजली परियोजना से टकराएंगी, तो क्या होगा? नेपाल त्रासदी के कुछ ही दिन बाद बीजिंग ने उसे आगे बढ़ाने का इरादा दोहराया है। निचले यारलुंग जांग्बो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर बनने वाली इस पांच बांधों वाली परियोजना की अनुमानित लागत 14 लाख करोड़ रुपये और इसकी क्षमता 60 गीगावाट तक हो सकती है। अरुणाचल प्रदेश की ओर नदी के मुड़ने से पहले ‘ग्रेट बेंड’ के पास इसकी प्रस्तावित जगह इसे भारत के लिए एक रणनीतिक चिंता का विषय बनाती है।

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जलवायु वैज्ञानिकों और हिमालयी समुदायों ने चेतावनी दी है कि बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर, अनियमित बारिश, अस्थिर ढलान और बिना सोचे-समझे मानवीय हस्तक्षेप पहाड़ों को और ज्यादा खतरनाक बना रहे हैं। यारलुंग त्सांगपो नदी (जो भारत में ब्रह्मपुत्र बन जाती है) पर चीन की विशाल बांध परियोजना एक नया रणनीतिक पहलू जोड़ती है। नदी के बहाव की दिशा में पड़ने वाले देशों के लिए सीधा सवाल है कि उस नदी के पानी पर किसका नियंत्रण होगा, जो लाखों लोगों के जीवन का आधार है? दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप-संवेदनशील और पर्यावरण की दृष्टि से नाजुक इलाकों में से एक में इतना विशाल बांध बनाने में ऐसे जोखिम हैं, जिन्हें मापा नहीं जा सकता।
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भूकंप, भूस्खलन या अचानक पानी छोड़े जाने से बनी प्राकृतिक आपात स्थिति सीमा-पार की आपदा में बदल सकती है। एशिया की कई बड़ी नदियों के उद्गम स्थलों पर चीन के नियंत्रण ने नदी के निचले इलाकों के देशों में चिंता पैदा कर दी है। तिब्बत के जल संसाधनों पर चीन का एकाधिकार निचले इलाकों के देशों के लिए त्रासदी और नुकसान का कारण बन सकता है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत व बांग्लादेश में खेती, मत्स्यपालन, पारिस्थितिकी तंत्र और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। इसका पारिस्थितिक संतुलन नाजुक है। इसके ऊपरी हिस्से में बड़े पैमाने पर दखल को क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह मामला तब और भी अहम हो जाता है, जब हिमालय के आसपास भूगोल, भू-विज्ञान और भू-राजनीति पहले से ही खतरनाक ढंग से आपस में जुड़े हुए हों।
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असली समस्या पारदर्शिता और गारंटी की कमी है। हाइड्रोलॉजिकल डाटा (पानी से जुड़े आंकड़े) के मामले में चीन के रवैये पर सवाल उठे हैं। 2017 में डोकलाम में हुए सैन्य गतिरोध के दौरान, चीन ने बांग्लादेश से तो डाटा साझा किया, लेकिन भारत से नहीं। इस वजह से भारत ब्रह्मपुत्र में आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाता, जबकि चीन समझौते के तहत भारत के साथ यह जानकारी साझा करने के लिए बाध्य है। जिस देश का नदियों के उद्गम स्थल पर नियंत्रण होता है, वह खेती, आपदा की तैयारी, ऊर्जा सुरक्षा और अंततः राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि चीन की बांध बनाने की महत्वाकांक्षाओं को भारत सिर्फ तिब्बत से जुड़ा मामला नहीं मान सकता।


नेपाल की त्रासदी को एक गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जाना चाहिए। जब पहले से अस्थिर पहाड़ी इलाकों पर खराब मौसम, भूकंप, भूस्खलन और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का दबाव एक साथ बढ़ता है, तो छोटी-सी चूक भी बड़े संकट में बदल सकती है। अब इस क्षेत्र में पर्यावरण सुरक्षा को पूरे क्षेत्र की साझा सुरक्षा की जिम्मेदारी माना जाना चाहिए और नदी के बहाव की दिशा में पड़ने वाले देशों को मिलकर चीन से पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी इसका समर्थन करना चाहिए। पानी और भूकंप से जुड़ी जानकारी, समय पर चेतावनी और आपात स्थिति में आपसी तालमेल के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यवस्था बनाने पर जोर देना चाहिए।

चीन का यह तर्क कि विकास उसका संप्रभु अधिकार है। लेकिन किसी इलाके पर संप्रभुता का मतलब यह नहीं है कि नदी के बहाव की दिशा में रहने वाले लोगों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। सीमा-पार बहने वाली नदी को केवल उस देश की निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता, जहां से वह निकलती है। जरूरी है कि पानी छोड़े जाने की असामान्य घटनाओं की पहले से सूचना दी जाए और आपदा से निपटने के लिए एक तय व्यवस्था हो। बांधों के कुल असर की जांच स्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन के जरिये होनी चाहिए, न कि हर परियोजना का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए। नेपाल में हुई तबाही हिमालय का साफ संकेत है। इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि हम अगली आपदा का इंतजार करें और मरने वालों की गिनती करें। नदी के बहाव की दिशा में बसे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मिलकर चीन पर दबाव बनाना चाहिए कि वह पानी और भूकंप संबंधी जानकारी साझा करने के लिए बाध्यकारी समझौतों पर हस्ताक्षर करें।

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