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जीवन धारा: जीवन को भाग्य के हवाले मत करो
Wed, 30 Sep 2026 07:29 AM IST
निर्मल कांत
ओशो
ओशो
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 30 Sep 2026 07:29 AM IST
सार
जीवन की हर घटना को नियंत्रित करना हमारे वश में नहीं है, पर उसके बाद अपने भीतर क्या बचाए रखना है, यह हमें ही तय करना है। इसलिए, जीवन को भाग्य के भरोसे न छोड़ें और अपना कर्म करते रहें।
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जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अपने जीवन को जीने से पहले ही किसी और के हाथों में सौंप देता है। वह कहता है कि जो भाग्य में लिखा है, वही होगा। और, यह छोटा-सा वाक्य धीरे-धीरे उसके जीवन का दर्शन बन जाता है। फिर, वह अपने फैसलों के लिए परिस्थितियों को दोष देने लगता है और असफलताओं के लिए भाग्य को कोसता है। लेकिन, क्या सचमुच कोई भाग्य तुम्हारे जीवन को लिख रहा है! अगर सब कुछ पहले से लिखा है, तो फिर तुम्हारे चुनाव और कर्म का क्या अर्थ रह जाता है? तुम्हारे प्रेम और साहस का क्या होता है? तुम्हारे भीतर उठती हुई उस आवाज का क्या अर्थ है, जो कहती है कि मैं कुछ अलग कर सकता हूं?
भाग्य पर भरोसा अक्सर मनुष्य को एक अदृश्य सांत्वना देता है। तब वह कहता है कि इसमें मैं क्या कर सकता था, ऐसा ही होना था। इस तरह वह अपने जीवन की जिम्मेदारी से बच जाता है। जीवन कोई तैयार किताब नहीं, जिसके हर पन्ने पर पहले से शब्द लिखे हों। जीवन तो खाली पन्नों की तरह है। परिस्थितियां तुम्हें कागज देती हैं, पर शब्द तुम्हें ही लिखने होते हैं। जीवन तो जिम्मेदारी है। हवाएं तुम्हारे नियंत्रण में नहीं हैं, लेकिन नाव की दिशा तुम्हें ही तय करनी है। रास्ते हमेशा तुम्हारे अनुसार नहीं होंगे, किंतु चलना या रुक जाना तुम्हारे हाथ में है। हालांकि, यह भी सच है कि बहुत कुछ तुम्हारे हाथ में भी नहीं है। जन्म तुम्हारे हाथ में नहीं था। मृत्यु तुम्हारे हाथ में नहीं है। मौसम तुम्हारे हाथ में नहीं है। दूसरे मनुष्य तुम्हारे अनुसार व्यवहार करें, यह भी तुम्हारे हाथ में नहीं है।
मनुष्य का एक बड़ा भ्रम है कि जीवन कल से शुरू होगा। जीवन का अर्थ अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा करना नहीं है। उसका अर्थ है प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अपनी चेतना को जीवित रखना। तुम्हें जीवन ने जो दिया है, उससे तुम क्या बनाते हो, यही सृजन है। एक ही परिस्थिति में दो मनुष्य होते हैं। एक व्यक्ति असफल होकर कहता है कि मेरे भाग्य में सफलता नहीं थी। दूसरा कहता है कि यह असफलता मुझे कुछ सिखाने आई है। पहला व्यक्ति असफलता को ही अंतिम निर्णय बना देता है, जबकि दूसरा उसे अगला कदम। यही अंतर है। इसलिए, जीवन को भाग्य की नहीं, संभावना की दृष्टि से देखो। मनुष्य को सबसे अधिक स्वतंत्रता तब मिलती है, जब वह यह समझ लेता है कि उसे अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद लेनी है। यह जिम्मेदारी बोझ नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है।
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जीवन तुम्हारी इच्छाओं का गुलाम नहीं है। तुम्हारे पास जीवन में घटित होने वाली हर घटना को नियंत्रित करने की शक्ति भी नहीं है, पर हर घटना के बाद अपने भीतर क्या बचाए रखना है, यह तुम ही तय करते हो। इसलिए, भाग्य से लड़ने की जरूरत नहीं है। बस कर्म करो और अपने जीवन को भाग्य के हवाले मत करो।
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भाग्य पर भरोसा अक्सर मनुष्य को एक अदृश्य सांत्वना देता है। तब वह कहता है कि इसमें मैं क्या कर सकता था, ऐसा ही होना था। इस तरह वह अपने जीवन की जिम्मेदारी से बच जाता है। जीवन कोई तैयार किताब नहीं, जिसके हर पन्ने पर पहले से शब्द लिखे हों। जीवन तो खाली पन्नों की तरह है। परिस्थितियां तुम्हें कागज देती हैं, पर शब्द तुम्हें ही लिखने होते हैं। जीवन तो जिम्मेदारी है। हवाएं तुम्हारे नियंत्रण में नहीं हैं, लेकिन नाव की दिशा तुम्हें ही तय करनी है। रास्ते हमेशा तुम्हारे अनुसार नहीं होंगे, किंतु चलना या रुक जाना तुम्हारे हाथ में है। हालांकि, यह भी सच है कि बहुत कुछ तुम्हारे हाथ में भी नहीं है। जन्म तुम्हारे हाथ में नहीं था। मृत्यु तुम्हारे हाथ में नहीं है। मौसम तुम्हारे हाथ में नहीं है। दूसरे मनुष्य तुम्हारे अनुसार व्यवहार करें, यह भी तुम्हारे हाथ में नहीं है।
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मनुष्य का एक बड़ा भ्रम है कि जीवन कल से शुरू होगा। जीवन का अर्थ अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा करना नहीं है। उसका अर्थ है प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अपनी चेतना को जीवित रखना। तुम्हें जीवन ने जो दिया है, उससे तुम क्या बनाते हो, यही सृजन है। एक ही परिस्थिति में दो मनुष्य होते हैं। एक व्यक्ति असफल होकर कहता है कि मेरे भाग्य में सफलता नहीं थी। दूसरा कहता है कि यह असफलता मुझे कुछ सिखाने आई है। पहला व्यक्ति असफलता को ही अंतिम निर्णय बना देता है, जबकि दूसरा उसे अगला कदम। यही अंतर है। इसलिए, जीवन को भाग्य की नहीं, संभावना की दृष्टि से देखो। मनुष्य को सबसे अधिक स्वतंत्रता तब मिलती है, जब वह यह समझ लेता है कि उसे अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद लेनी है। यह जिम्मेदारी बोझ नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है।
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जीवन तुम्हारी इच्छाओं का गुलाम नहीं है। तुम्हारे पास जीवन में घटित होने वाली हर घटना को नियंत्रित करने की शक्ति भी नहीं है, पर हर घटना के बाद अपने भीतर क्या बचाए रखना है, यह तुम ही तय करते हो। इसलिए, भाग्य से लड़ने की जरूरत नहीं है। बस कर्म करो और अपने जीवन को भाग्य के हवाले मत करो।