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Delhi: एम्स के ट्रांसजेंडर क्लिनिक में साल-दर-साल बढ़ रहा है मरीजों का दबाव, अधिकांश की उम्र 20 से 30 के बीच

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 28 Jan 2026 06:00 AM IST
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सार

डॉक्टरों के अनुसार, हर साल लगभग 300 नए मरीज पंजीकृत होते हैं, जबकि 600 मरीज फॉलो-अप के लिए वापस आते हैं। इन मरीजों की अधिकतर उम्र 20 से 30 साल के बीच है।

Delhi: AIIMS transgender clinic is seeing increasing patient pressure
Delhi AIIMS - फोटो : ANI
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विस्तार
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के ट्रांसजेंडर क्लिनिक में हर साल मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डॉक्टरों के अनुसार, हर साल लगभग 300 नए मरीज पंजीकृत होते हैं, जबकि 600 मरीज फॉलो-अप के लिए वापस आते हैं। इन मरीजों की अधिकतर उम्र 20 से 30 साल के बीच है। यह आंकड़ा देश में ट्रांसजेंडर हेल्थकेयर के प्रति बढ़ती जागरूकता, स्वीकार्यता और पहुंच को दिखाता है। 

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मंगलवार को एम्स के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के प्रो. राजेश खड़गावत ने बताया कि यह क्लिनिक मरीजों को एक ही छत के नीचे व्यापक ट्रांसजेंडर केयर देता है। इसमें हार्मोनल थेरेपी, मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन और सर्जिकल प्रक्रिया शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मरीजों को अब कई अस्पतालों के बीच भटकने की जरूरत नहीं है।
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प्रो. खड़गावत ने हार्मोनल थेरेपी की भूमिका के बारे में बताया कि जेंडर की विशेषताएं हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती हैं। उदाहरण के लिए महिला से पुरुष बनने वाले मरीजों को महिला हार्मोन कम कर पुरुष हार्मोन दिए जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे शारीरिक बदलाव आते हैं। चेहरे पर बाल उगते हैं और आवाज भारी होती है। 

वहीं, पुरुष से महिला बनने वाले मरीजों में ब्रेस्ट का विकास होता है और शरीर का आकार बदलता है। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन ट्रांजिशन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एम्स के मनोरोग विभाग के प्रमुख प्रो. प्रताप सरन ने कहा कि क्लिनिक में तीन-चरण मूल्यांकन होता है। सबसे पहले यह जांच की जाती है कि क्या जेंडर असंगति मौजूद है। मरीज को कम से कम एक साल तक निगरानी की जाती है, ताकि उनकी जेंडर पहचान में निरंतरता सुनिश्चित की जा सके।

इस दौरान मरीज को वास्तविक जीवन में अपने चुने हुए जेंडर में रहना और काम करना होता है। लगातार प्रक्रिया के बाद ही मरीज को प्रमुख जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी कराने की अनुमति मिलती है। उन्होंने कहा कि एम्स ट्रांसजेंडर क्लिनिक की यह पूरी व्यवस्था देश में संरचित जेंडर-एफर्मिंग हेल्थकेयर का उदाहरण है। एम्स के बर्न्स और प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रो. मनीष सिंघल ने बताया कि यह सर्जरी मरीज की जरूरत के अनुसार कई स्टेज में की जाती है। 

इसमें ब्रेस्ट सर्जरी से लेकर पेनिस रिकंस्ट्रक्शन और जटिल जेनिटल रिकंस्ट्रक्शन जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। यह सर्जरी आयुष्मान भारत योजना के तहत कवर होती है, जिससे मरीजों पर आर्थिक दबाव कम हो जाता है। अस्पताल के मल्टीडिसिप्लिनरी टीम, नैतिक प्रोटोकॉल और सरकार की वित्तीय मदद के साथ मरीजों का इलाज किया जाता है।

2023 से मौजूदा समय तक 139 मामलों में सर्जरी
एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न्स सर्जरी विभाग के अनुसार, जेंडर अफर्मिंग (लिंग-पुष्टि) और रिफाइनिंग प्रक्रियाओं (हॉर्मोन थेरेपी और सर्जरी) की मौजूदा समय तक विभाग में कुल 195 प्रक्रियाएं की गई है। इनमें से 139 जेंडर अफर्मिंग सर्जरी (ट्रांसजेंडर लोगों के लिए लिंग-संबंधी बदलाव वाली सर्जरी) और 56 छोटी कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं शामिल हैं। 

इसके अलावा मुख्य आंकड़े में जेंडर अफर्मिंग प्रक्रियाएं (जीएएस) 33 है, जिसमें मुख्य रूप से वैजिनोप्लास्टी और फेलोप्लास्टी जैसी प्रमुख सर्जरी हुई है। जेंडर रिफाइनिंग प्रक्रियाएं (जीआरएस) 106 है, जिसमें ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन, चेहरा सुधार, नाक की सर्जरी, जबड़े की सर्जरी, आवाज सुधार, एडम एपल शेव जैसी सर्जरी शामिल है)। वहीं, छोटी प्रक्रियाओं 56 है, जिसमें बोटॉक्स इंजेक्शन, डर्मल फिलर्स, लेजर ट्रीटमेंट, हेयर ट्रांसप्लांटेशन, फैट ग्राफ्टिंग व अन्य है।

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