{"_id":"6a2ff1a14b541522450233bf","slug":"doctors-sentence-upheld-in-cheque-bounce-case-appeal-dismissed-delhi-ncr-news-c-340-1-del1004-140986-2026-06-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Delhi NCR News: चेक बाउंस मामले में डॉक्टर की सजा बरकरार, अपील खारिज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Delhi NCR News: चेक बाउंस मामले में डॉक्टर की सजा बरकरार, अपील खारिज
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
-अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक माह की साधारण कारावास की सजा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। द्वारका कोर्ट ने 10 लाख रुपये के चेक बाउंस में एक डॉक्टर को राहत देने से इन्कार करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि केवल देनदारी से इन्कार कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आरोपी को अपने बचाव में ठोस साक्ष्य भी पेश करने होते हैं। विशेष न्यायाधीश भावना कालिया की अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने स्वयं स्वीकार किया था कि चेक पर उसके हस्ताक्षर हैं और दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक संबंध भी थे। ऐसे में कानून के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में जो वैधानिक अनुमान बनता है, उसे आरोपी विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से खंडित नहीं कर सका। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक माह की साधारण कारावास की सजा और 10 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को भी बरकरार रखा। अदालत ने आरोपी को मुआवजा राशि जमा करने के लिए 60 दिन का समय दिया है।
मामले में गुरुग्राम निवासी डॉक्टर देवेंद्र तनेजा ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया था। डॉक्टर का तर्क था कि जिस चेक के आधार पर मामला दर्ज किया गया, वह अपनी वैधता अवधि समाप्त होने के बाद बैंक में प्रस्तुत किया गया था, इसलिए शिकायत ही सुनवाई योग्य नहीं थी। मामला एक डायग्नोस्टिक सेंटर और डॉक्टर के बीच हुए कारोबारी लेनदेन से जुड़ा था।
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। द्वारका कोर्ट ने 10 लाख रुपये के चेक बाउंस में एक डॉक्टर को राहत देने से इन्कार करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि केवल देनदारी से इन्कार कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आरोपी को अपने बचाव में ठोस साक्ष्य भी पेश करने होते हैं। विशेष न्यायाधीश भावना कालिया की अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने स्वयं स्वीकार किया था कि चेक पर उसके हस्ताक्षर हैं और दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक संबंध भी थे। ऐसे में कानून के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में जो वैधानिक अनुमान बनता है, उसे आरोपी विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से खंडित नहीं कर सका। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक माह की साधारण कारावास की सजा और 10 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को भी बरकरार रखा। अदालत ने आरोपी को मुआवजा राशि जमा करने के लिए 60 दिन का समय दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
मामले में गुरुग्राम निवासी डॉक्टर देवेंद्र तनेजा ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया था। डॉक्टर का तर्क था कि जिस चेक के आधार पर मामला दर्ज किया गया, वह अपनी वैधता अवधि समाप्त होने के बाद बैंक में प्रस्तुत किया गया था, इसलिए शिकायत ही सुनवाई योग्य नहीं थी। मामला एक डायग्नोस्टिक सेंटर और डॉक्टर के बीच हुए कारोबारी लेनदेन से जुड़ा था।