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इस दोस्ती के पीछे की कहानी: महाशक्तियों के बीच पाकिस्तान की कूटनीतिक चालबाजी

Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Fri, 12 Jun 2026 06:49 AM IST
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सार

पाकिस्तान ने हाल ही में चीन के साथ अपने राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे होने का जश्न भले ही मनाया हो और दोनों ने हमेशा अपने रिश्तों को ‘आयरन ब्रदर्स’(पक्के भाई) जैसे शानदार शब्दों में बयां भी किया हो, लेकिन सच तो यही है कि दोनों देशों के रिश्ते मुख्य रूप से भारत-विरोध और लेन-देन पर ही आधारित रहे हैं।

Pakistan relation with china us diplomacy power base on india enemity
पाकिस्तान चीन संबंध - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

चीन के साथ राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे होने का जश्न मनाने के कुछ ही दिनों बाद, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद में अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों की जमकर तारीफ करते हुए, उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को 'शांति दूत' कहा और पाकिस्तान-भारत के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने तथा अमेरिका व ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका पाकिस्तान को सौंपने के लिए भी उनका धन्यवाद किया।
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पाकिस्तान इस मामले में चीन से आगे निकल गया, क्योंकि चीन को मध्यस्थ की भूमिका नहीं मिली। संघर्ष बढ़ने के कारण सहयोगी की यह भूमिका लंबे समय तक चलने की उम्मीद है। लेकिन पर्दे के पीछे से चीन जो भूमिका निभा रहा है, उससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता। कहा जा सकता है कि यह पाकिस्तान के लिए एक 'खास' पल है, जिसमें वह खाड़ी युद्ध में शामिल बड़ी ताकतों और कई अन्य पक्षों के बीच संतुलन बना रहा है। लेकिन उसे चीन का सहयोगी माना जाता है। उधर शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश एक तरह से पाकिस्तान की ओर 'लौट' आया है।
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अस्थिर राजनीति और आर्थिक संकट के कारण पाकिस्तान को एक 'विफल देश' के तौर पर देखा जाता है, लेकिन अमेरिका और चीन ने उसे पूरी तरह विफल नहीं होने दिया है, क्योंकि दोनों पाकिस्तान में अपनी पैठ बनाने के लिए होड़ कर रहे हैं, जो रणनीतिक रूप से दक्षिण, पश्चिम और मध्य एशिया के मिलन-बिंदु पर स्थित है। दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच अपनी चालें चलते हुए, पाकिस्तान ने रूस के साथ भी अपनी स्थिति मजबूत की है।
चीन-पाकिस्तान के रिश्तों की बुराई करना या रूस-पाकिस्तान के संबंधों का मजाक उड़ाना आसान है, लेकिन आज की लेन-देन वाली दुनिया में उनके लगातार बदलते रिश्तों को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं है। पाकिस्तान के खाड़ी देशों और तुर्किये के साथ संबंध भी अहम हैं।

1962 के भारत-चीन संघर्ष के तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने चीन से संपर्क किया था। वह समझ चुका था कि दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाना चाहिए। पाकिस्तान ने मार्च 1963 में हुए एक औपचारिक समझौते के जरिये काराकोरम रेंज में लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर में फैली शक्सगाम घाटी का नियंत्रण चीन को सौंप दिया। यह इलाका भारत विवादित कश्मीर का हिस्सा मानता है। इस कदम ने चीन-पाकिस्तान के संबंधों को हमेशा के लिए मजबूत कर दिया।
अगर भारत दोनों के लिए एक साझा खतरा न होता, तो पाकिस्तान और चीन के रिश्ते बहुत अलग होते। चीन ने इस इलाके में अपने दीर्घकालीन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया। कई दशकों से भारत को लगातार परेशान करने के बाद, उसने चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) शुरू किया, जिससे उसे हिंद महासागर तक पहुंच मिल गई। इसे रूस भी हासिल करना चाहता था, लेकिन नाकाम रहा। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर मजबूत मौजूदगी की वजह से चीन, खाड़ी क्षेत्र के मौजूदा टकराव में सीधे शामिल हुए बिना भी एक अहम खिलाड़ी बन गया है। ग्वादर में चीन की मौजूदगी से भारत कराची पर वैसा नौसैनिक हमला नहीं कर पाएगा, जैसा उसने 1971 में किया था। ईरान के चाबहार पोर्ट से हटने के बाद भारत की स्थिति कमजोर हुई है।

यह बहुत कम ही देखने को मिलता है कि दो असमान पक्षों (एक मदद करने वाला और दूसरा मदद पाने वाला, एक कम्युनिस्ट देश और दूसरा धर्म पर आधारित देश) के बीच का रिश्ता न सिर्फ छह दशकों से अधिक समय तक कायम रहा हो, बल्कि उसका बहुत ज्यादा रणनीतिक महत्व भी बन गया हो। दोनों ने हमेशा अपने रिश्तों को सबसे शानदार शब्दों में बयां किया है, जैसे 'आयरन ब्रदर्स' (पक्के भाई)। भारत से मिली सैन्य हार ने इस रिश्ते को और मजबूत किया। जुल्फिकार भुट्टो के दौर में, दोनों देशों ने उस समझ को औपचारिक रूप दिया, जो अब तक अनौपचारिक थी। उन्होंने परमाणु सहयोग का एक द्विपक्षीय समझौता किया, जो अगले दशक में चीन से मिलने वाली मदद का आधार बना।

यह लेन-देन दोनों तरफ से हुआ। पाकिस्तान के सेंट्रीफ्यूज प्रोग्राम को यूरोपीय नेटवर्क से टेक्नोलॉजी मिली, जैसे अब्दुल कादिर खान ने एक डच लैब से टेक्नोलॉजी चुराई थी। चीनी वैज्ञानिकों ने भी पाकिस्तान की तरक्की से सीखा। जब पाकिस्तान ने मई, 1998 में बलूचिस्तान के चगाई में परमाणु परीक्षण किए (जो भारत के दो हफ्ते पहले किए गए परीक्षणों के जवाब में थे) तो चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस बयान को रोक दिया, जिसमें इन परीक्षणों पर अफसोस जताया गया था। पिछले साल पहलगाम हमले के बाद हुए टकराव में, पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर चीनी हार्डवेयर और इंटेलिजेंस व सर्विलांस पर भरोसा किया। चीनी कर्मियों ने अहम इंटेलिजेंस शेयरिंग और रणनीतिक मदद दी। रक्षा विश्लेषकों और सैन्य अधिकारियों ने कहा है कि लड़ाई का यह माहौल भारत के मुकाबले चीनी एविएशन टेक्नोलॉजी के लिए एक असल 'स्ट्रेस टेस्ट' साबित हुआ।

फिर भी, चीन और पाकिस्तान के रिश्ते ज्यादातर लेन-देन पर आधारित हो गए हैं। चीन सीपीईसी प्रोजेक्ट्स पर खर्च होने वाले हर युआन का हिसाब रखता है (जिनमें से कई प्रोजेक्ट्स अटके पड़े हैं) और उत्तर में खैबर पख्तूनख्वा से लेकर दक्षिण में बलूचिस्तान तक, उग्रवादियों के हमलों में उसके कई कर्मचारी भी मारे गए हैं।

दोनों एक-दूसरे के पूरक तो हैं, लेकिन आपसी लगाव नहीं है। पाकिस्तानी लोग, चाहे वे सीपीईसी से बाहर रखे गए लोग हों या बलूच युवा, चीन की मौजूदगी से नाराज हैं। यह मुख्य रूप से दो देशों की कहानी है, जो बदलते हालात में बार-बार एक-दूसरे को अपने लिए उपयोगी पाते हैं। चीन कभी भी पाकिस्तान को बर्बाद नहीं होने देगा, क्योंकि भारत के खिलाफ उसकी भू-राजनीतिक अहमियत बनी हुई है। इसमें भू-राजनीति का महत्व तो बहुत है, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब है। सीपीईसी के एक दशक बाद भी पाकिस्तान गरीब ही बना हुआ है। लेकिन मूल सोच इतनी मजबूत साबित हुई है कि सरकारों, विचारधाराओं और संकटों के दौर में भी टिका रहा है, जबकि अब इसके फेल होने का नुकसान, इससे अलग होने के फायदे से कहीं ज्यादा है।  
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