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भारत के लिए आत्ममंथन का समय: पश्चिम एशिया संकट से मिला सबक, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति पर करना होगा पुनर्विचार

K S Tomar केएस तोमर
Updated Wed, 17 Jun 2026 07:26 AM IST
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सार
पश्चिम एशियाई संकट ने नीति-निर्माताओं को संदेश दिया है कि ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना और रणनीतिक भंडार को मजबूत करना अब समय की मांग है।
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Time for Introspection for India Lessons from West Asia Crisis Revisiting Energy Security and Diplomacy
पश्चिम एशिया संकट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने से सबसे बड़ा लाभ अगर किसी प्रमुख देश को मिल सकता है, तो वह भारत है। पूरे संकट के दौरान नई दिल्ली ने सावधानीपूर्वक सभी पक्षों के साथ अपने संबंध बनाए रखे और समझौते का स्वागत किया। इस शांति समझौते को पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए बेहद जरूरी है।


हालांकि, इस टकराव ने पश्चिमी एशिया को लेकर भारत की कमजोरी को भी उजागर किया। देश के कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक और महंगे आपूर्ति स्रोतों की तलाश करनी पड़ी। भले ही युद्धविराम ने फिलहाल चिंताओं को कम कर दिया हो, पर इस संकट ने नीति-निर्माताओं को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना और रणनीतिक भंडार को मजबूत करना अब समय की मांग है। इस शांति समझौते से ईरान के साथ भारत के गहरे जुड़ाव की संभावनाएं फिर से बन सकती हैं। हालात सामान्य होने पर ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के नए अवसर खुल सकते हैं। साथ ही, चाबहार बंदरगाह परियोजना को भी नई गति मिलने की संभावना है। यह परियोजना भारत की उस रणनीतिक योजना का अहम हिस्सा है, जिसके जरिये वह मध्य एशिया और उससे आगे के बाजारों तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है।


नई दिल्ली के लिए इस संकट से मिलने वाला बड़ा सबक आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक है। टकराव के दौरान, भारत ने सीधे तौर पर इसमें शामिल हुए बिना अमेरिका, इस्राइल व ईरान और अरब जगत के साथ अपने संबंधों में प्रभावी संतुलन बनाए रखा। वाशिंगटन और तेहरान का बातचीत की मेज पर लौटना यह दिखाता है कि जब टकराव की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है, तो बड़ी ताकतों को भी अक्सर कूटनीति का रास्ता चुनना पड़ता है। भारत के लिए इससे मिलने वाले संदेश बिल्कुल स्पष्ट हैं कि वह रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखे, सभी प्रमुख शक्तियों के साथ आत्मविश्वास के साथ संवाद जारी रखे और किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय व्यावहारिक कूटनीति के जरिये अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।

भारत के दृष्टिकोण से देखें, तो पश्चिमी एशिया में शांति निस्संदेह उसके लिए फायदेमंद है। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी टकराव का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई के स्तर, व्यापार संतुलन और आर्थिक विकास पर पड़ता है। युद्धविराम से वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता कम होगी और लंबे समय तक ऊर्जा संकट का जोखिम भी घटेगा। इससे उन भारतीयों को भी फायदा मिलेगा, जो खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। तनाव के दौरान यह चिंता बनी हुई थी कि यदि संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैलता है, तो रोजगार और प्रवासी भारतीयों की कमाई प्रभावित हो सकती है। शांति से ये जोखिम काफी हद तक कम हो जाते हैं और लाखों भारतीय परिवारों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है। समुद्री व्यापार मार्गों के सामान्य होने और व्यावसायिक गतिविधियों के रफ्तार पकड़ने से भारतीय व्यापार को भी बड़ा लाभ मिलेगा। संकट के दौरान ईरान व इस्राइल के प्रति भारत के संतुलित नजरिये की भी पुष्टि हुई है। सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखकर भारत ने न केवल रणनीतिक लचीलेपन को बनाए रखा, बल्कि खुद को एक महंगे क्षेत्रीय टकराव में उलझने से भी बचाया। हालांकि, शांति समझौते की कूटनीतिक प्रक्रिया में भारत की सीमित भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। जानकारों का मानना है कि ट्रंप के ‘लेन-देन’ वाले नजरिये ने ऐसा माहौल बनाया, जिसका पाकिस्तान ने बखूबी फायदा उठाया और शांति प्रस्ताव में मध्यस्थता करके उसे एक उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलता मिली।
इतिहास गवाह है कि शांति समझौतों पर हस्ताक्षर करना अक्सर उन्हें लागू करने की तुलना में आसान होता है। इसलिए, युद्धविराम को किसी संघर्ष के अंत के रूप में नहीं, बल्कि एक कठिन राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत के लिए, एक स्थायी समाधान स्थिरता और आर्थिक अवसर लाएगा। ईरान के लिए, यह उसके लचीलेपन के दावों को सही साबित करेगा। अमेरिका और इस्राइल के लिए, यह तय करेगा कि क्या सैन्य शक्ति को अब भी स्थायी राजनीतिक सफलता में बदला जा सकता है। युद्ध भले ही खत्म हो गया हो, पर युद्ध के बाद की व्यवस्था को आकार देने की लड़ाई अभी शुरू ही हुई है।
edit@amarujala.com
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