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ओएनजीसी में सुपर कंप्यूटर जैसा सिस्टम शुरू
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 28 Jan 2016 03:33 PM IST
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अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता बढ़ाने और अन्वेषण के कार्यों में तेजी लाने के लिए ओएनजीसी ने कदम आगे बढ़ा दिए हैं।
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इसके लिए केडीएमपीई परिसर स्थित जियोपिक इमारत में हाई परफारमेंस कंप्यूटिंग क्लस्टर सिस्टम (एचपीसीसी) आर्य भट्ट-2 की शुरूआत की है। बुधवार को इसका उद्घाटन निदेशक मंडल के साथ ओएनजीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डीके सर्राफ ने किया।
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ओएनजीसी के सीएमडी डीके सर्राफ ने कहा कि आर्य भट्ट-2 सिस्टम से कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यकुशलता, कार्यक्षमता और गति के साथ अन्वेषण के काम में तेजी आएगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि गूगल की तरह जियोपिक भी ज्ञान संपदा का सृजन करेगा।
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निदेशक अन्वेषण एके द्विवेदी ने कहा कि जियोपिक के हर कर्मचारी को शोध व विकास के काम में जुट जाना होगा। ज्ञान संपदा पैदा करना हमारा उद्देश्य और लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अन्वेषण के चुनौतीपूर्ण काम को अंजाम देने में युद्धस्तर पर काम करना होगा।
ओएनजीसी विदेश लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एनके वर्मा ने कहा कि इस इन्फ्रास्ट्रक्चर का लाभ मार्केटिंग के लिए भी किया जा सकता है। इससे ओएनजीसी को वित्तीय लाभ मिल सकता है। जियोपिक के प्रमुख व कार्यकारी निदेशक अनिल सूद ने कहा कि हम कम लागत पर काम कर रहे हैं। यहां पर 24 घंटे काम चलता है।
इस मौके पर महाप्रबंधक अनिल नेगी, डी. भौमिक ने जियोपिक व हार्डवेयर हेड ने नवीन सिस्टम की जानकारी दी। गौरतलब है कि हाई परफारमेंस कंप्यूटिंग क्लस्टर में 250 कंप्यूटर नोट्स हैं। इसमें 21 फ्रंट एंड सर्वर, 23 हाई एंड ग्राफिक वर्कस्टेशन हैं। 650 टीबी की स्टोरेज क्षमता है। इस मौके पर निदेशक मंडल के सदस्यों में टीके सेनगुप्ता, एके श्रीनिवासन, सुधीर शर्मा एके द्विवेदी, डीडी मिश्रा आदि उपस्थित थे।
डीके सर्राफ ऑयल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन (ओएनजीसी) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक हैं। तेल व गैस सेक्टर के एक्सपर्ट होने के साथ ही वह प्रबंधन के भी महारथी माने जाते हैं। दून स्थित तेल भवन परिसर में अमर उजाला रिपोर्टर गौरव मिश्रा के साथ उन्होंने ओएनजीसी की नीतियों, तेल व गैस सेक्टर की स्थिति और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बातचीत की। वह कहते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में आ रही गिरावट से आयल सेक्टर संकट के दौर से गुजर रहा है, लेकिन वह इसे अवसर भी मानते हैं। उनका मानना है कि एक, दो या अधिकतम तीन साल में कीमतों में उछाल आएगा। तब इसका फायदा ओएनजीसी को मिलेगा। प्रस्तुत है कुछ प्रमुख सवालों के जवाब।
सवाल - लंबे समय से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जारी है। एक समय ओएनजीसी सर्वाधिक लाभ कमाने वाली कंपनियों में से एक रही है, लेकिन तेल व गैस क्षेत्र के लिए यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय माना जा रहा है। ऐसे में वर्ष 2016-17 में आपकी प्राथमिकताएं और रणनीति क्या हैं?
सीएमडी- तेल सेक्टर के लिए यह बेहद संकट वाला समय है, इस बात को मैं स्वीकार करता हूं। वर्तमान में कच्चे तेल की कीमत तीस डॉलर प्रति बैरल चल रही है, जबकि कुछ वर्ष पहले यह 140 डॉलर प्रति बैरल थी। कीमतों के नजरिए कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में सर्वाधिक नीचे हैं। यह ऑपरेटिंग कॉस्ट से भी नीचे चल रही हैं। लेकिन हम इसे अवसर मानते हैं। यह औरों के लिए खतरा होगा। ओएनजीसी इसे सकारात्मक तौर पर ले रहा है। यह हमारे लिए फायदे का सौदा है। इसे हम लो कॉस्ट डेवलपमेंट ऑपरच्युनिटी मानते हैं। इसमें किसी प्रकार का जोखिम नहीं है। हमारी तीन प्राथमिकताएं हैं, अन्वेषण, उत्पादन और विकास। हम कांटरेरियन व्यू के हैं यानी तेल की कम कीमतों को बड़ा अवसर मान रहे हैं। ड्रिलिंग, प्रोडक्शन, रिफाइनिंग समेत लगभग सभी काम में मंदी है। यह कारोबार, व्यापार, प्रबंधन के नजरिए से तार्किक है। एक, दो या अधिकतम तीन साल में कीमतों में उछाल आएगा। इसका फायदा ओएनजीसी को मिलेगा। आज जो लोग हमारा मजाक उड़ा रहे हैं वे हमारी रणनीति और बिजनेस प्लॉन के कायल हो जाएंगे।
सवाल - पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में आई गिरावट के प्रमुख कारण क्या हैं?
सीएमडी- तेल सेक्टर में कीमतों में वर्ष 2008-2009 में भी भारी गिरावट आई थी। प्रति बैरल 140 डॉलर से गिरकर कीमत 38 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची, लेकिन तब ऐसा सट्टेबाजी की वजह से हुआ था। आज की स्थिति अलग है। आज जो हालात हैं उसके पीछे फंडामेंटल्स काम कर रहे हैं। जमीनी कारकों की वजह से कीमतें नीचे आ गई हैं। फिर मांग और पूर्ति का नियम भी काम कर रहा है। इस समय मांग अपेक्षाकृत कम है और आपूर्ति अधिक है।
सवाल - मांग और आपूर्ति के तस्वीर को विस्तार से बताइए?
सीएमडी - देखिए अमेरिका ने शेल गैस में अभूतपूर्व शोध व विकास कर इस सेक्टर में नायाब काम किया। अमेरिका ने इसके लिए जबरदस्त इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया। अमेरिका में जो तेल पैदा होता रहा है उसे डब्लूटीआई कहते हैं। पहले यह अमेरिका में ही बिकता था। यूरोप में इसकी बिक्री पर रोक थी। यूरोप के तेल को ब्रैंट के नाम से जाना जाता है। अमेरिका के डब्लूटीआई की क्वालिटी ब्रैंट से बेहतर होती है। डब्लूटीआई जब यूरोप में जाने लगा तो ब्रैंट को झटका लगा। हैरानी की बात यह हुई कि बेहतर क्वालिटी के बावजूद डब्लूटीआई की कीमत ब्रैंट से नीचे आ गईं। अब डब्लूटीआई के बाजार में आने से सप्लाई अधिक हो गई। अब देखिए भू-राजनीति और भू-आर्थिकी में कितना सह-संबंध है। ईरान से प्रतिबंध हटा तो उसने तेल के कुओं में जबरदस्त अन्वेषण काम शुरू कर दिया। उसने पहले से ही समुद्र में बहुत मात्रा में तेल एकत्र कर रखा था। इस वजह से ईरान ने आधा मिलियन बैरल प्रति दिन उत्पादन शुरू कर दिया। फिर सऊदी अरब जहां तेल और गैस का विपुल खजाना है, पहले ही ओवर कैपेसिटी से प्रभावित रहा है, उसने अपने उत्पादन को बढ़ा दिया। इससे सऊदी अरब को भारी वित्तीय नुकसान हो रहा है, लेकिन बाजार के खेल में ऐसा हो रहा है। इसके बाद रूस भी तेल सेक्टर में खिलाड़ी बनकर आ गया। चीन जो तेल का बड़ा आयातक था उसकी अर्थव्यवस्था मंद हो गई। इससे सप्लाई ज्यादा और डिमांड कम वाला सिद्धांत जमीन पर उतर आया। अब सऊदी अरब जो कर रहा है उसे वित्तीय तौर पर सेल्फ किलिंग कहेंगे, लेकिन उसकी वित्तीय शक्ति बहुत अधिक है। इसलिए वह झेलने की स्थिति में है।
सवाल - आपको क्या लगता है कि यह स्थिति कब तक रहेगी?
सीएमडी - वर्तमान परिदृश्य तो निराशा पैदा करने वाला है, लेकिन असल में है नहीं। आप कहेंगे कि कैसे? तो मेरा कहना है कि जो कीमतों में गिरावट वाले कारक मैंने बताए वे सभी अतार्किक और कृत्रिम हैं। यह मॉडल स्थिर नहीं है। जिस मॉडल पर ओएनजीसी काम कर रहा है वह शार्ट, मीडियम और लांग टर्म पर आधारित है। हमारा विजन स्पष्ट है और जीत हमारी होगी। साल या दो साल में तेल की कीमतें बढ़ेंगी। इसे मैं कैलकुलेटेड स्ट्रेटजी कहता हूं, रिस्क कतई नहीं।
सवाल - आपको लगता है कि भारत कभी गैस और तेल का निर्यातक बन सकेगा?
सीएमडी - (मुस्कराते और हंसते हुए) विज्ञान और तकनीक असंभव को संभव करने में सक्षम है। हमारे समुद्रों में असीम संपदा छिपी है। केंद्र सरकार ने एक अद्भुत परियोजना शुरू की है। इसका नाम है नेशनल गैस हाइड्रेट प्रोग्राम एक्सपेडिशन-टू। सरकार ने इसका जिम्मा ओएनजीसी को सौंपा है। समुद्रों में निचले तल पर तापमान बहुत गिर जाता है। वहां बर्फ सी जम जाती है। उसमें अभूतपूर्व गैस है। इसे गैस हाईड्रेट कहा जाता है। यहां से इतनी अधिक गैस पैदा हो सकती है, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल है। वर्तमान में हमारे पास टेक्नालाजी नहीं है, लेकिन उस दिशा में हम अग्रसर हैं। यह तकनीक कब परिणाम देगी कह नहीं सकता, लेकिन मैं आशावादी हूं।
सवाल - गैस की कीमतों पर आपकी क्या राय है?
सीएमडी - तेल की कीमतें पूरी तरह से डी रेगुलेटेड हैं। गैस की कीमत पर नियंत्रण है, लेकिन सरकार को कीमतें बढ़ानी ही होंगी। हो सकता यह अलोक प्रिय लगे, लेकिन ऐसा करना बेहद जरूरी होगा। ऐसा नहीं करके इंडस्ट्री को बहुत नुकसान हो रहा है। गैस की कीमतों की गहन समीक्षा की जरूरत है। कीमतें तार्किक होनी चाहिए।
सवाल - ओएनजीसी में अन्वेषण और विकास की दिशा में जो काम हुए उनके बारे में बताएं?
सीएमडी - केजीडब्लूएम 98-2 में तेल व गैस का अथाह भंडार है। हमने इसके लिए फील्ड डेवलपमेंट प्लान तैयार किया है। इसको डायरेक्टर जनरल हाइड्रोकार्बंस को भी दिया गया है। लेकिन इस परियोजना पर बहुत ज्यादा लागत आएगी। इसकी असल लागत मैं नहीं बता सकता, लेकिन यह बहुत बड़ी राशि है। हम कितनी भी लागत कम करें, लेकिन यह प्रोजेक्ट आज की दशा में आर्थिक तौर पर संभव नहीं है। पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2014-15 में छह परियोजनाएं स्वीकृत हुईं, इनकी कीमत 28 हजार करोड़ रुपये थी। इससे 78 मिलियन टन तेल व गैस का उत्पादन हो पाएगा। इसके अलावा हाल में ही हमने बड़ी तादाद में तेल के कुएं चिह्नित किए हैं। पूर्वी तट पर भी काम जारी है। इसके शानदार परिणाम सामने आएंगे। बाजार सुधर जाए तो हम अच्छी स्थिति में होंगे।
सवाल - उत्तराखंड में मुख्यालय है तो इसके लिए कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी के लिए कोई योजना?
सीएमडी- उत्तराखंड देवभूमि है। हमारा इससे कोई औपचारिकता या दिखावे वाली बात नहीं है। यहां पर आकर सारी चिंताएं और तनाव का नाश हो जाता है। इसके विकास के लिए हमारे पास बड़ी सोच है। यहां के निवासियों की प्रगति हो, यह हमारी चाहत है। इसके लिए काम किया जाएगा।