फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   issue we are storytellers too folk life lives in our stories

मुद्दा: हम भी हैं कथा कहने वाले, किस्सों में बसता है हमारा लोकजीवन

Tue, 08 Sep 2026 07:19 AM IST
Kshama Sharma क्षमा शर्मा
Updated Tue, 08 Sep 2026 07:19 AM IST
विज्ञापन
सार
कथा कहने की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है। शिव-पार्वती से लेकर दादी-नानी तक, पीढ़ियां कहानियां सुनाती रहीं। आज मिरायम इसे पेशा बना चुकी हैं।
loader
issue we are storytellers too folk life lives in our stories
हमारी जिंदगी में रची-बसी है किस्सागोई - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

कोलंबिया की सड़सठ साल की महिला हैं -मिरायम। वह गप्प या कहानी सुनाकर, पैसे कमाती हैं। उनकी फीस पांच हजार से दस हजार पीसो है, जो सवा या ढाई से कुछ कम डॉलर के बराबर है। वे अपने काम में इतनी सफल हैं कि कमाए गए पैसे से दो मकान खरीद चुकी हैं। वे अपने आसपास की कहानी ही सुनाती हैं। यदि कोई महत्वपूर्ण जानकारी चाहे, तो इसके लिए अधिक पैसे लेती हैं।


मिरायम, अपने आसपास जो घटते देखती हैं, जैसे कि लड़ाई-झगड़े, छिप-छिपकर बनाए जाने वाले संबंध, पारिवारिक तनाव, उन्हें अपनी डायरी में लिखती जाती हैं। इन्हीं घटनाओं को कहानी में ढाल देती हैं।

बहुत से लोग उनकी इस कला की तारीफ करते हैं, तो बहुत से यह कहकर आलोचना कि वे लोगों के निजी जीवन में ताका-झांकी करती हैं। फिर इसे ही कहानी बनाकर, उनकी निजता का हनन भी।

दरअसल, जिसे कथा कहन या स्टोरी टेलिंग कहा जाता है, यह वही है। इन दिनों बहुत से स्कूलों में स्टोरी टेलिंग सेशंस होते हैं। यों भी अपने देश में तो यह सदियों से चल रही है। इसे श्रुत परंपरा भी कहते हैं।

कहीं शिवजी पार्वती को कथा सुनाते हैं, तो कहीं काकभुसंडि और गरुड़ को यह जिम्मेदारी मिलती है। महाभारत  की कथा में व्यास जी सुनाते जाते हैं और गणेश जी लिखते जाते हैं।

कथा सरित्सागर में पहले शिवजी पार्वती को कथा सुनाते हैं। फिर शिव के गण पुष्पदंत और काणभूमि ने ये कथाएं सुनीं। पुष्पदंत को वररुचि भी कहा गया। इसके बाद ये कथाएं गुणाढ्य ने सुनीं और पैशाची भाषा में बृहत्कथा की रचना की। बाद में सोमदेव भट्ट ने इन्हें कथा सरित्सागर  के नाम से संस्कृत में लिखा। पंचतंत्र की सारी कथाएं विष्णु शर्मा ने कही हैं। ये कथाएं तीन राजकुमारों को नीति सिखाने के लिए थीं। इन कथाओं को पशु-पक्षियों के माध्यम से कहा गया है।

 राम कथा, कृष्ण कथा, कथा भागवत, आज भी लोग खूब सुनते हैं। कई कथावाचकों के यहां, तो कहानी सुनने के लिए भारी भीड़ होती है। चारण-भाट भी कथा सुनाने के लिए मशहूर रहे हैं। वे अपने-अपने इलाके के राजाओं की शूरवीरता की कहानियां सुनाते रहे हैं। इसी तरह उर्दू, फारसी में दास्तान गो, किस्सा गो, पंजाब में ढोल या सारंगी के साथ वीर रस की कथाएं सुनाने वाले, राजस्थान में भोपा आदि रहे हैं।

बहुत-सी व्रत कथाएं स्त्रियां आपस में एक-दूसरे को सुनाती हैं, उदाहरण के तौर पर उत्तर भारत में करवा चौथ या अहोई आठे। नाग पंचमी के अवसर पर भी ऐसा ही होता है। इन कथाओं को सुनाने से पहले बाकायदा दीवारों पर चित्रित भी किया जाता रहा है।  

कहानी सुनाने में नाटकीयता का भी बड़ा महत्व  है। जितने अच्छे अभिनय, आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ कहानी सुनाई जाए, वह उतनी ही रोचक मानी जाती है।

पहले  बहुत से लोग गांवों में तरह-तरह के रूप धरकर आते थे। वे कथाएं भी सुनाते थे। इन्हें बहुरूपिया कहा जाता था। कथाओं का महत्व पीढ़ी दर पीढ़ी चला आता है। लोरियां भी इनका ही एक रूप हैं। अपने यहां दादी-नानी की कहानियां मशहूर रही हैं। स्त्रियों को बड़ी संख्या में कहानियां याद रहती थीं। रात को सोते वक्त अकसर वे बच्चों को सुनाती थीं। बहुत-सी कथाएं ऐसी होतीं, जो अकसर खत्म ही न होतीं। आज संयुक्त परिवार के अभाव में दादी-नानी की कहानियां विराम पा रही हैं, लेकिन उनकी जगह तकनीक ने ले ली है। यूट्यूब पर कहानियों की भरमार है। बहुत से युवा माता-पिता बच्चों के सोने से पहले किताब से पढ़कर उन्हें बैड टाइम स्टोरी सुनाते हैं। कई भारतीय माता-पिता को विदेशों में भी ऐसा करते देखा है।  

बल्कि, तमाम मुहावरों, कहावतों, लोकोक्तियों में भी तरह-तरह की कथाएं छिपी होती थीं। जब भी कोई घटना होती, तो उससे जुड़ी कोई कहावत कहकर, कहानी सुना दी जाती। इनमें नई घटनाएं भी जुड़ती चली जातीं।

 तरह-तरह के स्थानीय देवताओं, साधु-संतों, पेड़, पोखर, कुएं, खेत आदि से भी बहुत-सी कथाएं जुड़ी रहती हैं। इनमें साहस, डर, रोमांच, फसलें, पशु, पेड़-पौधे आते-जाते रहते हैं। वे कभी भूत-प्रेत, कभी कोई चिड़िया, तो कभी पशु बन जाते हैं।

रूप बदलने वाले राक्षस, अप्सराएं और परियों का भी बोलबाला रहता है। इतनी घटनाएं, बेशुमार चरित्र, ढोल, नगाड़े और संगीत के साथ आएं तो कौन है, जिसे इन कथाओं में दिलचस्पी पैदा न हो। जब कोलंबिया की मिरायम के बारे में पढ़ा, तो गांवों में देखे-सुने बहुत से वे कहानी सुनाने वाले याद आने लगे, जिनकी कहानियां सुनने के लिए शाम होते ही चबूतरों पर भारी भीड़ लग जाती। सुनने वाले उनकी कहानियों को देर रात तक सुनकर आनंद लेते थे।  
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed