सिर्फ दिल्ली नहीं: सत्य निकेतन में इमारत ढहना देश की शहरी व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल, हादसों की नींव कहां?
सत्य निकेतन में इमारत का ढहना सिर्फ दिल्ली नहीं, बल्कि देश की शहरी व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। ऐसे हादसों की नींव तो तभी पड़ जाती है, जब गैर-जिम्मेदार तंत्र और भ्रष्टाचार की तहें अवैध इमारतें खड़ी कर रहे होते हैं।
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दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत का ढहना सिर्फ एक और भवन दुर्घटना नहीं, बल्कि देश की शहरी व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। देश में भवनों के निर्माण और रखरखाव से जुड़े नियमों की कोई कमी नहीं है। फिर भी देश के अलग-अलग इलाकों से अगर आए दिन बहुमंजिला इमारतों के भरभराकर गिरने की घटनाएं सामने आ रही हों, तो सवाल उठने ही चाहिए। यह दुर्भाग्य ही है कि हमारे शहरों में भवन सुरक्षा को लेकर सारी सक्रियता अक्सर हादसों के बाद ही दिखती है। इमारत के गिरने का यह कोई पहला मामला नहीं है। कुछ महीने पहले साकेत मेट्रो स्टेशन के पास एक अवैध निर्माणाधीन इमारत गिर गई थी, जिसमें कई छात्रों की जान चली गई थी। इसके बावजूद अगर देश में इस तरह के हादसे बदस्तूर जारी हैं, तो यह मानने का पर्याप्त आधार है कि पिछली घटनाओं से सबक नहीं लिया गया। हर हादसे के बाद जांच बैठाना और कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई कर देने से व्यवस्था की खामियां दूर नहीं होतीं।
अवैध निर्माण सिर्फ दिल्ली की कहानी नहीं है। पुरानी कमजोर इमारतों पर अतिरिक्त मंजिलें चढ़ाई जाती हैं, बेसमेंट खोदे जाते हैं, बगैर अनुमति और मजबूत नींव के काम होता रहता है। भ्रष्टाचार की तहें नगरीय निकायों की नजर में ये सब आने नहीं देतीं। दरअसल, ऐसे हादसों की नींव तो तभी पड़ जाती है, जब बिल्डर, ठेकेदार व सरकारी अधिकारी मिलकर भ्रष्टाचार की इमारत खड़ी कर रहे होते हैं। चूंकि देश भर से बच्चे उच्च शिक्षा या बड़ी परीक्षाओं की तैयारी के लिए राजधानी आते हैं, इसलिए यहां छात्र आवास की भारी मांग है और मुनाफा कमाने की होड़ में सुरक्षा के नियमों को ताक पर रख दिया जाता है।
अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सत्य निकेतन हादसे के बाद सख्त और व्यापक कार्रवाई के आदेश दिए हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी, एमसीडी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस समेत सभी पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। लेकिन जब तक व्यवस्था की मूल कमियों पर प्रहार नहीं होगा, तब तक अवैध निर्माण पर रोक लगाना संभव नहीं होगा। इस हादसे को राष्ट्रीय संदर्भ में देखे जाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि यह हमारे सामूहिक विवेक और व्यवस्था की नैतिकता के ढहने की कहानी है। बुनियादी सुरक्षा और ईमानदारी सुनिश्चित किए बगैर क्या सही अर्थों में विकास संभव हो सकता है? ताजा हादसे के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि पूरे देश में इमारतों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार पर प्रहार प्रशासन की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर आएगा, तभी यह माना जा सकता है कि हादसे से कोई सार्थक सबक लिया गया।