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एक इतिहासकार, जिसका नजरिया जुदा था
सार
काबिल इतिहासकारों की तरह सुमित सरकार ने अपनी दिशा व निष्कर्ष अभिलेखागारों से हासिल किए। प्राथमिक स्रोतों से मिले तथ्यों के आधार पर वह अपनी धारणाओं को बदलने और उन्हें पूरी तरह त्यागने के लिए भी तैयार रहते थे।
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सुमित सरकार
- फोटो : एक्स/@anuarunima1
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विस्तार
कई दशकों की अपनी बौद्धिक यात्रा के बाद आधुनिक भारत के इतिहासकार सुमित सरकार ने एक लेख में लिखा था- “अब तक भारतीय इतिहासकार वही इतिहास लिखते आए हैं, जो हम लिखना चाहते थे। ऐसा करने में हम किसी बाहरी एजेंडे से प्रभावित नहीं हुए, बल्कि अपनी रुचियों और बौद्धिक प्राथमिकताओं का उपयोग किया। लेकिन लगता है कि यह स्वतंत्रता अब तेजी से खत्म होती जा रही है।”
सुमित सरकार का जन्म कोलकाता (तब कलकत्ता) में 1939 में हुआ था। हाल ही में दिल्ली में उनका देहांत हो गया। अपने जीवनकाल में सुमित को तीन दबावों का सामना करना पड़ा। पहला दबाव कट्टर मार्क्सवाद था, जो अतीत को एक संकीर्ण आर्थिक दृष्टिकोण से देखता था और उनके गृह नगर कोलकाता में इसका अच्छा खासा प्रभाव था। उनके पिता भी इतिहासकार थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। दूसरा था उत्तर-आधुनिकतावाद और उत्तर-औपनिवेशिकता का मिला-जुला रुझान। इस नजरिया में मानव समाज के व्यवहार और संबंधों को भावनाओं, अनुभूतियों और विमर्श के माध्यम से समझने की कोशिश की जाती थी। अमेरिका में बसे और वहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय, खासकर बंगाली विद्वानों के बीच इसका विशेष प्रभाव दिखाई देता था। तीसरी चुनौती थी संघ परिवार के धार्मिक बहुसंख्यकवाद की, जो हिंदुओं का महिमामंडन करता और दूसरे वर्गों को बुरा दिखाता था। सुमित सरकार उत्तर-आधुनिकतावादी विचारधारा, जिसे वह कभी-कभी ‘पोमो-पोको’ कहकर संबोधित करते थे, के आकर्षण में नहीं आए। वह अपने सबाल्टर्न स्टडीज स्कूल के सहपाठियों की तुलना में इस बात को लेकर अधिक स्पष्ट थे कि इस दृष्टिकोण में अर्थव्यवस्था, सामाजिक संघर्ष और निम्न जातियों के वंचित जीवन की समस्याओं को वह महत्व नहीं मिलता, जो उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि उन्होंने कभी किसी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता नहीं ली, फिर भी अपनी युवावस्था के मार्क्सवाद को पूरी तरह खारिज नहीं किया। वह जीवन भर इसे मुक्ति और समानता का एक दर्शन मानते रहे।
सुमित सरकार की पहली किताब ‘द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल’ 1973 में प्रकाशित हुई। इसमें राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का गहराई से अध्ययन किया गया था। उन्होंने अंग्रेजी और बंगाली, दोनों भाषाओं के प्राथमिक स्रोतों का उपयोग करते हुए बंगाल के स्वदेशी आंदोलन के उभार का अध्ययन किया। एक सीमित क्षेत्र और खास ऐतिहासिक घटना पर केंद्रित इस अध्ययन की तुलना उनकी व्यापक और विविध विषयों वाली निबंध पुस्तक ‘राइटिंग सोशल हिस्ट्री’ से की जा सकती है, जो 1997 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में समाज के प्रतिष्ठित प्रतीकों रामकृष्ण और विद्यासागर पर लिखे आलोचनात्मक लेख हैं। इनके साथ कोलकाता के सामाजिक जीवन, राजनीतिक विचारधाराओं के निर्माण में जाति की भूमिका तथा इतिहास लेखन की उन परंपराओं पर भी निबंध हैं, जिन्हें सुमित सरकार या तो बेहद महत्वपूर्ण मानते थे या फिर जिनकी वे तीखी आलोचना करते थे।
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सरकार की सबसे अहम पुस्तक ‘मॉडर्न इंडिया : 1885-1947’ थी। यह औपनिवेशिक शासन के अंतिम दशकों और जनराष्ट्रवाद के उभार को प्रभावशाली तरीके से दर्ज करती है। पुस्तक की भूमिका में लेखक ने अपने दो प्रमुख लक्ष्यों का जिक्र किया है। पहला, हाल के वर्षों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास की विशिष्ट समस्याओं पर लिखे गए शोध ग्रंथों में सामने आए तथ्यों एवं आंकड़ों का एक निचोड़ तैयार करना तथा दूसरा, राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के समानांतर निचले स्तर के इतिहास की संभावनाओं को सामने लाना था। सुमित सरकार ने इन दोनों उद्देश्यों को अच्छी तरह पूरा किया। ‘मॉडर्न इंडिया’ में जाति के प्रश्न पर फोकस करना यह दिखाता है कि समय के साथ सुमित सरकार का मार्क्सवाद पुरानी धारणाओं से अलग हो गया था। उनके पहले से चले आ रहे वैचारिक विश्वासों से भी अधिक अलग बात महात्मा गांधी के बारे में उनके नजरिये में दिखाई देती है। आरपी दत्त और एमएन रॉय जैसे मार्क्सवादी विचारकों ने गांधी की अहिंसा को एक ऐसी चतुर रणनीति माना था, जिसका उद्देश्य जनता को क्रांतिकारी कार्रवाई से दूर रखना था, लेकिन सुमित सरकार ने गांधी की राजनीति में मौजूद गहरी नैतिकता को समझा। उन्होंने स्वीकार किया कि गांधी के लिए अहिंसा और सत्याग्रह केवल राजनीतिक हथियार नहीं थे, बल्कि ‘गहराई से महसूस की गई और विचारपूर्वक विकसित की गई एक ऐसी दर्शन व्यवस्था थे, जिसमें पर्याप्त मौलिकता थी।’ पुस्तक के अंतिम हिस्से में उन्होंने एक पूरा खंड ‘द महात्माज फाइनेस्ट ऑवर’ शीर्षक से लिखा। सरकार लिखते हैं, “गांधी के जीवन के अंतिम महीनों में उनके अद्वितीय व्यक्तिगत गुण और उनकी वास्तविक महानता जितनी स्पष्ट दिखाई दी, उतनी शायद कभी नहीं दिखाई दी थी।”
काबिल इतिहासकारों की तरह सुमित सरकार ने भी अपनी दिशा और निष्कर्ष अभिलेखागार से प्राप्त किए। प्राथमिक स्रोतों से मिले तथ्यों के आधार पर वह अपनी पहले से बनी धारणाओं को बदलने आैर उन्हें पूरी तरह त्यागने के लिए भी तैयार रहते थे। वह भारत में जन आंदोलनों और लोकप्रिय विरोध से संबंधित अध्ययनों की तुलना यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा इसी व्यापक विषय पर किए गए अध्ययनों से करते थे, साथ ही भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच मौजूद ऐतिहासिक विविधताओं और क्षेत्रीय भिन्नताओं का भी अध्ययन करते थे।
सुमित सरकार एक प्रेरणादायी शिक्षक थे। वह स्वयं भी स्वीकार करते थे कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों से बहुत कुछ सीखा और शायद अपनी जीवन संगिनी प्रसिद्ध नारीवादी इतिहासकार तनिका सरकार से उससे भी अधिक सीखा।
सुमित सरकार जिस इतिहासकार को सबसे अधिक सम्मान और प्रशंसा की नजर से देखते थे, वह थे ईपी थॉम्पसन। थॉम्पसन भी उनकी तरह बेहद गैर-रूढ़िवादी मार्क्सवादी थे। सुमित सरकार ने एक बार लिखा था कि थॉम्पसन की पुस्तकों और उनके साथ हुई राजनीतिक एवं ऐतिहासिक विषयों पर अनेक चर्चाओं ने उन्हें जितना प्रेरित किया, उतना उनके जीवन में पहले या उसके बाद किसी और ने नहीं किया।
मुझे याद है कि सितंबर 1993 में ईपी थॉम्पसन के निधन के बाद दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनकी याद में एक सभा आयोजित की गई थी। सभा में सुमित सरकार ने थॉम्पसन के बारे में बेहद भावपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी। इतिहासकार पार्थसारथी गुप्ता और नीलाद्रि भट्टाचार्य तथा साहित्य के विद्वान हरीश त्रिवेदी ने भी वक्तव्य दिए। सुमित सरकार उन अनेक प्रवासी बंगाली बुद्धिजीवियों में से एक थे, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय को 1960 से 2000 के दशक तक भारत में सामाजिक विज्ञान और मानविकी के अध्ययन तथा अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अलावा इस समूह में अर्थशास्त्री सुखमॉय चक्रवर्ती और मृणाल दत्ता चौधरी, कानून विदुषी लतिका सरकार, इतिहासकार आरके दासगुप्ता और समाजशास्त्री आंद्रे बेते जैसे विद्वान शामिल थे।
दिल्ली विश्वविद्यालय में आज भी कुछ विद्वान शिक्षक हैं, लेकिन बढ़ती नौकरशाही ने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। सुमित सरकार का निधन उस युग के अंत का प्रतीक है, जिसमें पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए बुद्धिजीवियों ने दिल्ली विश्वविद्यालय को दक्षिण एशिया का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
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सुमित सरकार का जन्म कोलकाता (तब कलकत्ता) में 1939 में हुआ था। हाल ही में दिल्ली में उनका देहांत हो गया। अपने जीवनकाल में सुमित को तीन दबावों का सामना करना पड़ा। पहला दबाव कट्टर मार्क्सवाद था, जो अतीत को एक संकीर्ण आर्थिक दृष्टिकोण से देखता था और उनके गृह नगर कोलकाता में इसका अच्छा खासा प्रभाव था। उनके पिता भी इतिहासकार थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। दूसरा था उत्तर-आधुनिकतावाद और उत्तर-औपनिवेशिकता का मिला-जुला रुझान। इस नजरिया में मानव समाज के व्यवहार और संबंधों को भावनाओं, अनुभूतियों और विमर्श के माध्यम से समझने की कोशिश की जाती थी। अमेरिका में बसे और वहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय, खासकर बंगाली विद्वानों के बीच इसका विशेष प्रभाव दिखाई देता था। तीसरी चुनौती थी संघ परिवार के धार्मिक बहुसंख्यकवाद की, जो हिंदुओं का महिमामंडन करता और दूसरे वर्गों को बुरा दिखाता था। सुमित सरकार उत्तर-आधुनिकतावादी विचारधारा, जिसे वह कभी-कभी ‘पोमो-पोको’ कहकर संबोधित करते थे, के आकर्षण में नहीं आए। वह अपने सबाल्टर्न स्टडीज स्कूल के सहपाठियों की तुलना में इस बात को लेकर अधिक स्पष्ट थे कि इस दृष्टिकोण में अर्थव्यवस्था, सामाजिक संघर्ष और निम्न जातियों के वंचित जीवन की समस्याओं को वह महत्व नहीं मिलता, जो उन्हें मिलना चाहिए। हालांकि उन्होंने कभी किसी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता नहीं ली, फिर भी अपनी युवावस्था के मार्क्सवाद को पूरी तरह खारिज नहीं किया। वह जीवन भर इसे मुक्ति और समानता का एक दर्शन मानते रहे।
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सुमित सरकार की पहली किताब ‘द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल’ 1973 में प्रकाशित हुई। इसमें राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का गहराई से अध्ययन किया गया था। उन्होंने अंग्रेजी और बंगाली, दोनों भाषाओं के प्राथमिक स्रोतों का उपयोग करते हुए बंगाल के स्वदेशी आंदोलन के उभार का अध्ययन किया। एक सीमित क्षेत्र और खास ऐतिहासिक घटना पर केंद्रित इस अध्ययन की तुलना उनकी व्यापक और विविध विषयों वाली निबंध पुस्तक ‘राइटिंग सोशल हिस्ट्री’ से की जा सकती है, जो 1997 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में समाज के प्रतिष्ठित प्रतीकों रामकृष्ण और विद्यासागर पर लिखे आलोचनात्मक लेख हैं। इनके साथ कोलकाता के सामाजिक जीवन, राजनीतिक विचारधाराओं के निर्माण में जाति की भूमिका तथा इतिहास लेखन की उन परंपराओं पर भी निबंध हैं, जिन्हें सुमित सरकार या तो बेहद महत्वपूर्ण मानते थे या फिर जिनकी वे तीखी आलोचना करते थे।
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सरकार की सबसे अहम पुस्तक ‘मॉडर्न इंडिया : 1885-1947’ थी। यह औपनिवेशिक शासन के अंतिम दशकों और जनराष्ट्रवाद के उभार को प्रभावशाली तरीके से दर्ज करती है। पुस्तक की भूमिका में लेखक ने अपने दो प्रमुख लक्ष्यों का जिक्र किया है। पहला, हाल के वर्षों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास की विशिष्ट समस्याओं पर लिखे गए शोध ग्रंथों में सामने आए तथ्यों एवं आंकड़ों का एक निचोड़ तैयार करना तथा दूसरा, राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के समानांतर निचले स्तर के इतिहास की संभावनाओं को सामने लाना था। सुमित सरकार ने इन दोनों उद्देश्यों को अच्छी तरह पूरा किया। ‘मॉडर्न इंडिया’ में जाति के प्रश्न पर फोकस करना यह दिखाता है कि समय के साथ सुमित सरकार का मार्क्सवाद पुरानी धारणाओं से अलग हो गया था। उनके पहले से चले आ रहे वैचारिक विश्वासों से भी अधिक अलग बात महात्मा गांधी के बारे में उनके नजरिये में दिखाई देती है। आरपी दत्त और एमएन रॉय जैसे मार्क्सवादी विचारकों ने गांधी की अहिंसा को एक ऐसी चतुर रणनीति माना था, जिसका उद्देश्य जनता को क्रांतिकारी कार्रवाई से दूर रखना था, लेकिन सुमित सरकार ने गांधी की राजनीति में मौजूद गहरी नैतिकता को समझा। उन्होंने स्वीकार किया कि गांधी के लिए अहिंसा और सत्याग्रह केवल राजनीतिक हथियार नहीं थे, बल्कि ‘गहराई से महसूस की गई और विचारपूर्वक विकसित की गई एक ऐसी दर्शन व्यवस्था थे, जिसमें पर्याप्त मौलिकता थी।’ पुस्तक के अंतिम हिस्से में उन्होंने एक पूरा खंड ‘द महात्माज फाइनेस्ट ऑवर’ शीर्षक से लिखा। सरकार लिखते हैं, “गांधी के जीवन के अंतिम महीनों में उनके अद्वितीय व्यक्तिगत गुण और उनकी वास्तविक महानता जितनी स्पष्ट दिखाई दी, उतनी शायद कभी नहीं दिखाई दी थी।”
काबिल इतिहासकारों की तरह सुमित सरकार ने भी अपनी दिशा और निष्कर्ष अभिलेखागार से प्राप्त किए। प्राथमिक स्रोतों से मिले तथ्यों के आधार पर वह अपनी पहले से बनी धारणाओं को बदलने आैर उन्हें पूरी तरह त्यागने के लिए भी तैयार रहते थे। वह भारत में जन आंदोलनों और लोकप्रिय विरोध से संबंधित अध्ययनों की तुलना यूरोपीय इतिहासकारों द्वारा इसी व्यापक विषय पर किए गए अध्ययनों से करते थे, साथ ही भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच मौजूद ऐतिहासिक विविधताओं और क्षेत्रीय भिन्नताओं का भी अध्ययन करते थे।
सुमित सरकार एक प्रेरणादायी शिक्षक थे। वह स्वयं भी स्वीकार करते थे कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों से बहुत कुछ सीखा और शायद अपनी जीवन संगिनी प्रसिद्ध नारीवादी इतिहासकार तनिका सरकार से उससे भी अधिक सीखा।
सुमित सरकार जिस इतिहासकार को सबसे अधिक सम्मान और प्रशंसा की नजर से देखते थे, वह थे ईपी थॉम्पसन। थॉम्पसन भी उनकी तरह बेहद गैर-रूढ़िवादी मार्क्सवादी थे। सुमित सरकार ने एक बार लिखा था कि थॉम्पसन की पुस्तकों और उनके साथ हुई राजनीतिक एवं ऐतिहासिक विषयों पर अनेक चर्चाओं ने उन्हें जितना प्रेरित किया, उतना उनके जीवन में पहले या उसके बाद किसी और ने नहीं किया।
मुझे याद है कि सितंबर 1993 में ईपी थॉम्पसन के निधन के बाद दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उनकी याद में एक सभा आयोजित की गई थी। सभा में सुमित सरकार ने थॉम्पसन के बारे में बेहद भावपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी। इतिहासकार पार्थसारथी गुप्ता और नीलाद्रि भट्टाचार्य तथा साहित्य के विद्वान हरीश त्रिवेदी ने भी वक्तव्य दिए। सुमित सरकार उन अनेक प्रवासी बंगाली बुद्धिजीवियों में से एक थे, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय को 1960 से 2000 के दशक तक भारत में सामाजिक विज्ञान और मानविकी के अध्ययन तथा अनुसंधान का एक प्रमुख केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अलावा इस समूह में अर्थशास्त्री सुखमॉय चक्रवर्ती और मृणाल दत्ता चौधरी, कानून विदुषी लतिका सरकार, इतिहासकार आरके दासगुप्ता और समाजशास्त्री आंद्रे बेते जैसे विद्वान शामिल थे।
दिल्ली विश्वविद्यालय में आज भी कुछ विद्वान शिक्षक हैं, लेकिन बढ़ती नौकरशाही ने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है। सुमित सरकार का निधन उस युग के अंत का प्रतीक है, जिसमें पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए बुद्धिजीवियों ने दिल्ली विश्वविद्यालय को दक्षिण एशिया का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।