Delhi Riots 2020: कशमकश के 2347 दिनों का इंतजार खत्मः महज 9 मिनट में पूरी जिंदगी जेल में रहने का आदेश
शाम चार बजकर नौ मिनट पर न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया और मात्र नौ मिनट में चार बजकर 18 मिनट पर सभी दोषियों को ताउम्र जेल में रहने का आदेश सुनाया।
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विस्तार
दिल्ली दंगे के दौरान नाले से मिली अज्ञात शव से शुरू हुई तफ्तीश का फैसला कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपने 39 पन्नों के फैसले में कर दिया। शाम चार बजकर नौ मिनट पर न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया और मात्र नौ मिनट में चार बजकर 18 मिनट पर सभी दोषियों को ताउम्र जेल में रहने का आदेश सुनाया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने 31 जुलाई 2026 को दिए गए विस्तृत आदेश में अभियोजन पक्ष की मौत की सजा की मांग को जरूर खारिज कर दिया, लेकिन अपराध को “अत्यंत बर्बर, घृणित और समाज को झकझोर देने वाला” करार दिया। न्यायालय ने कहा कि पीड़ित को केवल धर्म के आधार पर हिंसक भीड़ ने घेरा, हमला किया, शव को बांधकर घसीटा और नाले में फेंक दिया। इसके बावजूद अदालत ने माना कि हत्या में किसी भी दोषी की प्रत्यक्ष और विशिष्ट भूमिका साबित नहीं हुई।
सभी को भारतीय दंड संहिता की धारा 149 के तहत सामूहिक आपराधिक दायित्व के आधार पर दोषी ठहराया गया है। न्यायाधीश ने कहा कि अपराध की क्रूरता असाधारण है, परंतु यह साबित नहीं हुआ कि दोषी सुधार और पुनर्वास की संभावना से पूरी तरह परे हैं। इसलिए यह मामला “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी में नहीं आता और मौत की सजा नहीं दी जा सकती।
अभियोजन की दलीलें: क्रूरता और बर्बरता की सीमाएं पार, समुदाय की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरा
विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने अदालत में कहा कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान दोषी चाकू और भारी काटने वाले हथियारों से लैस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे। भीड़ ने अंकित शर्मा को घेरा, चांद बाग पुलिया की ओर घसीटा और निर्ममता से हमला किया। पोस्टमार्टम में शरीर पर 51 चोटें पाई गईं, जिनमें सात चोटें मौत के लिए पर्याप्त थीं। 18 चोटें धारदार हथियारों से और एक चोट भारी काटने वाले हथियार से आई थी। अभियोजन के अनुसार यह पूर्व-योजनाबद्ध और शैतानी क्रूरता से की गई हत्या थी, जिसने समुदाय की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर दिया।
अभियोजन ने तर्क दिया कि यह हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि फरवरी 2020 के दंगों के दौरान आतंक फैलाने और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की बड़ी साजिश का हिस्सा थी। धारा 149 के तहत रचनात्मक जिम्मेदारी लागू होती है, इसलिए यह आवश्यक नहीं कि घातक वार किसने किया, यह अलग से साबित हो।
51 बार चाकू मारने के बाद तेजाब से जलाने का भी प्रयास
अंकित शर्मा का शव 26 फरवरी 2020 को खजूरी नाले से मिला था। पोस्टमार्टम में शरीर पर 51 गंभीर चोटों की पुष्टि हुई। रिपोर्ट के अनुसार शरीर के कई हिस्सों को तेजाब से जलाने का प्रयास भी किया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने रक्त के नमूने, मिट्टी, हथियार और अन्य फोरेंसिक साक्ष्य जब्त किए। ताहिर हुसैन के परिसर से बरामद पत्थर, ईंटें, पेट्रोल बम और अन्य दंगाई सामग्री को भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
इन आदेशों को बनाया आधार
अभियोजन ने कई महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया:
- धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1994): सजा अपराध की भयावहता, अपराधी के आचरण और पीड़ित की असहाय स्थिति के अनुरूप होनी चाहिए।
- मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): जहां समाज की सामूहिक अंतरात्मा गहराई से आहत हो, वहां मामला दुर्लभ से दुर्लभतम हो सकता है।
- कृष्णा मोची बनाम बिहार राज्य: सांप्रदायिक आधार पर की गई हत्या धर्मनिरपेक्ष समाज के ताने-बाने पर हमला है।
- पुरुषोत्तम दशरथ बोराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015): ठंडे दिमाग और पूर्व-योजना से की गई हत्या में कठोरतम सजा की ओर झुकाव होना चाहिए।
- सेवका पेरुमल बनाम तमिलनाडु राज्य (1991) और शैलेश जसवंतभाई बनाम गुजरात राज्य: सजा अपराध की गंभीरता और बर्बरता के अनुपात में होनी चाहिए।
ताहिर हुसैन ने सार्वजनिक विश्वास का दुरुपयोग किया
अभियोजन ने ताहिर हुसैन की भूमिका को विशेष रूप से गंभीर बताया। कहा गया कि वे निर्वाचित नगर पार्षद थे और उन्होंने सार्वजनिक विश्वास तथा अपनी स्थिति का दुरुपयोग किया। शांति बनाए रखने के बजाय उन्होंने गैरकानूनी जमाव को बढ़ावा दिया और सहायता पहुंचाई। अभियोजन के अनुसार नाजिम, कासिम, जावेद और अनस ने अंकित शर्मा का अपहरण किया और हत्या में भाग लिया। नाजिम को चाकू के साथ देखा गया था। अभियोजन ने कहा कि दोषियों ने कोई पछतावा नहीं दिखाया और उन्हें धारा 302/149 के तहत मौत की सजा दी जानी चाहिए।
बचाव पक्ष ने कहा- सुधार की संभावना मौजूद
ताहिर हुसैन की ओर से वरिष्ठ वकीलों राजीव मोहन, तारा नरूला और शिवांगी शर्मा ने दलील दी कि ताहिर को धारा 505, 120बी, 109 और 114 आईपीसी के आरोपों से बरी किया गया है। इससे स्पष्ट है कि न तो उन्होंने हिंसा की साजिश रची और न ही प्रत्यक्ष रूप से हत्या के लिए उकसाया। बचाव पक्ष ने कहा कि कोई भी दोषी सीधे हत्या करते हुए नहीं पाया गया, कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और कोई विशिष्ट खुला कृत्य साबित नहीं हुआ।
- बचाव पक्ष ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा कि आजीवन कारावास नियम है और मौत की सजा अपवाद। केवल अपराध की बर्बरता पर्याप्त नहीं है; अपराधी की परिस्थितियों और सुधार की संभावना को भी देखना होगा। ताहिर द्वारा पुलिस अधिकारियों और एसीपी को किए गए फोन कॉलों का हवाला देते हुए कहा गया कि वे पुलिस हस्तक्षेप और सुरक्षा की मांग कर रहे थे।
- अन्य दोषियों की ओर से भी कहा गया कि उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, जेल में आचरण सामान्य रहा और वे परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य हैं।
अदालत ने सभी दोषियों की सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट मंगाई
अदालत ने सभी दोषियों की सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट मंगाई। अनस 31 वर्ष के, अविवाहित और निरक्षर है। वह फल बेचने या रिक्शा चलाने का काम करता था। कासिम और नाजिम भी निरक्षर हैं और मजदूरी या मांस की छोटी दुकान चलाते थे। जावेद फल विक्रेता है। ताहिर हुसैन 12वीं तक शिक्षित है। ताहिर फर्नीचर का व्यवसाय करता था और 2017 में पार्षद चुना गया था। उसकी संपत्तियों से परिवार को लगभग 1.95 लाख रुपये मासिक किराया मिलता है। जेल रिपोर्ट में ताहिर और नाजिम का आचरण संतोषजनक बताया गया, जबकि कासिम के खिलाफ तीन छोटे अनुशासनात्मक उल्लंघन दर्ज हुए।
सजा के दौरान हर परिस्थिति को तौलना जरूरी
अदालत ने कहा कि सजा तय करते समय गंभीर और कम करने वाली दोनों परिस्थितियों का संतुलन आवश्यक है। बचन सिंह, मच्छी सिंह और मनोज जैसे फैसलों में विकसित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि मौत की सजा के लिए “क्राइम टेस्ट” पूरी तरह और “क्रिमिनल टेस्ट” शून्य होना चाहिए, अर्थात अपराध अत्यंत भयावह हो और अपराधी के पक्ष में कोई महत्वपूर्ण कम करने वाली परिस्थिति न हो।
-न्यायालय ने माना कि इस मामले में अपराध की क्रूरता दुर्लभ से दुर्लभतम की ओर झुकती है, लेकिन अपराधियों की परिस्थितियां और सुधार की संभावना संतुलन को बदल देती हैं।
सिर्फ धर्म के आधार पर भीड़ ने निर्दयता से की हत्या: अदालत
फैसले में अदालत ने कहा कि पीड़ित को केवल धर्म के आधार पर निशाना बनाया गया। भीड़ ने उन्हें घेरा, हमला किया, शव को जानवर की तरह बांधकर घसीटा और नाले में फेंक दिया। यह अत्यंत गंभीर परिस्थिति है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि राज्य यह साबित नहीं कर सका कि दोषी सुधार से परे हैं या भविष्य में समाज के लिए स्थायी खतरा बनेंगे।
दोषी का जेल में अस्तित्व समाज के लिए खतरा नहीं: अदालत
अदालत ने कहा कि दंगों के दौरान गलत सूचना और धार्मिक उन्माद फैलाया गया था और निरक्षर लोग ऐसे प्रचार के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। न्यायालय ने पाया कि जावेद और अनस जमानत पर रिहा होने के बाद किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि उनमें सामान्यतः हिंसक प्रवृत्ति नहीं है। अदालत ने कहा कि हत्या में किसी भी दोषी के खिलाफ विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य साबित नहीं हुआ और सभी को धारा 149 के आधार पर दोषी ठहराया गया है।
एसीपी अमलेश्वर राय की वैज्ञानिक विवेचना बनी दोषसिद्धि की मजबूत आधारशिला
अदालत ने जांच की वैज्ञानिक पद्धति को दोषसिद्धि की महत्वपूर्ण आधारशिला माना। जांच अधिकारी एसीपी अमलेश्वर राय और उनकी टीम ने छह वर्षों तक सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा, डिजिटल साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शी बयानों को जोड़कर घटनाक्रम की शृंखला तैयार की। इंस्पेक्टर प्रियंका और उनकी टीम ने घटनास्थल से वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्र किए। अभियोजन ने अदालत में 91 गवाहों के बयान, चिकित्सीय और वैज्ञानिक साक्ष्य तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश किए, जिन्हें न्यायालय ने विश्वसनीय माना।
इन धाराओं में मिली सजाएं
ताहिर हुसैन
- धारा 188: 6 माह कठोर कारावास + 1,000 रुपये जुर्माना
- धारा 147/149: 2 वर्ष + 20,000 रुपये
- धारा 148/149: 3 वर्ष + 25,000 रुपये
- धारा 153ए/149: 3 वर्ष + 25,000 रुपये
- धारा 365/149: 7 वर्ष + 50,000 रुपये
- धारा 302/149: आजीवन कठोर कारावास + 5 लाख रुपये जुर्माना
नाजिम, कासिम, जावेद और अनस
- धारा 188: 6 माह + 1,000 रुपये
- धारा 147/149: 2 वर्ष + 4,000 रुपये
- धारा 148/149: 3 वर्ष + 5,000 रुपये
- धारा 153ए/149: 3 वर्ष + 5,000 रुपये
- धारा 365/149: 7 वर्ष + 10,000 रुपये
- धारा 302/149: आजीवन कारावास + 25,000 रुपये जुर्माना
अदालत ने स्पष्ट किया कि हत्या और अन्य अपराधों की सजाएं साथ-साथ चलेंगी, लेकिन धारा 302/149 के तहत दी गई आजीवन कठोर कारावास की सजा प्रभावी रहेगी। इस फैसले के साथ उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में से एक में ट्रायल कोर्ट स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया।