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Navjot Singh Sidhu: किसकी सलाह पर फौजी की जगह बने क्रिकेटर? सिद्धू ने सुनाया करियर से जुड़ा अनसुना किस्सा
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शोभित चतुर्वेदी
Updated Mon, 18 May 2026 01:59 PM IST
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सार
Navjot Singh Sidhu at Amar Ujala Samwad: अमर उजाला समूह उत्तर प्रदेश की राजधानी में संवाद उत्तर प्रदेश 2026 का आयोजन कर रहा है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। वहीं, मैदान पर सटीक बल्लेबाजी के लिए मशहूर और खेल की गहरी समझ रखने वाले पूर्व क्रिकेटर व राजनेता नवजोत सिंह सिद्धू ने भी अमर उजाला संवाद में अपनी बेबाक राय रखी।
अमर उजाला संवाद में सिद्धू
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
अमर उजाला संवाद के मंच पर पूर्व भारतीय क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू भी पहुंचे । सिद्धू बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं। सिद्धू ने इस दौरान कपिल देव से लेकर सचिन तेंदुलकर तक के बारे में बात की। उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह लखनऊ के शीश महल टूर्नामेंट ने उनकी वापसी कराने में मदद की। आइए जानते हैं कि सिद्धू ने अपने संबोधन में क्रिकेट से लेकर सफल जीवन के मूल्यों पर क्या-क्या कहा।
सिद्धू क्यों बोले सारी पार्टियां एक ही गलती करती हैं?
सिद्धू ने अमर उजाला संवाद के मंच को संबोधित करते हुए कहा, जरूरी नहीं है कि जो आपको बढ़िया लगे, वही आपकी राह हो। बढ़िया तो मुझे पालिटिक्स लगी। लेकिन सारी पार्टियां एक ही भूल करती रहीं, धूल उनके चेहरे पर थी और साफ तमाम आईने करती रहीं। राजनीति इसलिए अच्छी लगी कि वह लोगों को ताकत देती है। लेकिन क्या सच्चे अच्छे लोगों को ताकत दी जाती है, ये अलग बात है इस पर मैं नहीं जाऊंगा। लेकिन एक बात पक्की है। मेरे लिए वह मिशन था। अब मैं राजनीति से दूर जा चुका हूं। आज मैं आपसे सफलता के बारे में बात करने के लिए आया हूं। इंसान गलतियों का पुतला होता है। उससे गलतियां होती रहती हैं। मैंने जीवन में कभी गोल पर कभी निगाह नहीं रखी। मेरा फोकस साधाना मे है।
उन्होंने कहा, मैं पॉलिटिक्स से टूट चुका हूं। मैं यहां सफलता के रहस्यों के बारे में बात करने आया हूं। वो अनुभव जो आपको चेतन कर देंगे, वो अनुभव जो आपको जागृत कर देंगे। हर आदमी में कोई न कोई त्रुटि है। लोग गोल्स की बात करते हैं, लेकिन मैं गोल्स पर कभी निगाह नहीं रखता है। गोल्स लुभावने होते हैं। असली ताकत मीन्स में है, साधन में है। साध्य की प्राप्ति परिणाम मात्र है। उसका असली कारण साधन है। जिंदगी में बेहतर होने के साधन बताने आया हूं।
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सिद्धू बोले- मेरे कमबैक की बुनियाद लखनऊ ने रखी
सिद्धू ने कहा, प्रणाम करता हूं मैं इस भूमि को क्योंकि ये मेरे अस्तित्व में है। मेरी जो कमबैक हुई 1987 में उसकी बुनियाद लखनऊ के शीश महल टूर्नामेंट ने रखी थी। वो टूर्नामेंट में सात शतक बने तो जाके टीम में जगह बनी। टेस्ट में कमबैक जब मुरली को सात छक्के लगे थे, वॉली हेमंड का आठ छक्कों का रिकॉर्ड, वो भी इसी जगह केडी सिंह बाबू स्टेडियम में हुआ था। इसलिए मैं उस भूमि को प्रणाम करता हूं, क्योंकि लखनऊ की भूमि में नजाकत है। महामाई पार्वती का प्रताप है। झुक कर मैं आपको प्रणाम करता हूं। झुकते वो हैं, जिनमें जान होती हैं, अकड़ना मुर्दों की पहचान होती है।
सिद्धू ने आगे कहा, अगर सृष्टि को बदलना है तो दृष्टि को बदलना होगा। वो सबसे पहले शुरू होता है फीयर ऑफ फेलियर से। कुछ भी करने जाते हो तो डरते हो ये हो नहीं पाएगा। वो संशय दुनिया में सफलता का सबसे बड़ा अवरोध है। सबसे बड़ी खामी है और वो मानसिक है। जीवन में सबसे बड़ी गलती भय से शुरू होती है। संशय सफलता का सबसे बड़ा अवरोध है। जीवन की सबसे बड़ी कमी वही है।
उन्होंने कहा, भयग्रस्त होना सबसे बड़ी कमजोरी है। जब किसी चीज से भय लगे तो वो चीज सबसे पहले करो। भय पर विजय पाओ। लीडर वो है, जो पीछे चलने वालों में विश्वास जगा दे। लीडर वो है जो कहता है-कतार मुझसे शुरू होती है, मैं करके दिखाऊंगा। जब मुसीबत आए तो खुद पर लो, और जब वाहवाही हो तो पूरी टीम में बांटो। एक बात और कि हम दुनिया की बहुत परवाह करते हैं कि दुनिया हमें क्या कहेगी। किसी का मेरे बारे में क्या राय है। उसने मेरे बारे में गलत कह दिया। वो फलाना बंदा मुझे क्रिटिसाइज कर दिया। दुनिया में सबसे बड़ा रोग- मेरे बारे में क्या कहेंगे लोग। जिंदगी में जब आलोचना आए, तो कहना तुमसे बेहतर कोई नहीं है।
जब कपिल ने विदेशी पत्रकार को दिया करारा जवाब
इस पूर्व भारतीय खिलाड़ी ने कहा, 1983 में चार सौ लोग कपिल का इंटरव्यू लेने आए। सब विदेशी पत्रकार थे। कपिल को अंग्रेजी आती नहीं थी। मैने उनसे कहा कि जैकी श्राफ की नई फिल्म लगी है हीरो। वह देखकर आते हैं। कपिल ने कहा चलो बात करते हैं। कपिल देव से पत्रकारों ने पूछा कि हम दूसरा कपिल क्यों नहीं पैदा कर पा रहे हैं? कपिल ने कहा कि मेरी मां 62 साल की हैं, पिता नहीं है। इसलिए दूसरा कपिल नहीं पैदा कर पाए। तो गुरु इंट्रोडक्शन की इसलिए जरूरत नहीं, क्योंकि प्रेम परिचय को पहचान बना देता है, वीराने को गुलिस्तान बना देता है, मैं आपबीती कहता हूं, गैरों की नहीं, प्रेम इंसान को भगवान बना देता है।
सचिन को लेकर सुनाया किस्सा
सिद्धू ने कहा, जब आप पल में जीना सीखोगे, जो आपके भीतर ताकत है, उसके भरोसे रहोगे, तो भय आएगा ही नहीं। सचिन तेंदुलकर...15 साल का बच्चा, मैंने कहा कैसे ये पाकिस्तान जा रहा है, कैसे भेड़ियों के सामने डाल दिया है इसे, ये तो इसको निगल लेंगे। लेकिन जब वहां पहुंचा तो पता चला कि सचिन चीज क्या है। दो कहानियां सुनाऊंगा। 15 साल की उम्र में सचिन अपने पहले मैच में जीरो, दूसरे मैच में सात और आठ, तीसरे मैच में ड्रॉप और चौथे मैच में हिंदुस्तान की टीम और इमरान खान इतना आगबबूला हो गया था कि भारतीय यहां आकर तीन टेस्ट ड्रॉ कर गए।
उन्होंने कहा, वकार यूनुस वसीम अकरम, आकिब जावेद, सपनों में आने वाले बॉलर थे। चौथे टेस्ट में पिच पर काफी घास थी। उस मैच में तेंदुलकर की वापसी होती है आखिरी दिन। मैं बैटिंग कर रहा हूं 24 पर चार के स्कोर पर। वसीम अकरम ने बाउंसर मारी, मैंने डक किया। फिर रवि शास्त्री ने सामने से कहा कि क्या कमाल छोड़ी है, मैंने कहा मुझे तो दिखी ही नहीं। इसके बाद रवि को एक बाउंसर पड़ी और वो आउट हो गए। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अनलकी हूं। मैंने कहा कि आप लकी हो कि बाहर जा रहे हो, मैं कहां ये सब झेल रहा हूं। फिर देखता हूं छोटा सा बच्चा 15 साल का सचिन पूरे आत्मविश्वास के साथ बल्लेबाजी करने आता है। मैंने सोचा इसके बाद तो कुंबले ही हैं, अगर अब विकेट गया तो धर धर सब आउट हो जाएंगे। खेला खत्म है। मैंने सोचा कि घंटे भर में खेला खत्म है।
सिद्धू ने कहा, सचिन बोला- खेलेंगे। मैंने बोला- हां हां खेलो खेलो। एक बॉल जाकर सचिन के चेहरे पर लगी। उसके नाक से खून बहने लगा। मैंने सोचा इस बच्चे के नाक से खून बह रहा है। पूरी जर्सी खून से लथपथ। खुद सचिन जमीन पर पड़ा हुआ है। मुझे लगा कि ये गया। मैं वापस अपनी क्रीज में लौटने लगा। तभी पीछे से आवाज आई-शेरी। मैंने देखा सचिन मेरी तरफ चला आ रहा है। नाक से रूई लटक रही है। जर्सी पर खून, 15 साल का बच्चा बोला- मैं खेलेगा, देश की इज्जत का सवाल है। आज भी यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आज थोड़ी सी भी मुसीबत आती है, लोग घबरा जाते हैं। दुनिया बेचारों को प्यार करती है, लेकिन मेरी सलाह मानो कभी बेचारा मत बनो। आपको खड़े होना पड़ेगा।
सिद्धू ने अमर उजाला के मंच पर शायरी भी सुनाई। उन्होंने कहा, 'वो दरिया ही नहीं, जिसमें नहीं रवानी, जब जोश ही नहीं किस काम की तेरी जवानी।' उन्होंने आगे कहा, जरूरी नहीं है कि जो आपको बढ़िया लगे, वही आपकी राह हो।
सिद्धू ने आगे कहा, 'तो गुरु मैं एक पब्लिक स्कूल बैकग्राउंड से था। फर्राटे की इंग्लिश बोलता था। लेकिन दम नहीं था कि कोई प्रिंसिपल मुझसे ये कहता कि सिद्धू स्कूल को डिसपर्स करना है। क्लास मॉनिटर था, लेकिन टांगे कांपती थीं। सबकुछ आपके सोचने की शक्ति पर है। आप जैसा सोचेंगे वैसा बन जाएंगे। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। जो चीजें जीवन में होनी नहीं है, आप उनके बारे में सोच के भयग्रस्त हो जाते हो।' सिद्धू ने इस दौरान दिवंगत गायिका आशा भोसले को भी याद किया। उन्होंने कहा, आशा भोसले जी चली गईं, लेकिन एक जबरदस्त गाना अभी भी जहन में है- आगे भी जानें न तू, पीछे भी जानें न तू, जो भी है इस पल को थाम, पल को थाम शहंशाह हो जाएगा।
संगठन की शक्ति पर दिया जोर
सिद्धू ने अमर उजाला के मंच से संगठन की शक्ति पर बात की। उन्होंने कहा, संगठित हुई शक्ति जीत का कारण बनती है, विभाजित शक्ति पतन का कारण बनती है। जब आपके ऊपर परमात्मा विपत्ति भेजता है तो दोनों हाथ खुले रखो। दोनों हाथ खोलो और कहो कि परमात्मा मुझे डूबोने नहीं लगाया, मुझे स्वच्छ करने लाया है। यही वह अवसर है क्योंकि मैंने नानकदेव की गुलेल में हूं, महादेव की गुलेल में हूं। अगर तीन इंच पीछे जाऊंगा, तो 300 फुट आगे जाऊंगा। याद रखना अच्छे वक्त में कोई कुछ नहीं सीखता। अच्छे वक्त में तो आपको ये भी पता नहीं लगेगा कि आपका दोस्त कौन है। विपत्ति में ही पता लगेगा, सत्य का मार्ग छोड़ो मत। मित्र वही जो समय पर काम आए। संशय हो तो सत्य के मार्ग पर चलो। कभी भी नैतिकता से समझता मत करो, कोई तुम्हें गिरा नहीं पाएगा।
शाहरुख से मुलाकात की कहानी
जिंदगी में कभी किसी से कॉम्पिटीशन मत रखो। खुद को उत्तम बनाने का देखो। शाहरुख से 1987 में मिला था मैं। उन दिनों में वो सर्कस और फौजी में काम कर रहे थे। मेरी सास क्रिकेट देखने नहीं देती थी, क्योंकि उन्हें फौजी देखना होता था। तो शाहरुख आए, मॉर्डर्न स्कूल ग्राउंड में, वहां मेरे साथ कपिल देव भी खड़े थे। शाहरुख मुझसे कहता है कि मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं। आप जबरदस्त छक्के मारते हो। मैंने उससे कहा मैं आपका फैन हूं। मैंने उससे पूछे कि इसके बाद क्या करेगा, उसने कहा- बॉलीवुड। मैंने उससे कहा- बॉलीवुड में कोई तेरा है नहीं, वहां लोग तुझे खा जाएंगे। वो मेरी तरफ देखता है और कहता है- मैं आपको एक बात कहूं, आप बुरा तो नहीं मानोगे। सिद्धू साहब मेरा किसी से कॉम्पिटीशन नहीं है। मेरा कॉम्पिटीशन खुद से है। ये लाइन ने मेरी जिंदगी बदल दी। जिंदगी में हमेशा सुधार की गुंजाइश होती है और अगर आप ये स्वीकार करते हो, तो आप सही रास्ते पर हो।
कैसे फौजी की जगह बन गए क्रिकेटर?
सिद्धू ने कहा, 1987 टेस्ट मैच में मेरा आगमन हुआ और जितनी जल्दी आगमन हुआ, उतनी जल्दी बाहर। एक दिन बाथरुम से बाहर निकला तौलिया पहना हुआ। बाबा की आंख में आंसू थे। मैं फौज में जाना चाहता था, लेकिन उनकी वजह से मैं जा नहीं पाया। उन्होंने रोक लिया। उन्होंने कहा कि बेटा तेरे बिना नहीं जी पाऊंगा। उनकी तमन्ना थी कि भारत के लिए क्रिकेट खेल। कम से कम 20 साल, तो उनके सपने के लिए ही जिता था। जब उनकी आंखों में पहली बार जिंदगी में आंसू देखे तो स्तब्ध रह गया। मैंने कहा हुआ क्या है? उन्होंने एक अखबार तकिया के नीचे छुपाया। मैं दूसरे कमरे में चला गया, वापस आया तो वो चंडीगढ़ चले गए थे। मैंने वहां से वो अखबार खींच कर निकाला। उस अखबार में एक आर्टिकल था- 'नवजोत सिंह सिद्ध द स्ट्रोकलेस वंडर।' मतलब सिद्धू नेट के बाहर गेंद ही नहीं फेंक सकता, ये कहां शॉट मारेगा। उस फ्रंट पेज के आर्टिकल ने मुझे दफ्न कर दिया। प्रेस वालों से मैं तभी डरता हूं, तीन हजार तलवारों से नहीं डरता, लेकिन तीन प्रेस वालों से डरता हूं।
सिद्धू का क्रिकेट करियर
नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब की राजनीति और भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं। 20 अक्तूबर 1963 को पटियाला में जन्मे सिद्धू की पहचान एक आक्रामक बल्लेबाज की रही। उन्होंने 1983 से 1999 तक भारत के लिए 51 टेस्ट और 136 वनडे मैच खेले। सिद्धू ने भारत के लिए 51 टेस्ट मैचों में 3202 रन बनाए और इस प्रारूप में उनका सर्वोच्च स्कोर 201 रन रहा। टेस्ट में सिद्धू ने नौ शतक और 15 अर्धशतक लगाए हैं। वहीं, 136 वनडे मैचों में सिद्धू ने 4413 रन बनाए जिसमें नाबाद 134 उनका सर्वोच्च स्कोर है। इस प्रारूप में उनके बल्ले से छह शतक और 33 अर्धशतक निकले हैं। प्रथम श्रेणी क्रिकेट की बात करें तो 157 मैचों में उनके नाम 9571 रन हैं। वहीं, लिस्ट ए क्रिकेट में 205 मैचों में सिद्धू ने 7186 रन बनाए हैं।
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सिद्धू क्यों बोले सारी पार्टियां एक ही गलती करती हैं?
सिद्धू ने अमर उजाला संवाद के मंच को संबोधित करते हुए कहा, जरूरी नहीं है कि जो आपको बढ़िया लगे, वही आपकी राह हो। बढ़िया तो मुझे पालिटिक्स लगी। लेकिन सारी पार्टियां एक ही भूल करती रहीं, धूल उनके चेहरे पर थी और साफ तमाम आईने करती रहीं। राजनीति इसलिए अच्छी लगी कि वह लोगों को ताकत देती है। लेकिन क्या सच्चे अच्छे लोगों को ताकत दी जाती है, ये अलग बात है इस पर मैं नहीं जाऊंगा। लेकिन एक बात पक्की है। मेरे लिए वह मिशन था। अब मैं राजनीति से दूर जा चुका हूं। आज मैं आपसे सफलता के बारे में बात करने के लिए आया हूं। इंसान गलतियों का पुतला होता है। उससे गलतियां होती रहती हैं। मैंने जीवन में कभी गोल पर कभी निगाह नहीं रखी। मेरा फोकस साधाना मे है।
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उन्होंने कहा, मैं पॉलिटिक्स से टूट चुका हूं। मैं यहां सफलता के रहस्यों के बारे में बात करने आया हूं। वो अनुभव जो आपको चेतन कर देंगे, वो अनुभव जो आपको जागृत कर देंगे। हर आदमी में कोई न कोई त्रुटि है। लोग गोल्स की बात करते हैं, लेकिन मैं गोल्स पर कभी निगाह नहीं रखता है। गोल्स लुभावने होते हैं। असली ताकत मीन्स में है, साधन में है। साध्य की प्राप्ति परिणाम मात्र है। उसका असली कारण साधन है। जिंदगी में बेहतर होने के साधन बताने आया हूं।
सिद्धू बोले- मेरे कमबैक की बुनियाद लखनऊ ने रखी
सिद्धू ने कहा, प्रणाम करता हूं मैं इस भूमि को क्योंकि ये मेरे अस्तित्व में है। मेरी जो कमबैक हुई 1987 में उसकी बुनियाद लखनऊ के शीश महल टूर्नामेंट ने रखी थी। वो टूर्नामेंट में सात शतक बने तो जाके टीम में जगह बनी। टेस्ट में कमबैक जब मुरली को सात छक्के लगे थे, वॉली हेमंड का आठ छक्कों का रिकॉर्ड, वो भी इसी जगह केडी सिंह बाबू स्टेडियम में हुआ था। इसलिए मैं उस भूमि को प्रणाम करता हूं, क्योंकि लखनऊ की भूमि में नजाकत है। महामाई पार्वती का प्रताप है। झुक कर मैं आपको प्रणाम करता हूं। झुकते वो हैं, जिनमें जान होती हैं, अकड़ना मुर्दों की पहचान होती है।
सिद्धू ने आगे कहा, अगर सृष्टि को बदलना है तो दृष्टि को बदलना होगा। वो सबसे पहले शुरू होता है फीयर ऑफ फेलियर से। कुछ भी करने जाते हो तो डरते हो ये हो नहीं पाएगा। वो संशय दुनिया में सफलता का सबसे बड़ा अवरोध है। सबसे बड़ी खामी है और वो मानसिक है। जीवन में सबसे बड़ी गलती भय से शुरू होती है। संशय सफलता का सबसे बड़ा अवरोध है। जीवन की सबसे बड़ी कमी वही है।
उन्होंने कहा, भयग्रस्त होना सबसे बड़ी कमजोरी है। जब किसी चीज से भय लगे तो वो चीज सबसे पहले करो। भय पर विजय पाओ। लीडर वो है, जो पीछे चलने वालों में विश्वास जगा दे। लीडर वो है जो कहता है-कतार मुझसे शुरू होती है, मैं करके दिखाऊंगा। जब मुसीबत आए तो खुद पर लो, और जब वाहवाही हो तो पूरी टीम में बांटो। एक बात और कि हम दुनिया की बहुत परवाह करते हैं कि दुनिया हमें क्या कहेगी। किसी का मेरे बारे में क्या राय है। उसने मेरे बारे में गलत कह दिया। वो फलाना बंदा मुझे क्रिटिसाइज कर दिया। दुनिया में सबसे बड़ा रोग- मेरे बारे में क्या कहेंगे लोग। जिंदगी में जब आलोचना आए, तो कहना तुमसे बेहतर कोई नहीं है।
जब कपिल ने विदेशी पत्रकार को दिया करारा जवाब
इस पूर्व भारतीय खिलाड़ी ने कहा, 1983 में चार सौ लोग कपिल का इंटरव्यू लेने आए। सब विदेशी पत्रकार थे। कपिल को अंग्रेजी आती नहीं थी। मैने उनसे कहा कि जैकी श्राफ की नई फिल्म लगी है हीरो। वह देखकर आते हैं। कपिल ने कहा चलो बात करते हैं। कपिल देव से पत्रकारों ने पूछा कि हम दूसरा कपिल क्यों नहीं पैदा कर पा रहे हैं? कपिल ने कहा कि मेरी मां 62 साल की हैं, पिता नहीं है। इसलिए दूसरा कपिल नहीं पैदा कर पाए। तो गुरु इंट्रोडक्शन की इसलिए जरूरत नहीं, क्योंकि प्रेम परिचय को पहचान बना देता है, वीराने को गुलिस्तान बना देता है, मैं आपबीती कहता हूं, गैरों की नहीं, प्रेम इंसान को भगवान बना देता है।
सचिन को लेकर सुनाया किस्सा
सिद्धू ने कहा, जब आप पल में जीना सीखोगे, जो आपके भीतर ताकत है, उसके भरोसे रहोगे, तो भय आएगा ही नहीं। सचिन तेंदुलकर...15 साल का बच्चा, मैंने कहा कैसे ये पाकिस्तान जा रहा है, कैसे भेड़ियों के सामने डाल दिया है इसे, ये तो इसको निगल लेंगे। लेकिन जब वहां पहुंचा तो पता चला कि सचिन चीज क्या है। दो कहानियां सुनाऊंगा। 15 साल की उम्र में सचिन अपने पहले मैच में जीरो, दूसरे मैच में सात और आठ, तीसरे मैच में ड्रॉप और चौथे मैच में हिंदुस्तान की टीम और इमरान खान इतना आगबबूला हो गया था कि भारतीय यहां आकर तीन टेस्ट ड्रॉ कर गए।
उन्होंने कहा, वकार यूनुस वसीम अकरम, आकिब जावेद, सपनों में आने वाले बॉलर थे। चौथे टेस्ट में पिच पर काफी घास थी। उस मैच में तेंदुलकर की वापसी होती है आखिरी दिन। मैं बैटिंग कर रहा हूं 24 पर चार के स्कोर पर। वसीम अकरम ने बाउंसर मारी, मैंने डक किया। फिर रवि शास्त्री ने सामने से कहा कि क्या कमाल छोड़ी है, मैंने कहा मुझे तो दिखी ही नहीं। इसके बाद रवि को एक बाउंसर पड़ी और वो आउट हो गए। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अनलकी हूं। मैंने कहा कि आप लकी हो कि बाहर जा रहे हो, मैं कहां ये सब झेल रहा हूं। फिर देखता हूं छोटा सा बच्चा 15 साल का सचिन पूरे आत्मविश्वास के साथ बल्लेबाजी करने आता है। मैंने सोचा इसके बाद तो कुंबले ही हैं, अगर अब विकेट गया तो धर धर सब आउट हो जाएंगे। खेला खत्म है। मैंने सोचा कि घंटे भर में खेला खत्म है।
सिद्धू ने कहा, सचिन बोला- खेलेंगे। मैंने बोला- हां हां खेलो खेलो। एक बॉल जाकर सचिन के चेहरे पर लगी। उसके नाक से खून बहने लगा। मैंने सोचा इस बच्चे के नाक से खून बह रहा है। पूरी जर्सी खून से लथपथ। खुद सचिन जमीन पर पड़ा हुआ है। मुझे लगा कि ये गया। मैं वापस अपनी क्रीज में लौटने लगा। तभी पीछे से आवाज आई-शेरी। मैंने देखा सचिन मेरी तरफ चला आ रहा है। नाक से रूई लटक रही है। जर्सी पर खून, 15 साल का बच्चा बोला- मैं खेलेगा, देश की इज्जत का सवाल है। आज भी यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आज थोड़ी सी भी मुसीबत आती है, लोग घबरा जाते हैं। दुनिया बेचारों को प्यार करती है, लेकिन मेरी सलाह मानो कभी बेचारा मत बनो। आपको खड़े होना पड़ेगा।
सिद्धू ने अमर उजाला के मंच पर शायरी भी सुनाई। उन्होंने कहा, 'वो दरिया ही नहीं, जिसमें नहीं रवानी, जब जोश ही नहीं किस काम की तेरी जवानी।' उन्होंने आगे कहा, जरूरी नहीं है कि जो आपको बढ़िया लगे, वही आपकी राह हो।
सिद्धू ने आगे कहा, 'तो गुरु मैं एक पब्लिक स्कूल बैकग्राउंड से था। फर्राटे की इंग्लिश बोलता था। लेकिन दम नहीं था कि कोई प्रिंसिपल मुझसे ये कहता कि सिद्धू स्कूल को डिसपर्स करना है। क्लास मॉनिटर था, लेकिन टांगे कांपती थीं। सबकुछ आपके सोचने की शक्ति पर है। आप जैसा सोचेंगे वैसा बन जाएंगे। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। जो चीजें जीवन में होनी नहीं है, आप उनके बारे में सोच के भयग्रस्त हो जाते हो।' सिद्धू ने इस दौरान दिवंगत गायिका आशा भोसले को भी याद किया। उन्होंने कहा, आशा भोसले जी चली गईं, लेकिन एक जबरदस्त गाना अभी भी जहन में है- आगे भी जानें न तू, पीछे भी जानें न तू, जो भी है इस पल को थाम, पल को थाम शहंशाह हो जाएगा।
संगठन की शक्ति पर दिया जोर
सिद्धू ने अमर उजाला के मंच से संगठन की शक्ति पर बात की। उन्होंने कहा, संगठित हुई शक्ति जीत का कारण बनती है, विभाजित शक्ति पतन का कारण बनती है। जब आपके ऊपर परमात्मा विपत्ति भेजता है तो दोनों हाथ खुले रखो। दोनों हाथ खोलो और कहो कि परमात्मा मुझे डूबोने नहीं लगाया, मुझे स्वच्छ करने लाया है। यही वह अवसर है क्योंकि मैंने नानकदेव की गुलेल में हूं, महादेव की गुलेल में हूं। अगर तीन इंच पीछे जाऊंगा, तो 300 फुट आगे जाऊंगा। याद रखना अच्छे वक्त में कोई कुछ नहीं सीखता। अच्छे वक्त में तो आपको ये भी पता नहीं लगेगा कि आपका दोस्त कौन है। विपत्ति में ही पता लगेगा, सत्य का मार्ग छोड़ो मत। मित्र वही जो समय पर काम आए। संशय हो तो सत्य के मार्ग पर चलो। कभी भी नैतिकता से समझता मत करो, कोई तुम्हें गिरा नहीं पाएगा।
शाहरुख से मुलाकात की कहानी
जिंदगी में कभी किसी से कॉम्पिटीशन मत रखो। खुद को उत्तम बनाने का देखो। शाहरुख से 1987 में मिला था मैं। उन दिनों में वो सर्कस और फौजी में काम कर रहे थे। मेरी सास क्रिकेट देखने नहीं देती थी, क्योंकि उन्हें फौजी देखना होता था। तो शाहरुख आए, मॉर्डर्न स्कूल ग्राउंड में, वहां मेरे साथ कपिल देव भी खड़े थे। शाहरुख मुझसे कहता है कि मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं। आप जबरदस्त छक्के मारते हो। मैंने उससे कहा मैं आपका फैन हूं। मैंने उससे पूछे कि इसके बाद क्या करेगा, उसने कहा- बॉलीवुड। मैंने उससे कहा- बॉलीवुड में कोई तेरा है नहीं, वहां लोग तुझे खा जाएंगे। वो मेरी तरफ देखता है और कहता है- मैं आपको एक बात कहूं, आप बुरा तो नहीं मानोगे। सिद्धू साहब मेरा किसी से कॉम्पिटीशन नहीं है। मेरा कॉम्पिटीशन खुद से है। ये लाइन ने मेरी जिंदगी बदल दी। जिंदगी में हमेशा सुधार की गुंजाइश होती है और अगर आप ये स्वीकार करते हो, तो आप सही रास्ते पर हो।
कैसे फौजी की जगह बन गए क्रिकेटर?
सिद्धू ने कहा, 1987 टेस्ट मैच में मेरा आगमन हुआ और जितनी जल्दी आगमन हुआ, उतनी जल्दी बाहर। एक दिन बाथरुम से बाहर निकला तौलिया पहना हुआ। बाबा की आंख में आंसू थे। मैं फौज में जाना चाहता था, लेकिन उनकी वजह से मैं जा नहीं पाया। उन्होंने रोक लिया। उन्होंने कहा कि बेटा तेरे बिना नहीं जी पाऊंगा। उनकी तमन्ना थी कि भारत के लिए क्रिकेट खेल। कम से कम 20 साल, तो उनके सपने के लिए ही जिता था। जब उनकी आंखों में पहली बार जिंदगी में आंसू देखे तो स्तब्ध रह गया। मैंने कहा हुआ क्या है? उन्होंने एक अखबार तकिया के नीचे छुपाया। मैं दूसरे कमरे में चला गया, वापस आया तो वो चंडीगढ़ चले गए थे। मैंने वहां से वो अखबार खींच कर निकाला। उस अखबार में एक आर्टिकल था- 'नवजोत सिंह सिद्ध द स्ट्रोकलेस वंडर।' मतलब सिद्धू नेट के बाहर गेंद ही नहीं फेंक सकता, ये कहां शॉट मारेगा। उस फ्रंट पेज के आर्टिकल ने मुझे दफ्न कर दिया। प्रेस वालों से मैं तभी डरता हूं, तीन हजार तलवारों से नहीं डरता, लेकिन तीन प्रेस वालों से डरता हूं।
सिद्धू का क्रिकेट करियर
नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब की राजनीति और भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं। 20 अक्तूबर 1963 को पटियाला में जन्मे सिद्धू की पहचान एक आक्रामक बल्लेबाज की रही। उन्होंने 1983 से 1999 तक भारत के लिए 51 टेस्ट और 136 वनडे मैच खेले। सिद्धू ने भारत के लिए 51 टेस्ट मैचों में 3202 रन बनाए और इस प्रारूप में उनका सर्वोच्च स्कोर 201 रन रहा। टेस्ट में सिद्धू ने नौ शतक और 15 अर्धशतक लगाए हैं। वहीं, 136 वनडे मैचों में सिद्धू ने 4413 रन बनाए जिसमें नाबाद 134 उनका सर्वोच्च स्कोर है। इस प्रारूप में उनके बल्ले से छह शतक और 33 अर्धशतक निकले हैं। प्रथम श्रेणी क्रिकेट की बात करें तो 157 मैचों में उनके नाम 9571 रन हैं। वहीं, लिस्ट ए क्रिकेट में 205 मैचों में सिद्धू ने 7186 रन बनाए हैं।