Air Pollution: कोविड-19 से 16 गुना तक ज्यादा जानलेवा है वायु प्रदूषण, चौंकाने वाले आंकड़े देश भर के लिए गंभीर
27 फरवरी, 2026 को राजस्थान के अलवर जिले के निमली गांव स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में आयोजित अनिल अग्रवाल डॉयलॉग 2026 के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. संजीव बागई ने ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े साझा किए, जो राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
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देश और दुनिया में वायु प्रदूषण एक मौन महामारी की तरह फैल रहा है। 27 फरवरी, 2026 को राजस्थान के अलवर जिले के निमली गांव स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में आयोजित अनिल अग्रवाल डॉयलॉग 2026 के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. संजीव बागई ने ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े साझा किए, जो राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
उनके मुताबिक भारत में हर वर्ष वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें कोविड-19 के दौरान प्रति वर्ष दर्ज मौतों से 16 गुना अधिक हैं, जबकि दिल्ली में सर्दियों के पांच महीनों का प्रदूषण 9000 सिगरेट पीने के बराबर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है और 30 साल रहने पर औसतन 11 साल जीवन घटा सकता है। डॉ. बागई ने सत्र में बताया कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें आधिकारिक आंकड़ों में कम दर्ज होती हैं। उपलब्ध वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष 50 लाख से 81 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं।
स्टेट ग्लोबल हेल्थ रिपोर्ट 2020 के हवाले से उन्होंने कहा कि भारत में ही 20 से 30 लाख मौतें प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण के कारण होती हैं।उन्होंने कोविड-19 के संदर्भ में तुलना करते हुए कहा कि चार वर्षों में भारत में लगभग 6 लाख मौतें दर्ज की गईं, जबकि वायु प्रदूषण हर वर्ष कोविड अवधि के औसत वार्षिक आंकड़े से 16 गुना अधिक जान ले रहा है। इसके बावजूद भारतीय अस्पतालों की आईपीडी और ओपीडी प्रणाली में वायु प्रदूषण के लिए कोई समुचित डायग्नोसिस कोडिंग मौजूद नहीं है।लैंसेट 2021 और आईसीएमआर 2019 के अनुसार देश में कुल मौतों का 18 से 25 फीसदी हिस्सा वायु प्रदूषण से जुड़ा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के हवाले से उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण के कारण प्रति व्यक्ति वयस्क जीवन के 8 से 10 वर्ष कम हो सकते हैं। लंग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अनुसार दिल्ली के 30 फीसदी बच्चों में अपरिवर्तनीय फेफड़ों की क्षति पाई गई है। बर्कले अर्थ के शोध का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पीएम 2.5 के हर 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का पूरे दिन का एक्सपोजर एक सिगरेट पीने के बराबर जोखिम पैदा करता है। दिल्ली में सर्दियों के पांच महीनों का संचयी एक्सपोजर लगभग 9000 सिगरेट पीने के बराबर आंका गया है। इससे जीवनकाल में 129 दिन यानी लगभग 4.3 महीने की कमी आती है।
यदि कोई व्यक्ति 30 वर्ष तक दिल्ली में रहता है तो वह औसतन 11 वर्ष जीवन खो सकता है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के स्तर पर 8 घंटे का एक्सपोजर एक सिगरेट के बराबर है, जबकि 511 माइक्रोग्राम पर यह 8 सिगरेट तक पहुंच सकता है। कनाडियन एयर क्वालिटी हेल्थ इंडेक्स के अनुसार 10 माइक्रोग्राम स्तर पर 24 घंटे में 0.5 सिगरेट, 60 माइक्रोग्राम पर 2.7 सिगरेट और 100 माइक्रोग्राम पर 23.2 सिगरेट के बराबर जोखिम हो सकता है।जुलाई 2024 की लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में कुल मौतों का 11 फीसदी पीएम 2.5 से जुड़ा है। और हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वृद्धि पर मृत्यु दर 3.6 फीसदी तक बढ़ सकती है।
पीएम 2.5 और मृत्यु दर का सीधा संबंध
पीएम 2.5 बाल के आकार के लगभग एक-चौथाई के बराबर सूक्ष्म कण होते हैं। इनके स्तर में हर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वृद्धि से मृत्यु दर 4 फीसदी, 10 माइक्रोग्राम वृद्धि पर 8 फीसदी और 35 माइक्रोग्राम वृद्धि पर 24 फीसदी तक बढ़ सकती है। नेचर जर्नल के एक शोध का हवाला देते हुए डॉ बागई ने कहा कि पीएम 2.5 में हर 1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वृद्धि से प्रतिवर्ष 12,000 अतिरिक्त मौतें होती हैं। वहीं 1 माइक्रोग्राम वृद्धि मृत्यु दर में 0.073 फीसदी बढ़ोतरी से जुड़ी है। प्रदूषण में 1 यूनिट वृद्धि 1200 से 1600 मौतों के बराबर आंकी गई है। कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड में हर 1 फीसदी वृद्धि से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 2 गुना तक बढ़ सकता है।
15 मिनट से लेकर पांच दिन तक का जोखिम
लैंसेट नवंबर 2022 रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने कहा कि 15 मिनट से अधिक खराब हवा में संपर्क श्वसन संकट पैदा कर सकता है। 1 से 2 दिन का लगातार एक्सपोजर मायोकार्डियल इनफार्क्शन और स्ट्रोक का कारण बन सकता है, जबकि 3 से 5 दिन का संपर्क अचानक कार्डियक अरेस्ट तक ले जा सकता है। सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर सुबह के समय प्रदूषण स्तर बढ़ जाता है, इसी समय बच्चे स्कूल जाते हैं। सर्वे के अनुसार कई बच्चे स्कूल जाने से बचते हैं या दिल्ली छोड़ने की इच्छा जताते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक: एक नया उभरता खतरा आर्थिक नुकसान और नीति की जरूरत
डॉ. बागई ने कहा कि भारत का स्वास्थ्य बजट लगभग एक लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक है, जबकि वायु प्रदूषण के कारण उत्पादकता में हर वर्ष 24 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है, जो जीडीपी का लगभग 8 फीसदी है। यह स्वास्थ्य बजट का लगभग 24 गुना है।उन्होंने नगर निगमों द्वारा धूल प्रबंधन के पुराने तरीकों की आलोचना की और कहा कि ठोस नीति, मजबूत वित्तीय प्रतिबद्धता और स्पष्ट सार्वजनिक एजेंडा के बिना स्थिति और गंभीर हो सकती है। वायु प्रदूषण को केवल फेफड़ों की बीमारी समझना भूल होगी। यह प्रतिरक्षा तंत्र, हृदय, मस्तिष्क, गुर्दे और चयापचय प्रणाली सहित लगभग हर अंग को प्रभावित करता है। यदि अभी निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और अगली पीढ़ी पर इसका बोझ असहनीय हो जाएगा।
गर्भावस्था से ही शुरू हो जाता है खतरा
डॉ. बागई ने कहा कि वायु प्रदूषण भ्रूण के अंगों को प्रभावित करता है। इससे समयपूर्व प्रसव, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार, मातृ उच्च रक्तचाप, प्लेसेंटा संबंधी समस्याएं और मृतजन्म में लगभग 14 फीसदी तक वृद्धि देखी गई है।प्रदूषण के संपर्क से जन्मजात हृदय रोग, कटे होंठ, सूक्ष्म सिर, रीढ़ की विकृति और एक गुर्दे की अनुपस्थिति जैसी संरचनात्मक असामान्यताएं बढ़ सकती हैं। यदि महिला गर्भधारण से 12 महीने पहले प्रदूषकों के संपर्क में रही हो तो आनुवंशिक परिवर्तन पहले ही शुरू हो सकते हैं।
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