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Delhi Fire: खतरे की नींव पर बसे डेरे, आखिर कितनी जिंदगियां दांव पर लगाएगा लापरवाह सिस्टम; बेसमैंट बने मुसीबत
ज्योति सिंह, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 13 Jun 2026 03:38 AM IST
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सार
इस हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राजधानी में लोग कब तक असुरक्षित और अव्यवस्थित इमारतों में रहने को मजबूर रहेंगे।
जिस इलाके में आग लगी, वहां आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियां एक-दूसरे में पूरी तरह घुल-मिल चुकी हैं।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
तुगलकाबाद एक्सटेंशन की गली नंबर-1 स्थित पांच मंजिला इमारत में हुआ अग्निकांड केवल एक हादसा नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और सुरक्षा मानकों में लगातार बरती जा रही लापरवाही की ओर इशारा करता है। इस हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राजधानी में लोग कब तक असुरक्षित और अव्यवस्थित इमारतों में रहने को मजबूर रहेंगे।
जिस इलाके में आग लगी, वहां आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियां एक-दूसरे में पूरी तरह घुल-मिल चुकी हैं। बहुमंजिला मकानों के बीच कपड़ा कारोबार से जुड़ी कई इकाइयां संचालित हो रही हैं, जहां बड़ी संख्या में कारीगर काम करते हैं। जिस इमारत में आग लगी उसके ठीक बगल में भी कपड़ा तैयार करने से जुड़ी एक इकाई संचालित हो रही है। हादसे के समय वहां कर्मचारी मौजूद थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आग कुछ और देर तक फैलती, तो नुकसान कहीं अधिक गंभीर हो सकता था।
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हादसे के बाद सामने आए कुछ तथ्यों ने भी चिंता बढ़ाई है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक पड़ोसी इमारत में एक कर्मचारी अंदर फंसा मिला, जबकि बाहर से ताला लगा हुआ था। इस घटना ने कार्यस्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे गंभीर पहलुओं में से एक इमारत का संकरा प्रवेश द्वार है। स्थानीय लोगों के मुताबिक भवन का मुख्य रास्ता करीब तीन फीट चौड़ा था। आग जैसी आपात स्थिति में इतने संकरे निकास मार्ग से बड़ी संख्या में लोगों का सुरक्षित बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
बेसमेंट उत्पादन इकाइयों में बदल गए
तुगलकाबाद एक्सटेंशन का बड़ा हिस्सा मिश्रित उपयोग वाले निर्माणों का उदाहरण बन चुका है। अधिकांश इमारतों के भूतल पर दुकानें और छोटे व्यवसाय संचालित होते हैं, जबकि ऊपरी मंजिलों पर लोग रहते हैं। पार्किंग की कमी और सीमित जगह के कारण कई बेसमेंट वाहन खड़े करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जबकि कई स्थानों पर इन्हें उत्पादन इकाइयों में बदल दिया गया है। इन बेसमेंटों में कपड़ों की सिलाई, पैकिंग और भंडारण का काम होता है। बड़ी मात्रा में कपड़ा और अन्य ज्वलनशील सामग्री मौजूद रहने से आग लगने की स्थिति में खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हर गली में कारीगरों की तलाश
इलाके में जगह-जगह “कपड़े के कारीगरों की आवश्यकता है” जैसे पोस्टर दिखाई देते हैं। यह दर्शाता है कि रिहायशी क्षेत्र के भीतर बड़े पैमाने पर औद्योगिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। जिस इमारत में आग लगी, उसके आसपास भी ऐसे पोस्टर लगे मिले। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन इकाइयों के पास आवश्यक अनुमति, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाएं मौजूद हैं। तुगलकाबाद एक्सटेंशन का यह हादसा राजधानी के उन अनेक इलाकों की तस्वीर सामने लाता है, जहां रिहायशी कॉलोनियां धीरे-धीरे व्यावसायिक और औद्योगिक केंद्रों में बदल चुकी हैं, लेकिन सुरक्षा ढांचा उसी अनुपात में विकसित नहीं हुआ।
दिल्ली में आग की प्रमुख घटनाएं
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